गुरुवार, 18 जून 2026

मैं सियापा फैलाऊंगा

उसूल कहता है कि मूवी देखकर समीक्षा लिखी जाए मगर हालात यह हैं कि मूवी देखने वालों को देखकर समीक्षा लिखने का दिल कर रहा है। अब उसूल बदला है तो इतना किया जा सकता है कि नाम भी बदल दें। नया नाम ‘मैं सियापा फैलाऊंगा’ मुनासिब लग रहा है।

खैर! बचपन में अपने बुज़ुर्गों को अकसर यह कहते सुना है, ‘हम लोग तो अब मिस्ल चिराग़-ए-सहर हैं।’ इसका मतलब होता है रात भर का जला हुआ वह चिराग़ जो बुझने के करीब है। और इसी चिराग़-ए-सहर को इम्तियाज़ अली साहब ने बंटवारे से जोड़ते हुए ऐसा इमोशनली कैश किया है कि देखने वाले इस दुख की ताब नहीं ला पा रहे हैं।

ट्रेलर नुमा लिफाफा देखकर अंदर के जिस मज़मून का अंदाजा लगाया है, उससे इतना ही समझ आया कि माजरा यह है कि सन सैतालीस में जो सोलह बरस का था वह इस वक़्त पंचाननबे बरस का होगा। बस यही इस फिल्म का फार्मूला है कि सोलह की उम्र और बंटवारे की ट्रैजिडी। बाक़ी लंतरानी आप सबके सामने है। या थोड़ा भद्दा जुमला कहें तो यह कि इम्तियाज़ अली साहब थोड़ा और लेट हो जाते तो मोहब्बत की यह स्टैण्डर्ड उम्र उनके हाथ से निकल जाती। कुछ बरस पहले बनाते तो पंचाननबे की उम्र यानी मिस्ल चराग़ ए सहर की बेचारगी की नुमाइश इतनी आला न होती और कुछ बरस बाद बनाने में यह सवाल उठता कि उस ज़माने के लव बर्ड्स अब कहां ज़िंदा होंगे? और कहानी का जो मज़ा खुद किरदार के ज़रिए आता उसे किसी से कहलवाने में इमोशन ज़रा सेकेंड हैंड हो जाते इसलिए सटीक शगुन यही था।

कहानी में ईश्वर सिंह ग्रेवाल (नसरूद्दीन शाह) अगर अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की गिरफ्त में न आते तो शायद ही कोई जान पाता कि हिजरत का दर्द झेलने वाले यह वह लोग थे जिन्होंने अपनी जड़ों को खोया मगर अपने आपको खोखला होने से बचा लिया। बंटवारे के इस खूनी खेल में लाहौर और पंजाब के बाशिंदों ने सबसे ज़्यादा तकलीफें उठाई हैं जबकि इन दुखों की सबसे ज़्यादा ठेकेदारी हिन्दू और मुस्लमान के हिस्से रही। अपने दुखों को दरकिनार करते हुए या दिल की बिलकुल निचली तहों में दफन करने के बाद उस मुल्क को अपना माना जहां हिजरत कर के पहुंचे। फिर हर ग़म को तब तक छुपाकर रखा जब तक इस बीमारी के हाथों मजबूर न हो गए। दुख तो बेशुमार रहे होंगे। अब क्यूंकि लव स्टोरी सदाबहार फार्मूला होती है, तो किसी और तरफ जाने की ज़रूरत ही नहीं।

इंडस्ट्री आज भी मोहब्बत की थीम से बाहर नहीं निकल पा रहे जबकि मंटो बंटवारे के बाद ही ‘टोबा टेक सिंह’ से ऐसा रूबरू करा गए थे कि उनकी कहानी की कोई काट आजतक नज़र न आई। जिस अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की बदौलत यह कहानी पेश की गई है, बेहतर होगा कि एक बार उससे जुड़े आंकड़े भी देख लिए जाएं। भारत और एशिया के नहीं यूरोप और अमरीका के भी। इससे जूझते मरीज़ों को देखिए, उनके साथ रहने वालों को देखिए और अभी तक इसके लिए बेहतर दवा की तलाश में जुटे शोधकर्ताओं को देखिए।

अगर आपके शहर में जेरियटिक्स (geriatrics) सेंटर हैं तो खुद को खुशकिस्मत समझिए क्यूंकि फ्रंटलाइन डॉट द हिंदू डॉट कॉम की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में पंद्रह करोड़ बुज़ुर्गों के लिए सिर्फ़ 300-350 जेरियाट्रिशियन यानी बुज़ुर्गों के डॉक्टर हैं। मेंडिकल के मात्र नौ कॉलेजों में जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी की सिर्फ़ 31 सीटें ऑफ़र करते हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि आने वाले कुछ दशकों में भारत को हज़ारों ऐसे विशेषज्ञों की ज़रूरत होगी जो बुज़ुर्गों को पुरानी बीमारियों, डिमेंशिया और उम्र बढ़ने के साथ होने वाली शारीरिक अक्षमताओं से निपटने में मदद कर सकें। फिलहाल तो यहां सारा दारोमदार उस परिवार का है जिन का मरीज़ इस परेशानी को झेल रहा है।

वैसे भी हमारी सरकारें अब जिस्म को मज़बूत बनाने के लिए योग पर योग करवा रही हैं। मज़बूत जिस्म के साथ अगर जज़्बात कमज़ोर रह जाएं तो बुरा नहीं मगर एक तरफ़ा कमज़ोरी भी ठीक नहीं। यह तो ज़्यादती होगी कि ‘सय्यारा’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ देखकर रोया जाए और जिन मुद्दों पर वाक़ई रोना चाहिए उनसे नज़रें फेर ली जाएं। हालांकि मज़हबी मज़बूती के लिए भी आए दिन कोई न कोई ‘फाइल्स’ टाइप मूवी बन रही है मगर यहां हर क़ौम में ऐसे लोगों की भी भरमार है जिनका मज़हब बात-बात पर आहत हो जाता है। अच्छा होगा कि इस मज़बूती की तरफ भी फिल्मसाज़ कुछ ध्यान दें।

मंगलवार, 5 मई 2026

साहित्य हित में जारी

फिराक साहब उर्दू के साथ अंग्रेजी के भी जानकार थे और उनका मानना था कि इस मुल्क में अगर उनके बाद किसी को अंग्रेजी आती है तो वह पंडित नेहरू हैं। उनकी जानकारी का आलम यह था कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाते वक्त बच्चों से अकसर कहते कि आप मुझसे दुनिया की किसी भी किताब का सवाल पूछ सकते हैं। देर रात के हवाले से लिखे उनके कलाम को पढ़कर इस बात का अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि रतजगा उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा होगा। गोया फिराक साहब एक बैचेन रूह के मालिक थे। बात समझ भी आती है। एक लेखक और वह भी तरक्कीपसंद लेखक का रात को नींद से बैर ही उसकी फितरत का हिस्सा है। ऐसा होना भी चाहिए। दुनिया में बहुत से साहित्यकार और शायर गुजरे हैं जिन्होंने फिक्रों को ओढ़ना-बिछौना बनाया तो नींद उनसे रूठी मिली। गोया सच्चे साहित्यकार का नींद से नाता जरा नादिर (दुर्लभ) हुआ।

अगर कभी साहित्यकार की खूबियां दर्ज की जाएं तो इस खूबी का जिक्र जरूरी है। आज जब हम एक डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं, जहां बात-बात पर आंकड़े ओर डेटा पेश किया जाता है, फिर क्या यह मुमकिन नहीं कि साहित्य को भी थोड़ा साइंटिफिक रूप दिया जाए। इसके दो मोटे-मोटे फायदे तो साफ समझ आ रहे हैं। पहला यह कि साहित्यकार फिल्टर हो सकेंगे। और दूसरा फायदा यह होगा कि पाठक के साथ इंसाफ होगा। 

साहित्यकार की नींद का पता लगाने के लिए हार्ट रेट मॉनिटरिंग की मदद ली जा सकती है। वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे गाड़ी चलाने वाले की आंख की जांच जरूरी हो सकती है, तो कलम या कीबोर्ड चलाने वाले की बेचैनी का भी अंदाजा लगा लेने में कोई बुराई नहीं। रीडिंग के जरिए यह भी पता लगाना कितना आसान हो सकेगा कि कौन सबसे पक्की नींद वाला साहित्यकार है और कौन सबसे कच्ची नींद वाला।  

 कोर्स में भी एक चैप्टर का इजाफा हो जाएगा। शायर ए फिक्र या शायर ए बेफिक्र। साहित्य की सुकून भरी दुनिया का लेखक या साहित्य का बेचैन लेखक। फिर इन दोनों के बहस-मुबाहसे, गुटबंदी और भाईचारा जैसा काफी कुछ नयापन, जो यक़ीनन कई बदलाव के साथ साहित्य में एक ताजगी भी लाएगा। 

सिनेमा और सीरियल की दुनिया में भी छांट-बीन आसान हो सकेगी। सुकून ये बेसुकूनी की थीम पर बनने वाले ड्रामा या मूवी के लिए भटकने की गुंजाइश भी कम होगी। मुमकिन है कि इन खूबियों के सामने आते ही सुकून और बेचैन जैसे अवॉर्ड की दो नई किस्में भी वजूद में आ जाएं। वहीं प्रकाशन की दुनिया में भी इस एक अदद इजाफे को हाथों-हाथ लिया जाना चाहिए।

इसका एक और फायदा यह होगा कि सुकून का साहित्य कहने ओर सुनने वाले रात भर की भरपूर नींद के बाद सुबह से दोपहर तक अपने प्रोग्राम करें और बेसुकूनी वाला खेमा शाम से अपनी महफिल सजाए। अलबत्ता दोनों गुट इस बात का ख्याल जरूर रखें कि मौका निकालकर एक दूसरे के प्रोग्राम में भी शिरकत करें और चाहे तो साल भर बहसें करें मगर एक दिन सुकून और बेसुकूनी भाईचारा या बहनचारा के नाम करके साहित्य हित का भी ख्याल रख लें।

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

धूप के बंद दरवाज़े से गुज़रते हुए

जिन दिनों सच का ख़याल एक साज़िश नजर आने लगे, जिस दौर की दुनिया हवस के जूते पहने तकनीक के ट्रैक पर बेतहाशा भाग रही हो और जिस ज़माने में विकास की आड़ में ऐसी तामीर का चलन हो जहां क़ुदरत, सपने और प्रेम को बहुत गहराई में दफ़ना देना आम हो चुका हो, ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के बंद दरवाज़े' की आमद को शालिनी सिंह के ही शब्दों में बयान करें तो कह सकते हैं-

कि वे प्रेम से रिक्त होती धरती पर
प्रेम के उपजाऊ बीज रोपने आये हैं।

या जिन दिनों

गांव में गांव बचे हैं
पहाड़ पर पहाड़
जल जंगल जमीन को
कंक्रीट का धुंआ निगल रहा है

ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के बंद दरवाज़े' की आमद उम्मीद दिलाती है-

यक़ीन का एक सूरज है
फूल उसकी प्रतीक्षा में है
वह जब भी उदित होगा तो
दुनिया उजास से भर जाएगी।

सवा सौ पृष्ठों में सत्तावन कविताओं वाला संग्रह 'धूप के बंद दरवाज़े' शालिनी सिंह का पहला कविता संग्रह है। इन कविताओं में स्त्री विमर्श उतनी ही जगह घेरे है जितना उसे घेरना चाहिए। भूत, भविष्य, वर्तमान की स्त्री और उसके सिमटे संसार के विमर्श की गुहार को शालिनी ने इच्छाशक्ति के साथ बहुत दूर तक पहुंचाने का प्रयास किया है। शिकायत में भी शालीनता बरतते हुए जब शालिनी लिखती हैं-

हंसना
जो अनिवार्य पाठ था जीवन का
उसके लिए सबसे अधिक बार टोका गया

हंस मत पगली शीर्षक वाली कविता में शालिनी इस सच्चाई के पीछे की साज़िश को बड़ी ही सादगी से बेनक़ाब करती हैं-

दुनिया आश्वस्त थी
कि सत्ता किसी की भी हो
व्यवस्था यही चलेगी। 

शालिनी के कवि मन ने कविताओं को तो रचा है मगर यहां दर्ज कविताएं खास इसलिए हैं कि उन्होंने एक कवि की नैतिक जिम्मेदारी को जाना, समझा और फिर बरता है। इस रचने में शालिनी ने समीप और सुदूर की उन सभी चीज़ों को शामिल किया है जिन्हें अकसर हम हाशिए पर पाते हैं या रफ़्तार से भागते वक़्त ने जिन्हें कहीं बहुत पीछे गुमा दिया है। इस संग्रह के बहाने लोकगीतों का जुड़ाव शालिनी के उस अनुभव को कैनवास पर लाने में सफल है जो हमारी मिट्टी और ख़मीर का हिस्सा होने के बावजूद हमसे छूटता जा रहा है।

इन्हीं कविताओं में शालिनी शब्दों के साथ आंकड़ों से भी खेलती हैं, समाज और सत्ता से सवाल करती यह स्लेट उस समय एक आइना बन जाती है जब वह खुशरंग नज़र आने वाली दुनिया पर से फ़रेब की परतें उतारती हैं। जब लोकतंत्र का चौथा खंभा सरकारी मुखपत्र की भूमिका में हो उस समय शालिनी अपनी कविता के बहाने अपने समय के हाकिम और उनके मातहतों से साक्षत्कार करती हैं। शालिनी अपने मन की बात के वाले विचारों को चुनती हैं। वह मजलूमों के खेमे में खड़ी नजर आती हैं। शुभकामनाओं की बहती नदी शीर्षक वाली कविता के एक अंश की इस रिपोर्टिंग को देखिए-

अनुमान किया गुणा गणित हमेशा सच नहीं होता
जब कोई आला अधिकारी दुनिया के ख़ुशरंग
चेहरों का हिसाब लेकर बैठता है
तो ख़ुशी के सूचकांक में निचले पायदान पर
खिसक जाता है हमारा देश  

यही वह पंक्तियां हैं जो किसी भी नागरिक को हैप्पीनेस इंडेक्स से लेकर हंगर इंडेक्स तक के बारे में सोचने को मजबूर करती हैं, गोया यहां पर शालिनी सफल होती हैं उन सवालों को चिंगारी देने में जिन पर बारीक हेर-फेर के साथ बड़े ही चमकीले मुलम्मे चढ़ा दिए गए हैं।

सभ्यता, प्रकृति और रीत-रिवाजों वाली इस दुनिया में शालिनी प्रेम की सुंदरता को पूरी शिद्दत से महसूस करती हैं। यहां प्रेम के ख़ुमार की शिद्दत ज़रूर है मगर वह चेतना पर हावी नहीं होती। प्रेम की पेंग भरपूर ऊंचाई तक जाने के बावजूद छल की सीमा का अतिक्रमण नहीं करती है। शालिनी की इन कविताओं में प्रेम को भरपूर समर्थन मिला है मगर इस प्रेम में वह आधी आबादी को हवास बरक़रार रखने की नसीहत देने का फ़र्ज़ भी निभाती हैं। अपनी लंबी कविता प्रेम की हिस्सेदारी से बेदख़ल में वह कहती हैं-

 दुनिया की तमाम प्रेमिकाएं जब इन आख्यानों को पढ़ें
तो लगा दें मोहर अपने समर्थन की
और करवा लें समय की जमीन में अपने इस एलान की रजिस्ट्री
कि प्रेमियों अब तुमसे हमारा निबाह तभी होगा
जब तुम प्रेम को
संवेदना की स्याही से लिखना सीख जाओगे  

अपने संग्रह के बहाने शालिनी ने कई कालों में गश्त की है। आस्थाओं और अंधविश्वासों पर प्रहार किया है। भगवान से संवाद किया है। कई शब्दों को सहेजा है। मुहावरों से खेला है।  इन सबके बीच कविताओं की वैरायटी से गुजरते हुए जो सबसे महत्वपूर्ण लगा वह है, एडवेंचर का दख़ल। यात्रा करती स्त्रियां भला किस स्त्री का सपना नहीं होगा। इस लंबी कविता की एक पंक्ति के जिस एडवेंचर को समझा जाना चाहिए और जिस पर विमर्श की सबसे ज़्यादा जरूरत है वह है-

पर मर्दों के बिना यात्रा करती
स्त्रियों के समूह को भी अकेला ही मान लिया जाता है 

इसे लामबंद व्यवस्था के लिए अधिक चौकाने वाली बात बताने के अलावा कवयित्री उन भीतर की यात्राओं का ज़िक्र भी करती है जहां बरसों की कायरता के पिघलने के साथ उन्हें कोलंबस भी बनना है और हवा के रुख़ पर निगाह भी रखनी है।

विमर्श की इस यात्रा में शालिनी ने सहयात्रियों की भी पड़ताल की और इस नतीजे पर पहुंचीं कि स्त्रीवाद को स्त्रीवादियों से भी बचाए जाने की ज़रुरत है। कुछ बड़े उदारमना कवि शीर्षक से लिखी गई कविता को इस संग्रह का एक बड़ा ही दिलचस्प अध्याय कह सकते हैं। इसे पढ़ते वक़्त वह परतें खुलती हैं जिन पर आम इंसान का अमूमन कम ही ध्यान जा पाता होगा। स्त्रीवाद के एजेंडे में कब विपरीत एजेंडा शामिल हो जाता है, इसे शालिनी ने क्या ख़ूब समझा है। वैसे तो कविता का हर हिस्सा कई तरह की धुंध को साफ करता है मगर मिसाल के लिए इस पंक्तियों का सहारा ले रहे हैं-

उनसे कौन कहे कि तुम्हारे अतिस्रवाद से हम
कितना कमतर महसूस करते हैं 

शालिनी के ख़यालात के घोड़े अधिकतर दिशाओं में दौड़े और उन्होंने हर दिशा का मुआयना किया। शब्दों के चुनाव पर ख़ास महारत के साथ सियाह को सियाह और सफ़ेद को सफ़ेद कहने की कोशिश की है। और ऐसे में एक ख़्वाहिश सामने आई है। या शायद एक पाठक के तौर पर एक लेखक से यह मेरी अपेक्षा भी हो सकती है। सदियों से ही हालात ऐसे बने रहे जहां अधिकार की लड़ाई और इसकी जागरूकता ने स्त्री और पुरुष को दो पालों में बांट दिया है। अपेक्षा बस इतनी है कि, क्यों न एक ऐसे पाले की बुनियाद डाली जाए जिसमें उन स्त्री और पुरुषों को जगह मिले जो एक दूसरे के अधिकार और अपने फ़र्ज़ की बात करते हैं।

बदलते दौर ने तमाम रवायतों को बदला है। कई अच्छे तो कई बुरे तजुर्बे से दो-चार किया है, वही आज हमारे बीच एक ऐसी पीढ़ी भी है जो अपनी समझ के बल पर तमाम पिछली दकियानूसी रवायतों को रौंद चुकी है। इस पीढ़ी से आने वाले वक़्तों को लेकर बहुत उम्मीदें जुड़ती हैं। यह पीढ़ी उस तीसरे पाले को विस्तार देने के साथ समृद्ध करने की भी सलाहियत रखती है। और ऐसे में शालिनी ही नहीं हर आने वाले से यह अपेक्षा तो हमारा समय कर ही सकता है कि उस विचार को जगह मिले, जो इस समय सृजन की जरूरत भी है और उम्मीद का सबसे बड़ा प्रकाश स्तम्भ भी।  

अगर पहला संग्रह इतना परिपक्व है तो अगले का इन्तिज़ार करना हर ईमानदार पाठक की चाहत होनी ही चाहिए। अपने ख़याल ज़ाहिर करते हुए हर कविता को समेटना न ही मुमकिन है और न ही उचित मगर शालिनी को इस पहले संग्रह के लिए बहुत-बहुत मुबारकबाद देना चाहेंगे।

क्यूंकि शालिनी की कविताएं प्रेम का एक संसार रचती हैं। कुदरत का दामन थामना जानती हैं। शब्दों से सहलाने और वार करने के साथ उनके तरकश में व्यंग की पूंजी भी मौजूद है। इस संग्रह से गुजरते हुए उन्हें पथरीली भूमि पर चलने के साथ लड़खड़ाते क़दमों को साधने की कोशिश में पाया है। ज़ुल्म और अंधेरे का बयान करने के साथ वह उम्मीद और सूरज की बात करती हैं। इसलिए उनकी ही कही बात से अपनी बात को मुकम्मल करने के लिए मन के मंजीरे कविता की इन पंक्तियों को दोहराना चाहेंगे-

जानती हूं इस रात की
अवधि थोड़ी लंबी है
पर ऐसा भी नहीं कि
पूरब दिशा से सूरज उगेगा ही नहीं
और अंजोर होगा ही नहीं 

https://www.jansandeshtimes.net/view/13074/varanasi/8

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

साहित्य हित में जारी

यह शोध का विषय नहीं होना चाहिए कि हमारे आस-पास समस्या ज़्यादा हैं या कवि, मगर यह विमर्श का विषय ज़रूर होना चाहिए कि एक 'मसला मंच' हो और यहाँ पर समस्याओं की एक फेहरिस्त बनाकर उनका हिस्सा बांट किया जाए।

मसलन चाँद पर खूब-खूब शायरी हुई है और इस चक्कर में धरती की ज़रा अनदेखी हो गई। चाँद से अगर नज़रों को ज़रा नीचे लाया जाए और धरती की सुंदरता के परे कुछ मुद्दों पर नज़र डाली जाए तो पता चलेगा कि एक बार फिर से हुस्न के मयार बदलने का वक़्त आ नहीं चुका बल्कि बहुत पहले ही गुज़र चुका है।

इसमें अलजेब्रा की भी मदद ली जा सकती है। जैसा हम सबने बचपन में पढ़ा है, 'क' बराबर फलाना और 'ख' बराबर ढिकाना। अब ठीक उसी तर्ज़ पर चलते हुए कुछ समय के लिए अगर स्त्री विमर्श को प्लास्टिक प्रदूषण मान लें तो हमें पता चल सकेगा कि देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत एकत्र नहीं हो पाता और नदियों, मिट्टी व शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों में पहुँच जाता है।

अब अगर स्त्री विमर्श का स्टीयरिंग एक साल, छह माह या एक माह के लिए इस तरफ मोड़ दिया जाए और इस पर स्त्री विमर्श का आधा, चौथाई या दसवां हिस्सा भी काम किया जाए तो नतीजों का एहसास ही मन पुलकित करता है। मिशन में दम फूकने के लिए कहीं इसे फैशन से भी जोड़ दें तो नतीजे आफत हो सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे फेस्टिवल सीज़न पर होने वाली बम्पर सेल, ऑफर और ढिंचैक धूम वगैरह-वगैरह।

इसका एक और सुखद पहलू यह होगा कि होली के समय में छिछोरे कवियों को भी इस मुहिम में शामिल किया जा सकेगा। जो अभी तक जीजा-साली और देवर-भाभी के विषयों तक सीमित रह गए थे वह भी बुरा न मानो होती है के दम पर दमदार पेशकश दे सकेंगे।

फिलहाल सभी साहित्यकारों से गुज़ारिश है कि साहित्य-हित की खातिर इस विमर्श को संज्ञान में लें और अपनी कीमती राय से अवगत कराएं।

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

मत मुस्कुराइए आप लखनऊ में हैं...

लखनऊ इन दिनों अपने ख़ुमार के उरूज पर है। ख़ुमार है ज़ायक़े का। होना भी चाहिए। लखनवी ज़ायक़े और इनकी महक की शिद्दत को आखिरकार यूनेस्को ने भी महसूस किया। ज़ायक़ों की इस सदियों पुरानी तहज़ीब को उन 58 शहरों की फ़ेहरिस्त में जगह मिली, जिन्हें रचनात्मकता के लिए जाना जाता है। इस पायदान तक पहुंचने के लिए लखनऊ और यहां के हुनरमंदों के साथ दुनियाभर के उन शौक़ीनों को भी बधाई जो इस कामयाबी का हिस्सा बने।

इस चकाचौंध में एक पहलू और भी है जो गुम हो रहा है। सिर्फ़ ज़ायकों के नाम से पहचाना जाने वाला लखनऊ जिस वक़्त कामयाबी के पायदानों का सफ़र तय करते हुए ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहा था, ठीक उन्हीं दिनों में इस इलाक़े की बेशुमार ख़ूबियां नाकामयाबी के पायदान उतरती हुई गर्त में जा रही थीं। ज़ायक़े के इस स्टीकर ने कई ऐसी खूबियों को ढक लिया है, जिसने इस शहर को सांस धड़कन और परवाज़ दी थी। जहां की बोली ने इसे शहर-ए-सुख़न बनाया था और जहां की अदबी सर्गर्मियों ने इसे जंगे आज़ादी के वह ख़िताब दिए थे, जिनका अब शायद कोई नामलेवा भी न बचे।

पांच फिट से बड़े और पचास किलो से वज़नी जिस्म ने पांच सेंटीमीटर की जीभ के आगे हथियार डाल दिए। यूं कि हर नुक़सान से निगाह फेर ली और हर दलील को अनसुना कर दिया। यहां दिल और दिमाग़ दरकिनार तो नहीं हुए मगर इनके बीच मौजूद ज़बान ने दोनों को ही शिकस्त दे दी। शिकस्त इतने बड़े पैमाने पर हुई कि ज़माना ज़ायक़ों की ग़ुलाम हो गया। ज़ायक़े का नशा ऐसा चढ़ा कि न तो ग़ुलामी का एहसास रहा और न हीं इसकी बदौलत अदा होती कीमतों का। …और इस तरह बिना रीढ़ वाली जीभ की ख़्वाहिशों ने एक रीढ़दार को अपना ग़ुलाम बना लिया।

ज़ाहिर सी बात है कि यूनेस्को ने इस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र किया होगा, इन पकवानों के चर्चे और क़िस्से सुने होंगे और दुनियाभर में इन ज़ायकों की दीवानगी भी देखी होगी। यह हक़ीक़त भी है कि पुराना लखनऊ आज की तारीख़ में सिर्फ एक फ़ूड हब बन कर रह गया है। यूनेस्को ने अगर इस शहर को अपनी फेहरिस्त में शामिल करके कोई ख़िताब दिया है तो यक़ीन कीजिए कि कोई एहसान नहीं किया है।

यह वही लखनऊ है जिसे शहर-ए-सुख़न का ख़िताब मिला। एक सदी भी नहीं बीती और यहां के रहने वालों ने बहुत कुछ भुला दिया। भुला दिया कि अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से छुटकारा दिलाने वाली पहली अदबी तंज़ीम का बीज इसी शहर में रोपा गया था। साल 1936 में लखनऊ के रिफ़ा-ए-आम क्लब में मुंशी प्रेमचंद ने उस जलसे की सदारत की थी जिसका विचार सज्जाद ज़हीर को 1935 में पेरिस के इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ़ राइटर्स फॉर डिफेंस ऑफ़ कल्चर से मिला था। इस अदबी तहरीक का मेनिफेस्टो मुल्क राज आनंद और सज्जाद ज़हीर लंदन में तैयार किया था। जो आज भी तरक़्क़ी पसंद अदब की बुनियाद है।

इत्र, केवड़ा, जावित्री, जायफल और कालीमिर्च में मदहोश यह पीढ़ी अपने इतिहास से कुछ ज़्यादा ही बेखबर है। थोड़ा और पहले नज़र डालें तो इतिहास इन मसालों से जुड़े कुछ और पन्ने खोलता है। जिस कालीमिर्च को देखकर हिन्दुस्तानियों के रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए, उस कालीमिर्च के फ्लेवर ने यहां हर किसी को मदमस्त कर रखा है। अमरीकी लेखक लैरी कॉलिन्स और फ़्रांसिसी लेखक डोमिनीक लापिएर ने अपनी किताब मिडनाइट फ्रीडम में इसी कालीमिर्च का ज़िक्र इस तरह किया है-

"हॉलैंड के समुद्री लुटेरों ने, जो मसालों के एकाधिकार पर वर्चस्व रखते थे, कालीमिर्च के दामों में अचानक एक पौंड के लिए पांच शिलिंग का इज़ाफ़ा कर दिया।

अंग्रेज़ों को यह बढ़ोत्तरी सख्त नागवार गुज़री।

15 सितंबर, 1599 की तारीख़ ढल रही थी। लंदन के 24 व्यापारी लेडनहॉल स्ट्रीट की एक खस्ता इमारत में जमा हुए। उन्होंने एक कंपनी क़ायम करने का फैसला किया, जिसकी शुरूआती पूंजी 72000 पौंड तय की गई। यह पूंजी 125 हिस्सेदारों को मिलकर जमा करनी थी।

इस संस्था का मक़सद मुनाफा कमाना था।

इस कंपनी ने तरक़्क़ी कर के हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ों की हुकूमत क़ायम कर दी, जो पूंजीवाद का एक नमूना बन गई। जो किस्सा मुनाफे के शौक़ से शुरू हुआ था वह लूट-खसोट और जुल्म की एक दास्तान बन गई।"

...और इतिहास गवाह है कि इस मुल्क ने कालीमिर्च से कोहिनूर तक गवांने के साथ कई ऐसे ज़ख्म झेले हैं जिसकी टीस आज भी मौजूद है। इन सबके बावजूद भी इस खूबी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रवाद के नाम पर जिन क़ौमों को लड़ाने वालों ने अपनी पूरी ताक़त को झोंक दिया है, उसका जवाब उस मेज़बानी के दौरान बखूबी देखा जा सकता है जब इस फ़ूड हब में तिलक और टोपी हमज़ायक़ा बने किसी डिश का लुत्फ़ उठा रहे होते हैं।

पुराने लखनऊ के इस फ़ूड हब के सर्फ एक किलोमीटर के दायरे का जायज़ा लें तो कई राज़ खुलते हैं। यहां के ज़ायकों का लुत्फ़ लेते लोग पूरब की तरफ अपना रुख करें तो वह जान सकेंगे कि इसी रिफ़ा-ए-आम क्लब से कुछ पहले मेडिकल चौराहे पर सुल्तानुल मदारिस की इमारत है। यह वही मदरसा है जहां से कैफ़ी आज़मी की ज़िंदगी की बग़ावत की शुरुआत हुई। इस फ़ूड हब के बाईं तरफ हिंदी का साहित्य अकादमी पाने वाले अमृतलाल नागर का मकान है और दाहिनी तरफ उर्दू के लिए साहित्य अकादमी हासिल करने वाले तरक्की पसंद अदीब नय्यर मसूद की रिहाइशगाह, अदबिस्तान है।

जिस कूचे की कगार पर यह फ़ूड हब आबाद है, उसे मीर बब्बर अली अनीस के नाम पर कूचा-ए-मीर अनीस कहा गया। उनका मकान और मक़बरा आज भी यहां मौजूद है। उनके अदब की क़द्र करने वाले दुनिया के किसी भी छोर से यहां आते हैं और उनके मक़बरे की ज़ियारत को अपनी ख़ुशक़िस्मती समझते हैं। इस कूचे से कुछ दूरी पर मिर्ज़ा दबीर दफ़न हैं। उर्दू अदब ने समकालीन रहे अनीस और दबीर का वह दौर भी देखा है ऐसा कि इनके चाहने वाले 'अनीसिया' और 'दबीरिया' नाम से जाने गए। फ़ूड हब के पश्चिम की तरफ है हकीमों वाली गली। हकीमों के पुश्तैनी क़ब्रिस्तान में दुनिया को लखनऊ का इतिहास बताने वाले अब्दुल हलीम शरर दफ़न हैं। इनकी लिखी गुज़िश्ता लखनऊ आज भी इस शहर का अहवाल सुनाने वाला बेहद खास और ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

इसी हकीमों वाली गली का जंगे आज़ादी में यादगार रोल था। हकीम अब्दुल अज़ीज़ (1855–1911) के नाम से इस गली को शोहरत इस लिए मिली थी क्यूंकि उनके घराने के मर्द और औरतों ने जंगे आज़ादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उनके पोते एम शकील ने इस रवायत को क़ायम रखा। शायद ही अब कोई इस बात पर शर्मिंदा होने वाला बचा हो कि जिस गली के गिर्द यह फ़ूड हब आबाद है, वह गली एम शकील के नाम पर है। एम शकील जो एक स्वंत्रता सेनानी, एक तरक़्क़ी पसंद लेखक, एक लीडर के अलावा मज़लूमों और मज़दूरों के रहनुमा रहे। इसी फ़ूड हब में नगर निगम द्वारा लगाया गया एम शकील रोड वाला पत्थर चूल्हे के धुंए की परतों में गुम हो गया है। हर दिन सड़क घेरती दुकानों ने इस पत्थर को धुंधला करने के साथ पीछे भी धकेल दिया है।

इस आंच और धुंए ने यहां सिर्फ गुज़रे हुए कल को ही नहीं गुम कर दिया बल्कि आने वाला कल भी खसारे में है। यहां रहने वाले लोकल लोगों को भी इस उपलब्धि पर फख्र ज़रूर है मगर इससे जुड़े दुखों की भी न पूछिए। इन दुखों की गिनती तो इतनी ज़्यादा है कि एक किताब लिखी जा सके, मगर अफ़सोस कि उस किताब को रखेंगे कहा! यह भी एक कड़ुवा सच है कि इस फ़ूड हब के आसपास क्या दूर-दराज़ तक कोई लाइब्रेरी नहीं है। यहां तो बस खाने के होटल खुलते हैं, वह भी इस रफ़्तार में कि सुबह उठो तो पता चलता है कि रातों-रात एक और होटल का इज़ाफ़ा हो गया। इन होटलों में आने वाली भीड़ ऐसी कि रात दो बजे भी यहां की सड़क पर ट्रैफिक जाम रोज़ की बात है। दुकाने सड़क की सिम्त बढ़ते हुए डिवाइडर तक पहुंचने को बेताब रहती हैं। भट्टियों ने इलाक़े की हरारत ऐसी बढ़ा दी है कि गुलाबी सर्दियां इधर का पता ही भूल गई हैं। बल्कि मौसम की ठंड भी अब यहां तक बहुत बाद में आती है और कहीं पहले रुख़सत हो जाती है। सांस लेने पर लगता है कि चिकनाई अंदर दाखिल हो रही है। खाने के शौक़ीन इन आने वालों का सिलसिला रात के दो-तीन बजे तक जारी रहता है। नतीजे में बाक़ी मार्केट भी देर रात तक खुलने और सुबह देर तक बंद रहने की आदी हो गई है।

इन बाज़ार से जुड़े घरों में रात तब होती है जब सूरज निकलने वाला होता है। तालीम के मामले में इस इलाक़े का पिछड़ापन अफसोसनाक और शर्मनाक है। यह समझ लीजिए कि मुर्ग़ और मछली के इस दस्तरख्वान ने तालीम को ही ढक दिया है। इन कामों में लगे ज़्यादातर छोटे दुकानदार या मज़दूर तबके के लिए रात-दिन पकवानों की दुकाने सजाने के फेर में तालीम हर बार दोयम दर्जे पर आ जाती है। फैसल मियां इसी इलाक़े में बेकरी की दुकान के मालिक हैं। उनसे बातचीत के दौरान जब पूछा कि बच्चे किन क्लासों में हैं तो जवाब मिला- "दुकान बंद करते-करते रात के दो बज जाते हैं। घर आकर खाना खाते और सोते सुबह के चार बजते हैं। बारह-एक बजे से पहले उठना ही नहीं हो पाता। बेटे का कुछ बरस पहले स्कूल में दाखिला कराया था मगर उसे पाबन्दी से भेज नहीं सके और अब तो वह इतना बड़ा हो गया है कि बेकरी पर बैठता है।" इस जवाब पर मेरा सवाल था- "आप तो होटल नहीं चलाते फिर देर रात का रूटीन क्यों अपनाया है?" उनका जवाब मिला- "अब तो सबका वही रूटीन है, जो इन होटलों का है। यहां साबुन बेचने वाला भी दो बजे रात तक अपनी दुकान इसलिए खोले रहता है कि कस्टमर आते रहते हैं।"

अब्दुल हलीम शरर ने गुज़िश्ता लखनऊ में जिन लखनवी पकवानों का ज़िक्र यह सोचकर किया होगा कि नवाबी दौर के ये क़िस्से इतिहास की किताबों में महफ़ूज़ कर दें, उन्हें क़तई अंदाजा भी नहीं होगा कि जो नवाबों को नसीब नहीं था उसका लुत्फ़ सदियों बाद की अवाम उठा सकेगी। नवाब तो बादाम के चावल और पिस्ते की दाल वाली खिचड़ी और छिंटाक भर चावल में सेर भर घी अपने बावर्चीखाने में बनवा लिया करते थे मगर ऑनलाइन की बदौलत यहां हर काउंटर पर मौजूद स्टाफ़ रात-दिन एक शीरमाल और हाफ प्लेट बिरयानी भी शहर के कोने-कोने में पहुंचाने का फ़र्ज़ निभा रहा है।  

नवाबी दौर के ज़ायकों के साथ अब इनमें आधुनिक दौर के खाने भीं शामिल हुए है। मगर इस इलाक़े में हंडिया के नाम पर क़ोरमा, नहारी, पुलाव, कबाब और रोटियों के नाम पर शीरमाल, कुलचे पराठे, तंदूरी जैसी अनगिनत क़िस्मों का बोल बाला है। शौकीनों की ख़्वाहिशों पर पूरा उतरने के लिए ये बावर्ची हर लगन और हर जतन कर डालते हैं। जवाब में शौक़ीन भी टूटकर अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हैं और मंज़र यह होता है- "जान जाए लाख ख़राबी से, हाथ न हटे रकाबी से"। इस शौक़ में सेहत से विरासत तक दावं पर लग चुके हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि पुराना लखनऊ ज़ायकों का गढ़ है। पकवानों की महक से लबरेज़ यहां की फ़िज़ाएं इतनी काफिर हो चुकी हैं कि मज़बूत से मज़बूत इंसान का ईमान डोल जाए। यह महक जब भगोनों के ढक्कनों को चीरती हुई इंसानी नाक से गुज़रती है तो सुध-बुध का गुम जाना कोई बड़ी बात नहीं। मुंह में ख्वाहिशों का सलाइवा सैलाब की शक्ल में फूट पड़ता है और बेकाबू इंसान अपनी पसंद की डिश के आगे यूं सिर झुकाए मिलता है कि अगर निवाला अंदर न गया तो रूह बाहर आ जाएगी।     

यूनेस्को की मेहरबानी के बाद लखनऊ अब एक ऐसे ग्लोबल नेटवर्क का हिस्सा बन गया है, जिसमें सौ से ज़्यादा देशों के 408 शहर शामिल हैं। इस नेटवर्क में हर शहर को किसी न किसी क्रिएटिव फील्ड, मसलन क्राफ्ट, लोक-कला, डिज़ाइन, फ़िल्म, पाक-कला, साहित्य, मीडिया कला और संगीत में योगदान के लिए पहचाना गया है। इस वर्ष इसमें एक नया विषय ‘वास्तुकला भी जोड़ा गया है। ऐसे में लखनवी ज़ायक़ों की तासीर कहें या खुशबू का असर, लखनऊ और मुल्क के बाहर रहने वाले भी इन ज़ायकों की मोहब्बत में बड़ी दूर-दूर से सफ़र करते हुए यहां आते हैं। यहां आने वाले सैलानी कहीं और जाएं या न जाएं इस फ़ूड हब की ज़ियारत और यहां के ज़ायकों से इंसाफ किये बिना उनकी लखनऊ विज़िट अधूरी होती है।

यह भी एक अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि जिस समय में यूनेस्को लखनऊ को ज़ायक़ों की फेहरिस्त में जगह देता है उसी महीने आने वाली डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के 16 देशों व इलाक़ों में एक बड़ी आबादी के पास पेट भरने के लिए पर्याप्त खाना नहीं है। इनके अकाल के गर्त में धंसने का जोखिम गहराता जा रहा है। यह वही वक़्त है जब हमारी धरती जंग, क्लाइमेट और आर्थिक परेशानियों के ऐसे मकड़जाल में उलझी है जहां इस भुखमरी को टालने के लिए वक़्त हाथ से फिसलता जा रहा है।

माना कि हर दौर में ज़ायके की दुनिया सबसे दिलकश और इसका नशा सबसे आला रहा है। बंटवारे के बाद इब्ने इंशा की लिखी किताब 'खुमार-ए-गंदुम' ने बता दिया था कि गेहूं का नशा सबसे ऊपर है। बाज़ारों ने भी इस शौक़ को जाना और नाज़-नख़रा उठाते हुए पाल-पोस कर इस मुक़ाम तक लाया गया। इस परवरिश और इन मेहनतों के सदक़े आज इस शहर का यह रूप है, इस रूप में ज़ायक़े हैं, इन ज़ायक़ों के चाहने वालों का सैलाब है, इस सैलाब में गुम होती तमाम ऐसी रवायतें, जिनसे शायद किसी को कोई मतलब नहीं। इसी ज़ायक़े में गुम होता यहां के इलाक़ाई लोगों का आने वाला कल है। फिर भला कैसे कहें- 'मुस्कुराइए आप लखनऊ में हैं।'


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शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

क्या कांग्रेस की तरफ लौट रहा है मुसलमान?

 

 

 -समीना खान

पिछले दिनों सीतापुर जेल में बंद वरिष्ठ सपा नेता आजम खान से मिलने गईं उनकी पत्नी पूर्व सांसद तंजीन फातिमा ने आजम की रिहाई के मुद्दे पर मीडिया से बातचीत में कहा- ‘उन्हें अब किसी से कोई उम्मीद नहीं है। उम्मीद है तो केवल अल्लाह से।दूसरी तरफ, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने यह कहकर तंजीन फातिमा के बयान की तस्दीक कर दी कि मैं उनसे सहमत हूं। आजम खान पर गलत मुकदमे लगाकर उन्हें जेल में बंद किया गया है। अब तीन ही सूरत में वह जेल से बाहर सकते हैं-पहली, प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आए, दूसरी उन्हें कोर्ट से न्याय मिले और तीसरा उन्हें भगवान न्याय दें।

तंजीन फातिमा का यह बयान उनके समाजवादी पार्टी से मोहभंग के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीति के एक जानकार बताते हैं कि अखिलेश यादव ने आजम खान को पूरी तरह बिसराकर अपना सारा ध्यान पीडीए की राजनीति पर लगा रखा है। उन्हें जिस तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छी सफलता मिली है, उससे उत्साहित होकर वह मुस्लिमों पर अपनी राजनीति केंद्रित करके पीडीए का समीकरण साधकर 2027 के विधानसभा चुनाव का किला फतह करना चाह रहे हैं।

अखिलेश यादव का राजनीतिक आकलन और रणनीति अपने स्थान पर सही हो सकती हैं लेकिन उन्होंने आजम खान को जिस तरह दरकिनार किया है, उससे मुस्लिम समुदाय में घोर निराशा है। मुस्लिम समाज अभी तक एकजुट होकर सपा को वोट देता आया है लेकिन आजम खान के प्रकरण के बाद से आहिस्ता-आहिस्ता मुस्लिमों का एक वर्ग अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस की तरफ देखने लगा है। उस कांग्रेस की तरफ, जिसकी छत्रछाया में उसने आजादी के बाद से आज तक अपने को महफूज महसूस किया है। दूसरी तरफ, भाजपा जिस तरह हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे को उछालकर हिंदुओं के थोक वोट हासिल कर रही है और जिस तरह कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार भाजपा पर हमलावर हैं, उससे भी मुसलमानों के एक बड़े तबके को लग रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर अगर भाजपा को कोई पार्टी चुनौती दे सकती है तो वह कांग्रेस ही है। ऐसे में क्यों कांग्रेस की तरफ ही चला जाए? दूसरे शब्दों में कहें तो मुसलमान अपने मूल की तरफ लौटना चाह रहा है।

सीबीएसई बोर्ड के एक स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने वाले सलमान सोशल होने के साथ मेल-जोल का एक अच्छा दायरा रखते हैं। अलीगंज निवासी सलमान ख़याल के सामने इन सवालों को रखा कि क्या वाक़ई मुस्लमान कांग्रेस की तरफ वापसी कर रहा है और आज़म खान प्रकरण से मुसलमानों का सपा से मोह भंग हुआ है?  सलमान का जवाब था कि मुस्लिम समुदाय उतना पिछड़ा भी नहीं है जितना अमूमन समझा जाता है। आगे वह कहते हैं कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक बड़ा पढ़ा-लिखा तबका कांग्रेस के शासन में अपना भविष्य तलाश रहा है।

सलमान इस बात का इक़रार करते हैं कि एक दौर था जब मुस्लमान आंख बंद करके कांग्रेस को वोट दिया करता था। मगर अब वह मानते हैं कि मुस्लिम वोटर की अपनी चॉइस है। सलमान इस बात को एक अच्छा संकेत मानते हैं कि इस दौर का मुसलमान किसी एक पार्टी को बिना सोचे विचारे सपोर्ट नहीं कर रहे हैं। मौजूदा सियासी तब्दीलियों के हवाले से सपा से मुसलामानों के मोहभंग पर सलमान का कहना है कि बेशक तमाम बदलाव हुए हैं मगर इन तब्दीलियों से ऐसा कुछ स्पष्ट नहीं होता कि मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी से दामन छुड़ाने की तैय्यारी कर ली है।

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डॉक्टर सीमा जावेद ने अपने करियर की शुरुआत लखनऊ के सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट से की थी। कुछ वर्ष पत्रकारिता की दुनिया में रहने के बाद उन्होंने एक बार फिर से एकेडमिक और रिसर्च की की तरफ वापसी की। वर्तमान में वह क्लाइमेट साइंटिस्ट के तौर पर काम कर रही हैं। मौसम के मिज़ाज पर पैनी निगाह रखने वाली डॉक्टर सीमा जावेद को राजनीतिक उतार-चढ़ाव की खासी पकड़ है। मुसलामानों का समाजवादी पार्टी से मोहभंग होने और कांग्रेस के खेमे में कूच करने के सवाल पर उनका जवाब एक तीसरा एंगिल सामने लाता है। डॉक्टर सीमा का मानना है कि अपने सूबे में मुस्लिम वोट में शिया और सुन्नी का डिवीजन हमेशा से रहा है और इस सोच के हवाले से यहां के हालात में कोई ज़्यादा बड़ा बदलाव उनको महसूस नहीं हुआ है। इस बटवारे से इतर वह राहुल और अखिलेश के गठजोड़ को मौजूदा सियासत का सबसे प्रभावी फैक्टर मानती हैं। उनका कहना है कि राहुल और अखिलेश का साथ मुसलामानों को एकजुट करने की बड़ी वजह है और यहाँ पर मुसलमान आज़म खान प्रकरण को इतनी अहमियत नहीं देगा जितनी इस गठबंधन को मिलेगी । उनके मुताबिक़, इन दोनों का सियासी गठजोड़ वह बड़ा फैक्टर होगा जो मुसलामानों को बड़ी तादाद में लेकर चलने में कामयाब होगा।

डॉक्टर जावेद, आज़म खान की गिरफ्तारी और उनसे जुड़े लोगों की दिलआज़ारी की बात करती हैं। इस मामले पर उनका कहना है कि ताज़ीन खान उनके परिवार और कुछ करीबी लोगों का दिल दुखना लाज़िमी है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। 

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“मुस्लमान तो कांग्रेस का ही था!” ये त्वरित टिप्पणी अनवर मिर्ज़ा ने तब की, जब उनसे सवाल पूछा गया कि क्या मुसलमान कांग्रेस की तरफ लौट रहा है? टूरिज़्म इंडस्ट्री से जुड़े अनवर मिर्ज़ा पुराने लखनऊ के कटरा अबूतराब के रहने वाले हैं। करीब डेढ़ दशक से भी ज़्यादा समय  से अनवर इस ट्रेड से जुड़े हुए हैं। कोविड से पहले वह एक ऑफिस में बतौर इम्प्लॉई काम करते थे मगर जब महामारी फैली तो ऑफिस बंद हो गया और धीरे-धीरे उन्होंने अपने नेटवर्क को फैलाया और इसी कारोबार को जारी रखा। आज उनका अपना सेटअप है। अनवर का कहना है कि मुसलमान और कांग्रेस दोनों को ही एक दूसरे का साथ छोड़ने का खामियाज़ा भुगतना पड़ा है मगर आज दोनों ने ही एक दूसरे की अहमियत को जान लिया है।

आज़म खान विवाद पर अनवर का स्पष्ट जवाब था कि कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों ने मुसलामानों का हितैषी बनकर उन्हें सिर्फ वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया है मगर यह सब असल में खुद की हितैषी रही हैं। अनवर पूरे यक़ीन से कहते हैं कि सपा की इस हरकत से मुसलमानों की आंख खुली है और उन्हें कांग्रेस की क़द्र हुई है। साथ ही वह यह भी कहते हैं कि कांग्रेस को भी इस बात का एहसास है कि इस मुल्क का मुसलमान ही उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकता है। अनवर यहां पर एक और बात जोड़ते हैं, वह यह कि कांग्रेस और मुसलमान का साथ किसी मज़हबी या पसर्नल फायदे के लिए नहीं बल्कि पहले भी एक सेक्युलर राष्ट्र के लिए था और एक बार फिर से ऐसा ही होगा।

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खालिद खान रिटायर्ड एलआईसी ऑफिसर हैं और दुबग्गा क्षेत्र में रहते हुए सामाजिक कार्यों में अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा व्यतीत करते हैं। मुसलमानों के कांग्रेस के खेमे में लौटने पर उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया कि सुबह का भूला शाम को घर लौट रहा है। हालांकि वह इसे गलत भी नहीं मानते। उनका कहना है कि हमारे पुरखों और नेहरू-इंदिरा वाली कांग्रेस के बीच एक अलग ही बॉन्डिग थी। मुसलमान सुकून से अपनी नौकरी-धंधा करते थे और पांच बरस बाद जाकर कांग्रेस को वोट दे दिया करते थे। सब-कुछ सही सलामत चल रहा था। फिर वही बदलाव जो दुनिया में हमेशा से और हर मामले में होता आया है। मुसलमानों ने भी सपा का एतबार किया, उन्हें भर-भर वोट दिया मगर मुलायम सिंह तक तो फिर भी हालात बेहतर कह सकते हैं, लेकिन उनके बेटे में वह बात नहीं।

दूसरे सवाल के जवाब में खान साहब का कहना था कि आज़म खान केस हमारी पूरी कौम के सामने एक डेमो है। मुसलमानों को समझ आ रहा है कि जब अपने करीबियों की तरफ से अखिलेश किनारा कर सकते हैं तो फिर क़ौम के लिए उनसे उम्मीद रखें बमानी होगा। उनके मुताबिक़ आज़म खान क्या किसी भी मुस्लमान की पैरवी करके अखिलेसग हिन्दू वोटर की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहेंगे।  

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चिकन के कपड़ों के कारोबारी मोहम्मद मतीन नक्खास इलाक़े में रहते हैं और चौक में इनका कारखाना है। मुसलमानों के कांग्रेस के खेमे में वापसी के सवाल पर मतीन का अंदाज़ बिलकुल जोशीला हो जाता है और पूरी खुशमिज़ाजी के साथ वह कहते हैं कि मुसलमान ही नहीं जानकार हिन्दू भी अब कांग्रेस की तरफ लौटता नज़र आ रहा है। मतीन आगे कहते हैं कि वह यह बात हवा में या महज़ दिल को बहलावा देने के इरादे से नहीं कह रहे। अपने इस जोश और कॉन्फिडेंस के पीछे वह दिनभर बाज़ारों के लगाए गए चक्कर और लोगों से होने वाली मुलाक़ातों का हवाला देते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि देख लीजिएगा, ऐसा ही होगा।

आज़म खान मामले में सपा के सहयोग पर मतीन की थ्योरी बिलकुल अलहदा थी। मतीन के मुताबिक़, सपा इस इन्तिज़ार में हैं कि आज़म खान अपनी रिहाई के लिए भाजपा का दामन थामे और सपा को उनसे दूर होने का मौक़ा मिले। यहाँ भी मतीन ने पूरे विश्वास के साथ अपना पिछले वक्तव्य दोहराया- कि देख लीजिएगा, ऐसा ही होगा।

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कांग्रेस प्रवक्ता मनीष हिंदवी से इस सिलसिले में बात हुई और जानना चाहा कि क्या वाक़ई मुसलमान कांग्रेस की तरफ लौट रहा है? इसके जवाब में उनका कहना था कि मैं आपको एक किस्सा सुनाता हूं जिसमें आपके सवाल का जवाब मिल जाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता के मुताबिक़, जिस समय अकबरनगर के निवासियों को इस सरकार ने बुलडोज़ करने के बाद उनके बरसों पुराने घरों से बेदखल कर दिया और इन्हें बसंतकुंज शिफ्ट किया गया, वहां पर यह लोग भी अपनी टीम के साथ पहुंचे। वह बताते हैं कि इस बदहाली में उन्होंने वहां एक अधेड़ उम्र मुस्लिम महिला को यह कहते सुना- हमें राहुल भैया पर भरोसा है। वह कहते हैं कि यह उम्मीद एक ऐसी महिला का बयान था जिसको कोई स्वार्थ नहीं, वह बेघर हो चुकी थी, उसे एक ऐसे कमरे में डाल दिया गया था जिसके लिए उनसे पांच लाख मांगे जा रहे थे। वह इसे लोगों पर राहुल का बढ़ता हुआ ट्रस्ट बताते हैं। उनके अनुसार, खासकर भारत जोड़ो यात्रा के बाद से राहुल गांधी का लोगों से कनेक्ट बना है। अपनी बात में वह यह भी जोड़ते हैं कि मौजूदा सरकार में जो भी समुदाय सत्ता के निशाने पर रहा है वह इस समय कांग्रेस से आस जोड़ रहा है।

सपा से मोहभंग और वापसी के सवाल पर उनका कहना है कि ये हकीकत है कि कम्युनिटी का ट्रस्ट हासिल करना इतना आसान नहीं होता है इसके बावजूद आने वाले समय को लेकर उनका कहना है कि न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि देश में मुस्लिम कम्युनिटी एक स्ट्रांग पिलर बनकर वापस कांग्रेस के साथ ऐसे ही खड़ी होगी जैसे वह जवाहर लाल और इंदिरा जी के साथ खड़ी थी।

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सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से जब इस बारे में जानना चाहा और तज़ीन खान की मायूसी के साथ मुसलमानों के कांग्रेस की तरफ वापसी करने की बात उनके सामने रखी तो उन्होंने दोनों ही बातो का खंडन किया। उनका कहना था कि दोनों ही बातें गलत हैं, न तो मुस्लमान सपा से किनाराकशी कर रहा है और न ही कांग्रेस की तरफ लौट रहा है। तज़ीन खान के सपा से नाउम्मीदी पर राजेंद्र चौधरी ने जवाब दिया कि पार्टी बराबर से उनके साथ खड़ी है। उनके अनुसार, ऐसे में तज़ीन खान अगर कुछ सोचती या कहती हैं तो यह उनका व्यक्तिगत नजरिया हो सकता है। आगे उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि इस समय वह एक मुश्किल दौर से गुज़र रही हैं मगर उन्हें भी सोचना चाहिए कि सपा सत्ता में नहीं है। राजेंद्र चौधरी ने तज़ीन खान की ही बात को दोहराते हुए कहा कि हम भी तो वही बात कह रहे हैं जो तज़ीन खान का कहना है,  कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आए तो आज़म खान को इंसाफ दिलाने में कोई दिक्कत ही नहीं होगी।

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 https://lucknowfocus.com/are-muslims-returning-to-congress/

मैं सियापा फैलाऊंगा

उसूल कहता है कि मूवी देखकर समीक्षा लिखी जाए मगर हालात यह हैं कि मूवी देखने वालों को देखकर समीक्षा लिखने का दिल कर रहा है। अब उसूल बदला है तो...