बुधवार, 20 जुलाई 2022

शुक्र है कि विलियम वर्ड्सवर्थ कोई बिल्डर नहीं थे

नर्गिस उर्फ़ डेफोडिल के फूल! तुम वही हो न जिसके पुरखों ने ढाई सौ साल पहले, सात समंदर पार विलियम वर्ड्सवर्थ का मन मोह लिया था। शुक्र है कि विलियम वर्ड्सवर्थ कोई बिल्डर नहीं थे, नहीं तो उन वादियों में उन्हें झूमते हुए डेफोडिल्स न नज़र आते। शुक्र है रचियता ने वर्ड्सवर्थ को बनाते वक़्त उनके खमीर में कुदरत से इश्क़ का कुछ हिस्सा मिला दिया था, वरना न तो वह कभी खुद को आज़ाद बादल मानते और न हवाओं की लय पर तुम्हे झूमता हुआ महसूस कर पाते!


 प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथाओं में नर्गिस के फूल का ज़िक्र मिलता है। ये उस समय का किस्सा है जब चेहरा देखने के लिए आइना नहीं हुआ करता था। ज़ियुस आसमान का देवता था। उसे तमाम इंसानों और हुक्मरानों पर सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया था। इन सबकी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी भी ज़ियुस की ही थी। ज़ियुस को पेड़ और पानी बड़े ही खूबसूरत नज़र आते थे। इतने कि उन्हें इनसे मोहब्बत थी। मगर उनकी पत्नी हेरा को ज़ियुस की यह आदत बहुत नापसंद थी। यूनान के पुराने किस्सों में ये खुलासा मिलता है कि जब ज़ियुस एक खूबसूरत जंगल से गुजरता तो इको नाम की एक परी उसे घेर लेती और अपनी बातों में उलझा लिया करती। ज़ियुस को भी परियों के झुरमुट में बैठने में बड़ा मज़ा आता था।

 जल्दी ही हेरा को इस मामले की जानकारी हो गई। उसने इको को बद्दुआ दी, जिसके नतीजे में इको की प्यारी सी आवाज़ गूंज में बदल गई। फिर इको जंगल जंगल भटकती रहती और अपने दिल का सुकून तलाशा करती। इसी तलाश में उसे एक दिन जंगल में एक शहज़ादा नज़र आया। शहज़ादा नारसेसस (Narcissus) बेहद खूबसूरत था। इको उसके हुस्न पर मर मिटी। मगर शहज़ादा उससे लापरवाह रहा। अकसर वह इको को दुत्कार भी दिया करता था। दुखी इको इस बेरुखी को बर्दाश्त न कर सकी और अपने दर्द पर काबू पाने में नाकामयाब होकर उसने शहज़ादे को बद्दुआ दे डाली- ‘ईश्वर तुम्हे अपनी ही मोहब्बत में गिरफ्तार कर दे और तुम्हे खुद को पाने का कोई जरिया न मिले।‘

एक दिन नारसेसस नदी में झुका कुछ तलाश कर रहा था, तब उसने पानी में अपना अक्स देखा। वह खुद अपने हुस्न पर फ़िदा हो गया। इतना कि अपनी ही मोहब्बत में गिरफ्तार हो गया। अब खुद को निहारना ही उसे याद रहा। शहज़ादा पानी में अपना रूप निहारता और उसे चूमने के लिए और क़रीब जाने की कोशिश करता। खुद को चूम लेने की चाहत उसे पानी के करीब ले जाती तो वह पानी में गिर जाता। बेचैन शहज़ादा इसी कोशिश में लगा हुआ था। आस पास के पेड़, फूल, जंगल, खुशबु, हवा और पहाड़ इस मंज़र के गवाह थे। उन सबने देखा कि किस तरह खुद की चाहत में मजबूर शहज़ादा पानी में अपनी ही तलाश करता। खुद को चूमने की खातिर वो उसी जगह बैठा रह गया। इस चाहत में वह दुनिया से बेगाना हो गया और खुद को पाने के इन्तिज़ार में उसने दम तोड़ दिया। इसकी खबर इको को भी मिली। बेक़रार इको जब वहां पहुंची तो उसने पाया उस जगह पर नर्गिस का फूल खिला हुआ था।

वही नर्गिस का फूल जिसकी सुंदरता का बखान विलियम वर्ड्सवर्थ को 'द डेफोडिल' रचने पर मजबूर कर गया। एक ही नज़र में इन फूलों और उस घाटी में उन्होंने क्या कुछ नहीं देख डाला। खुद को एक टहलते बादल का टुकड़ा मान कभी वह इन फूलों को दस हज़ार महसूस करते और उसी पल इनका हवा में हिलकोरे खाता झुण्ड उन्हें किसी लहर की तरह नज़र आता। इसी बीच इन नन्हे नर्गिस को वह आसमान में टांके गए तारे जैसा पाते और यही फूल ख़ुशी के लम्हों में उनके साथ नाचते उनके ख्यालों का हिस्सा बने।

 शुक्र है कि विलियम वर्डस्वर्थ के पास स्मार्ट फोन नहीं था, नहीं तो दुनिया उनकी इस रचना से महरूम रह जाती। और शुक्र है कि विलियम वर्डस्वर्थ कोई बिल्डर नहीं थे। वरना उस घाटी में उन्हें नज़र आतीं गगनचुम्बी इमारतें, जिनमें लोगों को बसाने के लिए इन डेफोडिल्स की कब्र बनाने के सिवा कोई चारा ही नहीं था।

रविवार, 24 अप्रैल 2022

चेहरे पर पड़ा पर्दा अक़्ल पर पड़े परदे से बेहतर है

शादी के बाद हिन्दुस्तान से बाहर चली गई एक दोस्त कुछ बरस पहले अलीगढ़ में आबाद हो गई। करीब एक साल पहले उसका फ़ोन आया कि कॉलेज से उसे कुछ पेपर्स चाहिए। अगर हम उसकी कुछ मदद कर दें तो उसे लखनऊ की भाग दौड़ से राहत मिल जाएगी। इस सिलसिले में जब कॉलेज का नंबर तलाश किया तो मालूम हुआ कि वहां लैंडलाइन फ़ोन नहीं है। अफ़सोस और गुस्से से ज़्यादा शर्मिंदगी का एहसास हुआ। भला इतने पुराने और मशहूर कॉलेज में लैंडलाइन फ़ोन न होने की क्या मजबूरी हो सकती है? 

किसी की मदद से ऑफिस के क्लर्क का नंबर मिला। काम की बात के बाद जब कॉलेज के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि इतिहास रचने वाले कॉलेज का भूगोल भी चरमरा चुका है। इस अफ़सोस में तय किया कि वहां जाकर हालात का जायज़ा लेना चाहिए। 

इसके बारे में ये ज़रूर जान लीजिए की पुराने लखनऊ के मंसूर नगर इलाके में बने इस का कॉलेज का नाम म्युनिसिपल गर्ल्स इंटर कॉलेज है। ये इमारत और इलाक़ा 250 बरस पहले कश्मीर से आने वाले कश्मीरी पंडित और मुसलमानों की उस दास्तान के खुशगवार पहलू को पेश करता है जिन्हे विवेक अग्निहोत्री जैसे लोग कभी देख ही नहीं सकते। और यही वह जगह है जहां सख्त परदे में पढ़ने वाली लड़कियों ने दुनिया में अपना नाम रोशन किया। 

यहां से पढ़कर निकले बच्चे हमेशा ये साबित करते रहे हैं कि चेहरे पर पड़ा पर्दा अक़्ल पर पड़े परदे से बेहतर है। जायज़ा लेने के लिए जब यहाँ पहुंचे तो इस इमारत को देखना किसी डरावने ख्वाब की तरह था। ब्रिटिश पीरियड की बनी इस  इमारत को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता था कि इसके कबाड़खाने में बदलने का सिलसिला कई बरसों की अनदेखी का नतीजा है। साइंस, स्पोर्ट्स और कल्चरल एक्टिविटीज़ के लिए जिस कॉलेज का एक सदी का इतिहास था वहां मौजूद दबी सहमी और घबराई लड़कियों की हालत पर कोविड महामारी का पर्दा डालना किसी तरह से समझ नहीं आ रहा था। 100 साल पुरानी लाइब्रेरी गायब हो चुकी थी, स्पोर्ट्स और म्युज़िक के कमरे में भी लोहे की बेंच और मेज़ जड़ी हुई थीं। आंखें नम कर देने वाला मंज़र यहां की लेबोरेट्री पेश कर रही थीं। जिन चमचमाती लेबोरेट्री ने हमें डार्विन, लेमार्क, न्यूटन, आइंस्टीन जैसे ढेरों नामों के करीब पहुँचाया था, आज उसके पास जाने की भी इजाज़त नहीं थी। क्यूंकि ईमारत के इस हिस्से के किसी भी लम्हे गिरने की उम्मीद यहाँ का हर स्टाफ लगाए बैठा था। 

प्रिंसिपल की बेहिसी इस लिए और ज़्यादा बुरी लगी क्योंकि वह खुद भी यहीं की पढ़ी थी और उनकी मां भी यहां से रिटायर हुई थीं। फिलहाल उन्हें भी बस किसी तरह अपने रिटायरमेंट का इन्तिज़ार है। उनके अलावा यहां कोई भी परमानेंट टीचर नहीं।  

मेरा ही क्या इस इलाके में रहने वाले कई नस्लों के बाशिंदे इस कॉलेज के शानदार इतिहास से वाक़िफ़ है और आज भी किसी को छेड़ भर दीजिये तो यहां के फख्र दिलाने वाले यादगार किस्सों की भरमार है उनके पास। और हम शायद किस्सा अल्फ़ लैल (जिसे आम भाषा में किस्सा अलिफ़ लैला) तैयार कर सकते हैं यहाँ के बारे में। 

बहरहाल उसी लम्हा इस पर डॉक्युमेंट्री बनाने का फैसला किया, जिसे पूरा करने में साल लग गया। इसे बनाने की दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं रही। जिसका ज़िक्र फिर कभी।  

इसे बनाने में कई लोगों ने रोड़े डाले तो कई ऐसे भी थे जिन्होंने हर मुमकिन कोशिश से उस रास्ते को आसान किया। मेरी रिसर्च, स्क्रिप्ट और वॉइसओवर पर शूटिंग और एडिटिंग की ज़िम्मेदारी Mrityunjay Singh और Priyanshu AP Singh ने निभाई। कई जगह से रिजेक्ट होने के बाद जब हम पूरी तरह से मायूस हो चुके थे तो Naish Hasan के साथ Amar Ujala जाना हुआ और शुक्रिया आपका  Roli Khanna जो इसे अपने प्लेटफार्म पर जगह दी। 

https://www.youtube.com/watch?v=ceireIm-Po0&t=1263s


रविवार, 10 अप्रैल 2022

सुभाषिनी- पटकथा

एक चीनी कहावत है कि अगर आप एक साल के लिए मंसूबा बना रहे हैं तो चावल लगाएं। अगर ये ख़याल दस बरस के लिए है तो पेड़ लगाएं और अगर आप 100 बरस के लिए इरादा कर रहे हैं तो तालीम दें।

अब सवाल उठता है कि अगर इससे ज़्यादा अरसे का इरादा बनाना हो तो क्या करें? इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही जवाब है कि कहीं भी और कभी बनाया जाने वाला मंसूबा अगर तालीम से जुड़ा है तो यही मुकम्मल है।

20 वीं सदी की शुरुआत में एक ऐसा ही मंसूबा आयरिश लेडी डॉ. एनी बेसेंट और पं.सूरज नारायण बहादुर ने बनाया। स्वामी विवेकानंद से मुतास्सिर एनी बेसेंट 1893 में वेदों को गहराई को जानने हिन्दुस्तान आईं थी। वीमेन एजुकेशन और एम्पॉवरमेंट की रहनुमा एनी बेसेंट ने थियोसोफिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के ज़रिए इस फिलॉस्फी को आम इंसान तक पहुंचाने का बेड़ा उठाया। एनी बेसेंट ने पुराने लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ला में रहने वाले जज पं.सूरज नारायण बहादुर को इस सोसाइटी का सेक्रेट्री बनाया।

कश्मीरी मोहल्ला की तारीख़ खंगालने पर जो जानकारी मिलती है उसके मुताबिक़ नवाब आसिफुद्दौला ने 1775 में जब अपनी राजधानी फैज़ाबाद से लखनऊ की तो उस वक़्त उनके साथ बड़ी तादाद में हिन्दू और मुसलमान कश्मीरियों ने भी इस शहर की तरफ कूच किया। ये वो कश्मीरी  खानदान थे जो कश्मीर को अलविदा कहने के साथ नार्थ इंडिया के किसी भी हिस्से में बसने को राज़ी थे। तहज़ीब, तौर तरीके और रंग रूप के मामले में इन कश्मीरियों का रहन सहन अवध के नवाबों से बहुत मेल खाता था। यही वजह थी कि इन कश्मीरियों का नवाबी घरानों में उठना बैठना और यहां तक कि उनकी अदालतों में ऊंचे ओहदों पर पहुंचना मुमकिन हुआ।

डॉ एनी बेसेंट ने पं.सूरज नारायण बहादुर को मिशनरी जज़्बे के तहत कश्मीरी लड़कियों के लिए रस्मी तालीम देने की गरज़ से इस इलाके में एक स्कूल शुरू करने का मशवरा दिया।

नतीजतन साल 1900 में पं सूरज नारायण बहादुर ने कम्युनिटी की लड़कियों की रस्मी तालीम की इब्तिदा के लिए अपनी ही हवेली में एक मुक़ामी प्राइमरी स्कूल शुरू करने का फैसला किया।

हवेली में स्कूल की शुरुआत किये जाने की जानकारी हमें ikashmir.net पर डॉक्टर बैकुंठ नाथ शर्ग़ा के ब्लॉग से मिलती है। 1938 में पैदा हुए डॉ शर्ग़ा ने 1967 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से केमेस्ट्री में पीएचडी की और 1973-76 तक लखनऊ यूनिवर्सिटी एसोसिएटेड कॉलेज टीचर एसोसिएशन (LUACTA) के जनरल सेक्रेट्री रहे हैं। साथ ये थियेटर की दुनिया का भी जाना माना नाम बने।

डॉक्टर बैकुंठ नाथ शर्ग़ा अपने ब्लॉग में लिखते हैं कि हवेली में स्कूल की शुरुआत पर पंडित सूरज नारायण बहादुर को अपनी ही बिरादरी के लोगों की मुख़ालिफत का सामना करना पड़ा। ये वो दौर था जब लड़कियों के लिए परदे और पाबंदियों का दायरा बहुत सख्त हुआ करता था। शादी से पहले उन्हें मज़हबी जानकारी के अलावा खत लिखने भर की पढ़ाई के साथ कुछ हिसाब किताब सिखा दिया जाता था, जो घरदारी में काम आ सके।

आखिरकार इन हालात में पं. सूरज नारायण बहादुर के पास अपनी बहुओं को इस स्कूल में दाख़िल कराने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। ये तदबीर काम आई और दूसरी बच्चियों के दाखिले के इमकान बने। धीरे-धीरे पास पड़ोस और बिरादरी के दूसरे लोगों ने भी अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए इस स्कूल में भेजने की हिम्मत की।


स्कूल से छपने वाली सालाना मैगज़ीन सुभाषिनी से मिली जानकारी के मुताबिक़ सन 1904 में डॉक्टर एनी बेसेंट की सलाह पर जज सूरज नारायण बहादुर ने कुछ और कश्मीरियों से मशवरा करने के बाद एक प्राइमरी वर्नाक्यूलर स्कूल की नीव डाली। जिसमे उनकी बेटियों के अलावा पास पड़ोस की बच्चियां भी तालीम हासिल करने आ सकें। स्कूल से वाबस्ता लोगों के लिए ये फख्र की बात है कि इस स्कूल की बुनियाद रखे जाने के एक बरस बाद किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज और 16 बरस बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी वजूद में आए।   

15 लड़कियों के दाखिले के साथ स्कूल शुरू हुआ, मगर इस शुरुआत के लिए पंडित सूरज नारायण बहादुर को तमाम दुशवारियों का सामना करना पड़ा। रिहाइशी लोगों की दलील थी कि अगर उनकी बेटियां स्कूल जाएंगी तो उनसे शादी कौन करेगा?

साल 1905 में मिस बिर्केट (Birkett) को स्कूल में 25/- महाना की तनख्वाह पर यहां अंग्रेजी सिखाने के लिए रखा गया।

अक्टूबर 1905  तक स्कूल आने वाली बच्चियों की तादाद 29 से बढ़कर 39 हो गई जिसके चलते मिडिल सेक्शन शुरू किया गया। इसी वक़्त मिस रे (Miss Rae) ने बतौर इन चार्ज यहाँ की ज़िम्मेदारी संभाली।

साल 1908 तक ये स्कूल उम्मीदों से कहीं ज़्यादा आगे जा चुका था और ये वही वक़्त था जब इस फलते फूलते स्कूल को फाउंडर ने लखनऊ नगर पालिका को सौंप दिया।

साल 1910 में एजुकेशन कमिटी ऑफ़ म्युनिसिपल बोर्ड ने एक रेज़्युलेशन के तहत जिन चंद मांगो को सामने रखा वह ये थीं -

"कि कश्मीरी मोहल्ला वर्नाक्युलर मिडिल गर्ल्स स्कूल को बेहतर तनख़्वाह और एक बड़ा स्टाफ देकर सुधार के साथ इसे एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल गर्ल्स स्कूल बनाया जाए।''

''स्कूल की ईमारत बनाने के लिए ज़मीन का एक महफूज़ प्लॉट हो जिसकी ख़रीदारी के लिए डायरेक्टर पब्लिक इंस्ट्रक्शन से ग्रांट तलब की जाए।

महज़ 7 बरसों में ये स्कूल कामयाबी की एक सुनहरी दास्तान लिख चुका था। 23 दिसंबर 1911 की यादगार तारीख़। बड़े बड़े मैदानों के साथ बरामदों और आठ बड़े कमरों वाले इस स्कूल को लेडी पोर्टर ने खोला। उस वक़्त स्कूल की इस ईमारत की कीमत थी 15928/-। यहां पढ़ने वाली बच्चियों की तादाद बढ़ कर 90 हो चुकी थी और इन्हें पढ़ाने के लिए एक हेड मिस्ट्रेस के साथ 6 टीचर्स का स्टाफ मौजूद था। अब इस स्कूल के पास एजुकेशन डिपार्टमेंट की तरफ से मिडिल स्कूल की मान्यता थी। बहुत ही कम लोग जानते हैं कि हिन्दुस्तान के पहले प्राइम मिनिस्टर की होने वाली बीवी कमला नेहरू भी इसी दौरान यहीं अपनी शुरूआती पढ़ाई कर रही थीं।

फ़रवरी 1915 में सरकार की तरफ से अमरीका से ट्रेंड प्रिंसिपल मिसेज़ नेफ़ को इस स्कूल में अपॉइंट किया गया, साथ ही 5000 रुपयों की ग्रांट भी दी गई। लड़कियों के लिए इंडोर और आउटडोर एक्टिविटीज़ का एहतिमाम किया गया।

1923 का साल एक बार फिर से इस स्कूल को हमेशा के लिए फख्र करने का मौक़ा दे गया। इस बरस स्कूल में गर्ल गाइड मूवमेंट शुरू हुआ और स्कूली लड़कियों ने म्युनिसिपल एजुकेशनल एक्ज़ीबीशन के तहत "पर्दा डे कॉम्प्टीशन" में हिस्सा लेकर 16 मेरिट प्राइस जीते।

साल 1924, मिस रोज़लाइन एंगेल्स (Rosline Engles) ने बतौर प्रिंसिपल इस स्कूल की ज़िम्मेदारी संभाली।

1925 में नवीं क्लास की शुरुआत हुई मगर 1927 में इसे बंद करना पड़ा।

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के रिटायर्ड ऑफीसर राजीव प्रसाद 1915 में लिखे अपने ब्लॉग में इस स्कूल के इतिहास पर रौशनी डालते हैं। 1930 से 1967 तक स्कूल की प्रिंसिपल मिसेज़ द्रौपदी दास गुप्ता रहीं। ये राजीव प्रसाद की नानी थीं और साल 1929 में इन्होंने बतौर मैथ्स टीचर यहां का चार्ज संभाला था। 1930 में स्कूल की प्रिंसिपल मिसेज़ रोज़लाइन एंगेल्स को स्कूल छोड़ना पड़ा और ये ज़िम्मेदारी मिसेज़ गुप्ता को मिली। मिसेज़ गुप्ता इस ओहदे पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला थीं। उस वक़्त स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों की तादाद 149 थी।  


ब्लॉग में अपनी नानी का ज़िक्र करते हुए राजीव प्रसाद लिखते हैं कि- ' कुछ ब्रिटिश और भारतीय सिविल सर्वेंट एक प्रोग्राम में मेरी नानी से मिले , यहाँ पर नानी अपने मेज़बान से तालीमी मुद्दों पर बात कर रही थीं। उस वक़्त मौजूदा प्रिंसिपल मिस एंगेल्स स्कूल को छोड़ना चाहती थीं। इन ब्रिटिश सर्वेंट ने नानी से इस इंस्टीट्यूट में शामिल होने और लड़कियों की एजुकेशन के लिए खुद को वक़्फ़ करने की पेशकश की।"

सन 1931 तक लड़कियों के स्कूल आने का ज़रिया हाथ से खींचा जाने वाल ठेला था जिन्हें चलाने का ज़िम्मा भी औरतों का था। उन दिनों की एक दिलचस्प बात ये थी कि मिसेज़ गुप्ता ने ख़ास तौर से डिज़ाइन किए गए इन हाथ से चलने वाले ठेलों को बनवाया था। मिसेज़ गुप्ता की नवासी डॉक्टर राका अपनी यादों के हवाले से उस दौर का ज़िक्र करती हैं कि किस तरह नानी उसूलों की पाबन्दी के साथ अनुशासन डिसिप्लिन के मामले में भी बड़ी ही सख्ती का रवैया रखती थीं।

इसी बरस मिसेज गुप्ता ने नगरपालिका बोर्ड से 475 /-पर मंथ के खर्चे पर दो स्कूल बसें किराए पर दिए जाने पर जोर दिया, जो लड़कियों को स्कूल लाने और वापस ले जाने की सहूलियत दे सके। 11 मार्च 1932, ये वो तारीख थी जब स्कूल ने अपनी बस खरीदी। और इसी साल स्पोर्ट्स और कल्चरल एक्टिविटीज़ को लेकर वॉलीबॉल, बैडमिंटन जैसे कई इनडोर और आउटडोर खेलों की शुरुआत हुई।

गर्ल गाइड इनिशिएटिव में लड़कियों की शानदार परफॉर्मेंस रही। जिसकी बदौलत 14 दिसंबर 1932 की तारीख इस स्कूल के लिए यादगार बन गई, मिसेज मोती लाल नेहरू जो कि कश्मीरी थीं, उन्होंने न सिर्फ इस स्कूल का दौरा किया बल्कि बच्चों के साथ पूरा दिन बिताया।

स्कूल की तारीख में साल 1933 इसलिए यादगार बना क्योंकि स्कूल की गर्ल गाइड्स ने लेडी हाईली (Lady Hailey) चैलेंज शील्ड पर फतह हासिल की।

1935 में एंग्लो-वर्नाक्यूलर मिडिल एग्जाम की मेरिट लिस्ट में स्कूल की एक बच्ची का नाम शामिल हुआ।

1936 में म्यूजिक क्लासेस का आगाज़ हुआ।

साल 1937 दोहरी खुशिया लेकर आया। स्कूल की कुछ लड़कियों ने यू.पी. इंडस्ट्रियल एक्सिबिशन में हिस्सा लिया जिनमे से चार सिल्वर मैडल की हक़दार बनीं और यही वो साल था जब एक बार फिर से नवीं क्लास की शुरुआत हुई।

साल 1938, स्कूल की तारीख में एक और मील का पत्थर जड़ गया। हाई स्कूल के इम्तिहान में शामिल 6 लड़कियों वाले पहले बैच का 100 फीसद कामयाब नतीजा मुस्तकबिल की अनगिनत कामयाबियों का इशारा कर रहा था।

अगले 2 बरसों में लड़कियों की परफॉर्मेंस पर इस इंस्टीट्यूशन को यूपी बोर्ड की तरफ से हाई स्कूल के लिए रिकग्नीशन मिल गया।

टीचर्स की मेहनत, लगन और बच्चियों के जोश की बदौलत स्कूल हर दिन कामयाबी की नई तहरीर लिख रहा था।

जिस वक़्त मुल्क की ग़ुलामी की बेड़िया टूटीं उस वक़्त स्कूल की कामयाबियों की परवाज़ उसके हिस्से के कई और आसमान खोल चुकी थी। 1947 में न सिर्फ यहां पढ़ने वाली लड़कियों की तादाद 406 हो गई थी बल्कि दो और पायदान की तरक्की करता हुआ स्कूल इंटरमीडिएट की क्लासेस शुरू कर चुका था।

स्कूल को इंटर कॉलेज क्लासेस की तामीर के लिए 9150/- की सरकारी ग्रांट मिली और इसी वक़्त कॉलेज का नया नाम म्यूनिसिपल गर्ल्स इंटर कॉलेज पड़ा। दस्तावेज़ बताते हैं कि ज़रूरत की बाक़ी रक़म का इंतिज़ाम अंदरूनी ज़रिए से किया गया।

1950 में इंटरमीडिएट की दो स्टूडेंट पूरे स्टेट में उर्दू में सबसे ज़्यादा नंबर लाईं, 1952 में स्पोर्ट्स और दूसरी एक्टिविटीज़ में मेडल बटोरे और 1953 में कॉलेज अपनी खूबियों के बल पर हाई स्कूल एग्जाम के लिए सेंटर के लायक साबित हुआ।

हाई स्कूल के लिए साइंस क्लासेस का आगाज़ 1956 में हुआ और 1958 में मेडिकल में मुस्तक़बिल तलाशने वाली लड़कियों के लिए इंटरमीडिएट दर्जे की साइंस की शुरुआत के साथ एक साइंस लैब भी तामीर हुआ। इन सबके साथ अगले बरस तक यूनिफार्म, प्रेयर और फिज़िकल ट्रेनिंग भी यहां के रूटीन का हिस्सा बन चुकी थी।

(1960-61 में कश्मीरी मोहल्ला गर्ल्स कॉलेज का पहला साइंस ग्रुप)

साल 1972 में बायोलॉजी फैकल्टी में जॉइनिंग लेने वाली मिस शहनाज़ ज़रीना खान का कहना है कि हमारे स्कूल की लेबोरेट्री शहर की सबसे रिच लेबोरेट्री हुआ करती थी। फ़िज़िक्स, केमेस्ट्री और बाइलॉजी की इन लेबोरेट्री में बच्चों की बेहतरीन ट्रेनिंग के लिए आला दर्जे के सभी टूल, फर्नीचर और साफ सुथरे हॉल  का इंतिज़ाम किया गया था।

कॉलेज आला तालीम के साथ खेल और अदब के मैदानों में कामयाबी का परचम लहरा रहा था। इसमें सेंट जॉन एम्बुलेंस की सरगर्मियां और पढ़ाई के शानदार नतीजे भी शामिल थे।

1966 में कॉलेज ने हैदराबाद में होने वाले आल इंडिया कम्पटीशन में ऑल इंडिया राज कुमारी अमृत कुमारी ट्रॉफी जीती।

01मार्च1967 को मिसिज़ गुप्ता रिटायर हुईं। उनकी 37 बरस और 3 माह की मेहनतों का नतीजा था कि इस वक़्त कॉलेज में 1133 बच्चियां तालीम हासिल कर रही थीं। हाई स्कूल की साइंस लेबोरेट्री के वास्ते 15000/- की रकम के साथ कॉलेज 33636/- की ग्रैंड हासिल कर रहा था। यक़ीनन मिसिज़ ओ पी गुप्ता की सरपरस्ती में इस कॉलेज ने अपना उरूज हासिल किया। मिसिज़ ओ पी गुप्ता के रिटायरमेंट का वक़्त वो बरस था जब कॉलेज को लखनऊ रीजन में 12000/- फंड इस कामयाबी पर मिला था क्योंकि यहां के बच्चों ने साइंस में सबसे शानदार नतीजे स्कोर किये थे।

कॉलेज स्टाफ की तरफ से उनको पेश किये गए अलविदाई पैग़ाम की तहरीर के चंद अलफ़ाज़ -

"हम लंबे अरसे तक फख्र के साथ याद रखेंगे कि प्रिंसिपल के तौर पर आप हमेशा ड्यूटी के लिए वक़्फ़ थीं। तालीम और इस इंस्टीट्यूशन के लिए आपने अड़तीस बरस तक अपनी खिदमतें वक़्फ़ कर दीं। कभी भी किनाराकशी या आराम की ख्वाहिश नहीं की, कभी थकान महसूस नहीं की- आख़िरी घंटे तक। हकीकत में आपने इस इंस्टीट्यूशन को बनाया, फेहरिस्त में बच्चों की गिनती15 से आग़ाज़ करने वाले इस स्कूल को 1133 तक पहुंचा दिया। यह छोटे कमरों वाले एक सेट से एक शानदार और वेल फर्निश्ड स्कूल में तब्दील हुआ। मिडिल स्कूल से आग़ाज़ करने वाली ये ईमारत आर्ट्स और साइंस के साथ एक इंटरमीडिएट कॉलेज बन गया, जो कि कोई मामूली कामयाबी नहीं है।"

मिसेज़ गुप्ता ने बतौर प्रिंसिपल जिस वक़्त स्कूल की ज़िम्मेदारी संभाली थी उस वक़्त 149 बच्चे, सख्त पर्दा, चारों सिम्त खुले मुखालिफत के मोर्चे और 2-3 चुनिंदा सब्जेक्ट थे। मगर अपने अज़्म, हिम्मत और मेहनत के बल पर उन्होंने इस स्कूल में रौशन तालीम की मशाल को ऐसा जगमगाया जो आज भी सारी दुनिया में अपनी चमक बिखेर रही है।

मिसेज़ गुप्ता के रिटायरमेंट के वक़्त कॉलेज के हर स्टाफ और मुलाज़िम की आंख नम और दिल उनके ज़रिए मिलने वाली कामयाबियों का शुक्रगुज़ार था। एक कट्टर आर्य समाजी ज़िंदगी बिताने वाली मिसेज़ गुप्ता ने उनकी याद में कॉलेज में स्टेच्यू लगाने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वह "कर्म" में यकीन रखती थीं। 17 मई1979 को मिसेज़ गुप्ता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

मिसेज़ गुप्ता के बेटे कर्नल वी.के. गुप्ता ने मिसेज़ गुप्ता की मौत के बाद उनके नाम पर दो स्कॉलरशिप शुरू कीं - हर साल ये स्कॉलरशिप एक टॉपर स्टूडेंट के लिए और दूसरी मुफ़लिस मगर होनहार बच्ची के लिए थी। साल 2010 में बतौर प्रिंसिपल रिटायर होने वाली मिसेज़ शहनाज़ ज़रीना खान बताती हैं कि स्कूल से रिटायरमेंट के वक़्त तक उन्होंने स्कॉलरशिप के फंड को पूरी तरह मेनटेन रखा था।

1967 से 1982 तक इस स्कूल की रहनुमाई प्रिंसिपल मिसेज़ अख़्तर शकील के हाथों में रही। विरासत में मिली इस अमानत की मिसेज़ शकील ने अपने दौर में भरपूर निगेहबानी की। तालीम, डिसिप्लिन और तमाम एक्टिविटीज़ को उन्होंने मिसेज़ गुप्ता की तर्ज़ पर बरकरार रखने की मिसाल कायम की।


1982 में कॉलेज के प्राइमरी सेक्शन को अलग किया गया अब स्कूल एक ही ईमारत में दो शिफ्ट में चलने लगा। 

साल 1983 से 1988 तक मिसेज़ चंद्र मोहिनी हजेला ने प्रिंसिपल के ओहदे पर रहते हुए कालेज की रवायात को बरकरार रखा। और इनके बाद मिसेज़ शांति कुमार ने साल 1988 से 2003 तक इस ज़िम्मेदारी को निभाया।


20 वीं सदी की शुरुआत में क़ायम हुए इस स्कूल ने अपने उरूज का दौर देखा था। यहां पढ़ने वाली लड़कियों ने हर मैदान में फतह का परचम फैराया। होम साइंस, म्यूज़िक, लिटरेचर के साथ फ़िज़िक्स केमेस्ट्री और बायोलॉजी की तालीम देने वाली टीचर के अलावा हर टूल और इंस्ट्रूमेंट से लैस शानदार लैब उसी आन बान और शान से अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने में मुस्तैद थे। नगर निगम की सरपरस्ती में ये कॉलेज बड़ी ही मामूली फीस के साथ बेशुमार ऐसी बच्चियों की पढ़ाई का जरिया बना हुआ था जिनके लिए शायद यहां के अलावा इतनी आला तालीम हासिल करना मुमकिन नहीं था। मगर 20 वीं सदी के खात्मे और 21 सदी की शुरुआत ने ये बता दिया था कि कामयाबी की इबारत सिर्फ अंग्रेज़ी ज़ुबान में ही लिखी जा सकती है और म्युनिसिपल गर्ल्स इंटर कॉलेज अपनी तमामतर खूबियों के बावजूद इस रेस में शामिल न हो सका।

लगभग हर मोर्चे पर जीत हासिल करने वाले इस कॉलेज में अब सिर्फ वही बच्चे दाखिल होने लगे जो अंग्रेजी तालीम के लिए भारी कीमत अदा नहीं कर सकते थे। यहां धीरे धीर उन बच्चियों की तादाद बढ़ने लगी जिनके घरों में तालीम से पहले ज़िंदगी की दूसरी ज़रुरियात का इंतिज़ाम अहम था। और इनमे से ज़्यादातर सरपरस्तों को तालीम का ठप्पा महज़ इस लिए चाहिए था ताकि बेटी की शादी के वक़्त उसे अनपढ़ कहने से बचा सकें और इस पर बिलकुल भी लागत न आये। इन सबके बावजूद भी टीचर्स की मुस्तैदी और लगन का नतीजा था जिसने कई ज़हीन बच्चों को तराशा और उस मुक़ाम तक पहुंचाने में मदद की जहां उन्होंने कॉलेज का नाम रौशन किया। 

साल 2007 में मिसेज़ शहनाज़ ज़रीना खान ने बतौर प्रिंसिपल स्कूल का शताब्दी समाहरोह मनाया तो उस समय मौजूद सभी यादगार शख्सियतों को बुलाया था। जिसमें स्कूल फाउंडर सूरज नारायण बहादुर के पोते डॉ हरी नारायण बहादुर, मिसेज़ अख्तर शकील, महापौर दिनेश शर्मा के अलावा कई पुरानी टीचर्स और स्टूडेंट ने हिस्सा लिया। जुलाई 2006 से जून 2010 तक प्रिन्सिपल रही मिसेज़ शहनाज़ ज़रीना खान ने अपनी प्रिन्सिपलशिप के दौरान स्कूल की कम हुई साख को एक बार फिर से उरूज पर लाने की हर मुमकिन कोशिश की। 

मिसेज़ ओ पी गुप्ता की तर्ज़ पर कर्म को अहमियत देते हुए वो न सिर्फ बच्चों की तालीम बल्कि स्पोर्ट्स और कल्चरल एक्टिविटीज़ के ग्राफ को फिर से उन्ही ऊंचाइयों तक लाने की जिद्दोजहद में लगी रहीं। वॉटर हार्वेस्टिंग की कोशिश के साथ इंटर कालेज को डिग्री कॉलेज बनाने का हर जतन उन्होंने किया। यहां तक के जिस दिन उनका रिटायरमेंट होना था उस दिन भी अपने ही अलविदाई प्रोग्राम में शरीक होने से बजाए उन्होंने दफ्तरों के चक्कर काटते हुए गुज़ारा। उनकी सारी प्लानिंग, प्रेजेंटेशन और जी तोड़ कोशिशें नाकामयाब रहीं और उन्हें डिग्री कॉलेज की मंज़ूरी न मिलने का कोई माकूल जवाब तक न मिल सका। 

बातचीत और शूटिंग के इस सिलसिले में जब  स्कूल के प्राइमरी सेक्शन को कवर किया तो कोविड के दिनों में होने वाली अनदेखी से उबरते प्राइमरी स्कूल की प्रिंसिपल ने एक बार फिर से बच्चों के बढ़ते दाखिले की जानकारी दी साथ ही उन्होंने स्कूल और बच्चों से जुड़े अपने मुद्दे भी बयान किये।

जबकि इंटर सेक्शन से हमें इस तरह की कोई जानकारी नहीं मिल सकी। स्कूल का इतिहास, अवार्ड, विज़िटर बुक भी स्कूल में नहीं मिली। फ़िज़िक्स और केमेस्ट्री लैब के ताले इस वजह से नहीं खोले जा सके क्यूंकि इमारत का ये हिस्सा इतना कमज़ोर हो गया है कि किसी भी लम्हे गिरने का खतरा है।

बायलॉजी लैब की तस्वीरें लेना इसलिए मुमकिन हुआ क्यूंकि यहां का दरवाज़ा टूटा हुआ था। पुरानी लाइब्रेरी को क्लास में तब्दील कर दिया गया है। म्यूज़िक रूम और कंप्यूटर रूम की भी कवरेज मुमकिन नहीं हो सकी। स्कूल की बच्चियों को दी जाने वाली स्कॉलरशिप की जानकारी हमें नहीं मिल सकी।

एक नायाब विरासत को समेटे इस कालेज से दुनिया को रूबरू कराना हमारा मक़सद था जिसके शानदार मुस्तक़बिल की ख्वाहिश इस स्कूल से वाबस्ता हर शख्स और यहां से तालीम पाने वाली हर हस्ती की दुआ है। कॉलेज के शताब्दी समारोह में शामिल होने वाले डॉ हरी नारायण बहादुर के दिल से निकलने वाले ये लफ्ज़ हर किसी को आमीन कहने पर मजबूर करते हैं। 

''ऐ खुदा अपनी अदालत में मेरी जमानत रखना

मैं रहूं या न रहूं इस कालेज को सलामत रखना ''


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रविवार, 13 फ़रवरी 2022

एक चीज़ होती है....

एक चीज़ होती है 'लॉजिक' और इसकी मदद से बड़ी ही आसानी से स्याह को सफेद साबित कर दिया जाता है। एक चीज़ होती है 'विज्ञान' जहां बात परिकल्पना से शुरू होती है और सिद्ध किये जाने तक जूझती रहती है। एक चीज़ होती है 'कला' जो कि ख्यालों में परवान चढ़ती है। मगर हर कला चाहे वह पैर की एक धमक से बेशुमार घुंघरुओं में से सिर्फ एक घुंघरू को बजाने की खूबी हो या छोटे से कैनवास पर रंगों की बदौलत आसमान का नज़ारा करा देना, ये सिर्फ साधना का कमाल होता। इन सबसे इतर एक बीमारी होती है 'मुँह की बवासीर', जो बज़ाहिर हर कला और साधना पर हावी होती है और इसे ही इस दौर में सबसे ज्यादा सहूलियतें मिली हैं।


परंपरा के नाम पर ढकना और आधुनिकता के नाम पर कपड़ों को उतरना अगर सही है तो लॉजिक कहती है कि चीरहरण को फेनिज़्म की अदालत में कुछ रियायत मिलनी चाहिए। इस दलील के साथ कि कौरवों की नियत भले ही बुरी रही हो मगर कई मीटर की साड़ी पर उन्होंने हमला किया।  
विज्ञान की बात करें तो चार्ल्स डार्विन का कहना है कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है।  डार्विन का 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' यानी योग्यतम की  उत्तरजीविता का सिद्धांत या जिसे नेचुरल सेलेक्शन कहते हैं। ये थेरी संघर्ष संरक्षण की बात करती है। विज्ञान के दायरे में ही चलते हुए अगर न्यूटन के एक्शन रिएक्शन तक आएं तो न्यूटन का तीसरा नियम कहता है कि हर क्रिया के बराबर और दिशा में विपरीत प्रतिक्रिया होनी ही है। विज्ञान का ये पहलू भी बता रहा है कि नतीजे में प्रतिरोध ही मिलेगा। जब पड़ताल साइंटिफिक पहलू पर ही हो रही है तो अनुक्रमानुपात (directly proportional) और व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) नियमों का भी जायज़ा लेते चलें। अभी तक कोई भी ऐसी दलील सामने नहीं आई है जहां ड्रेस का आईक्यू के साथ सीधा या एक बटा वाला रिश्ता सामने आया हो।
कुछ ऐसे लोग भी अपने दिल की कहने के लिए सामने आ गए हैं जिनकी नसों में पान मसाले का जूस और दिमाग़ में बीड़ी सिगरेट का धुआं भरा हुआ है। उनसे बस इतना ही कहना चाहेंगे कि किसी बहलावे में न आएं। दिल का रिमोट दिमाग़ के पास है।
सदा से अंधे कानून की क्या कहें। मुंसिफ का इंसाफ कभी इतना मशहूर न हो सका जितना ये कि 'मुंसिफ ही मेरा क़ातिल है' हुआ। हर मामले की मानिंद हिजाब का मुद्दा भी ठन्डे बस्ते की नज़र हो जायेगा, मगर दिल में ये ठेस हमेशा के लिए लग गई कि कानून और अदालत से पहले अब गुंडे और मवाली फरमान सुनाएंगे। या कह सकते हैं कि शैक्षिक संस्थानों के नियम राष्ट्रवाद के चरम वाले ज़माने में संविधान से ऊपर उठते दिख रहे है।
और मीडिया! उसकी तो बात ही न कीजिए। पुनर्जन्म और सात फन वाले नागदेवता का अवतार दिखाने के बाद उसने साइंटिफिक टेम्परामेंट अपनाया। मीडिया दो हज़ार के नोट में चिप या हाथ में मोज़े पहने एंकर का एस्ट्रोनॉट बनना दिखा सकता है मगर आम इंसान को उसके फॉर्मेट से बेदखल हुए ज़माना हो गया है।
इन सबसे ऊपर एक चीज होती है बाजार, जिसके पास इन सबको रौंद देने का हर हथकंडा होता है। इस बाजार के पास खुद को पेश करने का एक जादूभरा अंदाज़ होता है। ये जादू ऐसा दिमाग सुन्न करता है कि सोचने समझने की सलाहियत जाती रहती है। हो सके तो हिजाब के बाजार और उसके आंकड़े खुद ही तलाश लें।
इन सबसे हटकर एक बिलकुल फोकट की चीज़ होती है मुंह की बवासीर। ये छूत की बीमारी है कि नहीं, नहीं मालूम अलबत्ता डीएनए में कुछ इस तरह से पाई जाती है जिसकी रिपोर्ट कोई अल्ट्रासाउंड या एमआरआई कभी नहीं दे सकता। मगर कोरोना के डेल्टा वेरिएंट से ज़्यादा खतरनाक है और हर कोई इसकी चपेट में है। भले ही हमला माइल्ड हो। क्यूंकि इसका असर मानसिक है और मानसिक बीमारी हमारे वहां सिर्फ वही समझी जाती है जिसमे हाथ पैर बांधने की नौबत आ जाये। ऐसे में इसका वैक्सीन तो दूर बीमारी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसकी चपेट में आने वाला हर वर्ग और जाति अभी तक जो कह पाता था उसे सुनने वाले एक्का दुक्का या मुट्ठी भर होते थे। मगर सोशल मीडिया पर जबसे खटाखट करती उंगलियों को चांस मिला है तो ख़यालात का सैलाब समंदर बन गया है। इस समंदर में हर दिन तमाम ऐसे मुद्दे बह जाते हैं जो नहीं बहने चाहिए।  
हिजाब, मुसलमान, सियासत और शिक्षा को दरकिनार करते हुए एक बार उन आवाज़ों को भी तलाशा और सुना जाना चाहिए जिनके नाम पर इस बिसात को बिछाया गया है।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

ज़माने से आगे तो बढ़िए मजाज़

इश्क़ के एहसास को, वक़्त की नब्ज़ को, औरत के हक़ को और मज़लूम की आवाज़ को बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ बयान करने का सलीका मजाज़ में था। असरारुल हक़ मजाज़ तरक्की पसंद तहरीक के नुमाइंदे थे और ये वह दौर था जब इनका इन्किलाबी कलाम हर किसी के दिल में जगह बना चुका था। 

मजाज़ 19 अक्तूबर 1911 को बाराबंकी ज़िले के रुदौली क़स्बे में पैदा हुए जो इस वक़्त अयोध्या में आता है। महज़ 44 बरस की उम्र में मजाज़ इस दुनिया से कूच कर गए और उर्दू अदब का वह खज़ाना दुनिया को दे गए जिसे उनके चाहने वाले हर मुनासिब मौके पर दोहरा कर उन्हें अमर कर देते हैं। आज भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की सुबह मजाज़ की लिखी उस दुआ से होती है जिसे हर कोई नस्ल दर नस्ल दोहराना चाहेगा। 

जो अब्र यहां से उठेगा, वो सारे जहां पर बरसेगा।
हर जू-ऐ-रवां पर बरसेगा, हर कोहे गरां पर बरसेगा।

मजाज़ की ज़िंदगी उनकी शाइरी के दो हिस्से पेश करती है। पहले में वो इश्क़ में डूबा शायर नज़र आता है जबकि दूसरा हिस्सा एक तरक्कीपसंद इन्किलाबी शायर से रूबरू कराता है। 

मजाज़ के कलम की अदायगी कभी मज़दूरों के हक़ की बात करती है तो कभी ग़ुलामी से आज़ादी की मांग करती है। इसमें बराबरी से औरतों को शामिल किया जाना उनके इन्साफ पसंद दिल की दलील थी। जब वो कहते हैं -

तेरी नीची नज़र खुद तेरी असमत की मुहाफ़िज़ है 
तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था। 
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

दिलवालों की दिलदार दिल्ली से ऊबे तो मजाज़ ने उस वक़्त की बम्बई का रुख किया। दिल्ली से मजाज़ का कुछ बैर का रिश्ता था। बेशुमार लोगों की मुराद पूरी करने वाली इस नामुराद मुंबई की बेज़ारी ने उनसे ऐसा कुछ कहलवा दिया जो यादगार हुआ, और ऐसा यादगार हुआ कि हमेशा हमेशा के लिए लोगों के दिलों में दर्ज हो गया। 

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं 
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूं 
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूं, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं 

कुछ अरसे बाद मजाज़ मुंबई से लखनऊ आ गए। ये शहर उन्हें बेहद अज़ीज़ था।  ये उनकी लखनऊ से मोहब्बत ही थी जो उनके कलाम में नज़र आती है। इसी कलाम की चंद लाइनें बयान करती हैं -

फ़िरदौस-ए-हुस्न‌‌‌‌-ओ-इश्क़ है दामान-ए-लखनऊ 
आंखों में बस रहे हैं ग़ज़ालान-ए-लखनऊ 
हर सम्त इक हुजूम-ए-निगारान-ए-लखनऊ 
और मैं कि एक शोख़-ग़ज़ल-ख़्वान-ए-लखनऊ
इक नौ-बहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह 
वो नौ-बहार-ए-नाज़ कि है जान-ए-लखनऊ 
अब उस के बाद सुब्ह है और सुब्ह-ए-नौ मजाज़ 
हम पर है ख़त्म शाम-ए-ग़रीबान-ए-लखनऊ 

लखनऊ आकर मजाज़ की मयनोशी और बढ़ जाती है। सेहत बहुत ख़राब हो चुकी है। अकेलापन जानलेवा होने लगा है और ख़ामोशी ने उन्हें जकड़ लिया है। मजाज़ अपना दर्द अपने अंदर रखने के आदी थे। 1940 में मजाज़ को पहला नर्वस ब्रेकडाउन हुआ और 1952 के तीसरे ब्रेकडाउन तक आते आते वह बेहद कमज़ोर हो चुके थे। वक़्त किसी तरह भी मरहम नहीं बन पा रहा था। कुछ अरसे बाद  इसी बेरह वक़्त ने उनकी चहेती बहन सफिया को भी हमेशा के लिए उनसे जुदा कर दिया। बहन का सदमा मजाज़ की रूह को ज़ख़्मी कर गया। 5 दिसंबर 1955 को हालात ऐसे बने कि मजाज़ ने पीना शुरू किया और पीते गए। धीरे धीरे सारे साथी अलविदा कहते हुए उन्हें तनहा छोड़ गए, मगर मजाज़ का पीना जारी था। और वही हुआ जिसका अंदेशा था। शराब उन्हें पी गई। मजाज़ इस दुनिया को अलविदा कह गए। हमेशा हमेशा के लिए वो मजाज़ चला गया जो इस दुनिया के लिए कहता था -

जिगर और दिल को बचाना भी है 
नज़र आप ही से मिलाना भी है 
मोहब्बत का हर भेद पाना भी है 
मगर अपना दामन बचाना भी है 
न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए
कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है
मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है
ज़माने से आगे तो बढ़िए मजाज़
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है

रविवार, 23 जनवरी 2022

तुम क्या गए रूठ गए दिन बहार के...

आज दादी को गुज़रे 14 बरस बीत गए। इन बीते सालों में उन्हें हर लम्हा और करीब पहले से भी ज़्यादा शिद्दत से अपने साथ महसूस किया है। उनकी ज़िन्दगी की झलक को अपनी डायरी के कुछ हिस्सों के ज़रिये आप तक लाने की जसारत कर रहे है...

दादी यानी अम्मीजान। बिलकुल वैसी ही थी जैसी होनी चाहिये। चांदी जैसे बाल, माथे पर तजुर्बे की सिलवट, चेहरे और हाथ पर उम्र की झुर्रियां। 

...सूरज निकलने से बहुत पहले बेदार हो जाना और उसके बेदम होकर ग़ुरूब हो जाने के बाद भी उसी रफ़्तार से अपने गुलशन के कारोबार में मशगूल रहना। न जाने कहां से ट्रेनिंग ली थी अम्मीजान ने!!! स्याह या चांदनी रात हो, कोहरे से धुंधलाई दोपहर हो, खून जमा देने वाली सर्दी हो या थपेड़े मारती झुलसाती गर्मियां। उनके किसी मामूली से मामूली काम में ये सब खलल न डाल सके।

...अम्मीजान को उर्दू ज़बान के साथ समझौता ज़रा नही बर्दाश्त था। मजाल नहीं दौराने गुफ्तगू कोई शीन क़ाफ़ या ज़ेर ज़बर की शान में गुस्ताखी कर सके।

...मैनेजमेंट की पूरी यूनिवर्सिटी थी अम्मीजान। निगाहों से ज़ेहन के बीच का ऐसा ताल मेल कि मौजूदा दिन नहीं ज़माने की जिम्मेदारियां किसी कंप्यूटर प्रोग्रामर की तरह अपडेट।

....उनसे पांच बरस छोटा हो या पचास बरस बड़ा, उन्हें हर शख्स ने अम्मीजान का लक़ब दिया था। हत्ता की दादा ने भी मुखातिब किया तो "आपकी अम्मीजान" कह कर ही किया।

...आज होती तो 90 बरस की होती। अम्मीजान उस वक़्त भी कितनी आला सोच की मालिक थी जब मुल्क ग़ुलाम था। इसे साबित करने को बस एक ही मिसाल काफी है। पुराने लखनऊ की जिन आरामतलब गलियों में आज भी लड़कों को पढ़ाने का रिवाज नहीं वहां 75 साल पहले पैदा हुई उनकी बेटी जॉइंट मेडिकल डाइरेक्टर की पोस्ट से 2004 में रिटायर हुई।


...अम्मीजान की तारीफ यहां पर ख़त्म नहीं होती। इन तमाम ऊंचाइयों को पाने के साथ ही उन्होंने कभी अपने मज़हब, तहज़ीब, रवायत या उसूल से समझौता नहीं किया। गंगा जमुनी तहज़ीब भी हमारे घर में उन्ही के दम से थी। जिसकी बेशुमार मिसालें आज भी उनके जानने वालों के ज़ेहन में ताज़ा होंगी।

...अम्मीजान ने इरादा कर लिया कि कड़वे तेल और हल्दी वाले आलू के सालन के साथ उलटे तवे की चूल्हे वाली चपाती ही खाई जायगी, बस फिर आंगन के एक हिस्से का इंतिखाब हुआ, मिटटी लायी गई, एक जानकार की सरपरस्ती में चूल्हे की बुनियाद पड़ी और तामीर अम्मीजान के हाथों हुई। इतना ही नहीं जब तक सेहत ने इजाज़त दी उसकी मरम्मत भी होती रही। बात सिर्फ यहीं पर ख़त्म नहीं होती। क़रीबी ही नहीं किसी दूर दराज़ वाले को भी अगर ये चूल्हा पसंद आ गया तो जब तक बन कर उसके घर न पहुंच जाए अम्मीजान की रूह बेचैन रहती।

...अम्मीजान कार्ल मार्क्स से करीब 100 साल छोटी रही होंगी। जिस सवाल ने मार्क्स को बेचैन किया, वतन छोड़ने पर मजबूर किया और तब जाकर मार्क्सवाद सामने आया, उस मार्क्सवाद को हमने अपनी आंखों से अम्मीजान की ज़िंदगी में रचा बसा पाया। अगर अम्मीजान बड़ी होती तो हम मार्क्सवाद को राबियावाद का नाम देते। उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं था कि मुख्तार साहब (दादा) के घर में गंदुम या आलू के बोरे इफरात  रहें और पास पड़ोस में मुफलिसी। उनके अंदर का साम्यवाद दादा की गैरमौजूदगी में चीज़ों का इस तरह हिस्सा बांट करता कि किसी तरह उनका ये अरमान पूरा हो जाए कि सबको सबकुछ मिल सके। ईद पर दादा से लेकर जमादार तक को 5 रुपये का सिक्का मिलता था जो बाद में 10 रुपये हो गया था।

...अम्मीजान की जिंदगी के तमाम फलसफों में एक था 'न बैठेंगे न बैठने देंगे।' यही वजह है कि उनसे वाबस्ता हर शख्स आज तक अपने दिल में उनके साथ गुज़रे तमाम लम्हो को महफूज़ किये है। जब कभी वो फुर्सत में होती तो अपने ये पसंदीदा अलफ़ाज़ ज़रूर दोहरातीं ... बदल जाये अगर माली...

आज दादी नहीं हैं। वो दौर भी नहीं है।... और इसीलिए किसी से कोई शिकायत भी नहीं है..

(23 जनवरी 2019 में फेसबुक पर लिखी पोस्ट)

https://www.facebook.com/khan.suboohi/posts/2648228905193164 

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

'83' मतलब 'वी हियर टू विन'

ज़िंदगी के सबसे कीमती लम्हे वो होते हैं जब नम आंखों को पोछने के लिए ताली बजाते हाथों की मदद लेनी पड़े। इन लम्हों को मयस्सर कराया है कबीर खान ने और इसका जरिया बनी है स्पोर्ट ड्रामा मूवी '83'। 

1983 में खेला गया ये मैच मेरी याददाश्त में नहीं मगर बरसों तक चढ़े रहे इसके खुमार के तमाम मंज़र आज भी दिल और दिमाग़ में महफूज़ है। हालात को देखते हुए इसे फोटो जर्नलिज़्म की कंगाली का दौर कहा जा सकता है क्यूंकि तब डीआरएस और ड्रोन कैमरा तो दूर मैच की ख़ास तस्वीरें ही मुहैया होना बड़ी बात रही होगी। मगर कैमरे की बदौलत कैद हुए जितने भी लम्हे थे, वो सब हज्जाम और चाय की दुकान से लेकर स्टेशनरी के सामान पर बरसों बरस छाये रहे थे। 

स्पोर्ट्स स्टार और क्रिकेट सम्राट जैसी मैगज़ीन इस बात पर बिक जाती थीं कि इस बार बीच के पन्ने पर किस खिलाड़ी की तस्वीर निकली है। ये एक्शन तस्वीर दुकान, घर और हॉस्टल की दीवारों की सजावट हुआ करती थी। 

तब फिरंगियों के दिए ज़ख्मों के चश्मदीद गवाह मौजूद थे और सरहद पार की खलिश को नासूर बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई थी। मैच के अच्छा या बुरा होने पर उनकी बीवियों को राष्ट्रीय चुड़ैल घोषित करने वाली नस्ल भी वजूद में नहीं आई थी। इतिहास में खुरपेंच तलाशकर नायिकाओं को शूर्पणखा बना देने वाली सेनाओं का उदय हुआ था। 

कबीर खान ने अपनी पूरी सलाहियत इतिहास के इस सुनहरे हिस्से के रिक्रिएशन में झोंक दी है। जिस बारीकी से उन्होंने स्पोर्ट ड्रामा और उससे जुड़ी दुनिया की रिसर्च की है वो क़ाबिले तारीफ है। और इतनी ही तारीफ के हक़दार हैं फिल्म के अहम किरदार कपिल देव यानी रणवीर सिंह। मेकअप के परफेक्शन ने बाल और दांत ही नहीं आंखों की रंगत तक के साथ इंसाफ किया है। कपिल की तरह ही अलफ़ाज़ अदायगी से लेकर कर उनकी नटराज शॉट तक को जिस तरह रणवीर ने जिया है उसके लिए लाजवाब और बेमिसाल लफ्ज़ छोटे हैं। यहां कपिल हीरो ज़रूर हैं मगर फिल्म का फ्रेम हर किरदार को बराबर की अहमियत देता है। शूटिंग के इस गुज़रते फ्रेम में कब 1983 की असली वीडियो क्लिप या तस्वीर आकर गुज़र जाती है, उससे कहीं भी फिल्म के फ्लो में कोई जर्क नहीं आता बल्कि इतिहास का ये गोता दिल जीत लेता है। 

यादों की राहों से गुज़रती फिल्म तंग गलियों के सफर पर चलती हुई अपनी स्क्रिप्ट में बहुत कुछ समेट लेती है। मज़हब, जात और ओहदे से परे ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न का रुख किये हिन्दुस्तानियों के झुंड के झुंड। रेडियो नेटवर्क की हदों को तलाशते हिमालय पर मुस्तैद फौजी। स्पॉन्सर्ड स्टिकर से पाक यूनिफार्म वाले खिलाड़ियों के जज़्बे, उनकी मुफलिसी की दास्तान के साथ जीत का जश्न दिलों को तरल और आंखों को नम करने में कामयाब है। खासकर उस दर्शक वर्ग को 83 ज़रूर देखनी चाहिए जो इस मैच का गवाह रहा है। 

हालांकि कबीर खान ने वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ियों की दहशत का इंट्रोडक्शन बहुत बेहतरीन दिया है मगर परदे पर उनका डील डौल और हाव भाव कुछ हल्का रह गया है। विव रिचर्ड, माइकल होल्डिंग और मेल्कम मार्शल के आगे हर खिलाड़ी बच्चा ही नज़र आता था। पहले दो वर्ड कप जीत चुकी वेस्टइंडीज़ की मदमस्त टीम और उसके सामने नौसिखिया नज़र आती कपिल की कैप्टेंसी वाली भारतीय टीम। जहां कपिल के अंदर एक जट्ट कॉन्फिडेंस भी है और अपने साथ मौजूद सात सीनियर खिलाड़ियों को नसीहत न कर पाने की झिझक भी। फिल्म का ये हिस्सा भी बखूबी परदे पर उभरा है। क्रिकेट पंडितों की एनालिसिस के नाम पर भारतीयों की बेकद्री और फोरकास्ट के नाम पर वेस्टइंडीज़ के हिस्से में बेताज बादशाही। और इन सबके बावजूद अपनी कट टू कट अंग्रेजी में 'वी हेयर टू विन' वाला कपिल का मज़बूत इरादा। पंकज त्रिपाठी ने पीआर मान सिंह बनकर सपोर्टिंग किरदार का लोहा मनवाया है। पूरी फिल्म में लगातार बोलने वाले बोमन ईरानी ने फ़ारूख़ इंजीनियर की अदाकारी को जीत के मौके पर ख़ामोश रहकर अमर कर दिया है। रोमी देव बनी दीपिका पादुकोण ने एक अच्छे प्रोडक्शन के साथ अच्छी अदाकारी की है।  

लोगों को ये फिल्म इसलिए भी देखनी चाहिए क्योंकि इतिहास की इस ताज़ा मिसाल में हिन्दुस्तानियों से अंग्रेज़ों की नफरत की तमाम दलीलें मौजूद हैं, और इस नफरत का फोकस पश्चिम से घुमाकर किस तरह उत्तर की सरहदों में सेट कर दिया गया है। और इसलिए भी देखनी चाहिए कि किन अनदेखियों ने सादगी और जज़्बात की आगोश में रहने वाले खेल को सट्टे और बाज़ार की पनाह में पहुंचा दिया है। 

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...