मंगलवार, 21 जुलाई 2026

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उंगली पकड़कर चलाने की कोशिश न करे। 

और यही वह पीढ़ी है जिसने अपनी पिछली पीढ़ी से बहुत लानत-मलामत भी सुनी है। लापरवाह होने की, निकम्मेपन की और गैरज़िम्मेदार होने की। इन सबके बीच कहीं तो संवाद की वह कड़ी टूटी है जिसे नहीं टूटना था।

सरकार को लगा कि लफ़्फ़ाज़ी से उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है और सरपरस्तों को लगा कि अपनी हैसियत से ऊपर उठकर पढ़ाई कराने की जी तोड़ मेहनत करके उन्होंने इस पीढ़ी पर वह एहसान किया है, जिससे ये खुद महरूम रहे हैं। 

सरपरस्त गाढ़ी-पतली, जमा की या उधार ली हर कमाई को इस आस में झोंकने में लगे थे कि जितनी रकम लगाएंगे उतना मीठा फल मिलेगा। अपने आस-पास नज़र आने वाली  कुछ ऐसी ही मिसालें उनकी इस समझ को मज़बूत कर रही थीं। मगर फल पाने के लिए रोपा गया पौधा जिस ज़मीन में बोया था उसकी पड़ताल करने का वक़्त किसी के पास नहीं था। 

जिन बच्चों की जानें गई हैं, उन्हें तो यह भी नहीं पता था कि उनके चुने गए भविष्य और पढ़े गए कोर्स के अलावा भी कोई दुनिया होती है। यह थी परवरिश या परिस्थतियां कि उनकी इस नाकामयाबी ने मौत के अलावा सभी रस्ते बंद कर दिए। जो बचे हैं वह किस मेंटल ट्रामा से गुज़रे उसका शायद ही हम में से कोई अंदाजा लगा सके। 

सरकारी स्कूल में पढ़ने और पढ़ाने वालों के पास कोई विकल्प नहीं होता मगर प्राइवेट वालों ने तो दुनिया ही बदल दी। एक अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाने की कोशिश में हर मां-बाप भी जानलेवा मेनहत के दौर से गुज़रा है। इन मेहनतों में पिछले कुछ बरसों में जो बदलाव आए हैं, वह अफसोसनाक रहे हैं। स्कूलों ने एक से एक जायज़-और नाजायज़ शर्तें रखी है और सरपरस्तों ने उफ़ किए बगैर इन्हें माना है। अपनी पसंद के स्कूल में एडमिशन की चाहत में इस हद तक लोगों को गिरते देखा है कि लगता है प्राइमरी, नरसरी और केजी में ही पढ़कर बच्चा आला मुस्तक़बिल का दावेदार हो जाएगा। फिर यही बड़े भारी खर्च और अथक मेहनत कब बेहिसाब उम्मीदों में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता और जो पता रह जाता है वह यह कि आपने इन बच्चों पर एक दिन में जितना खर्च किया है उतने में आपकी पूरी पढ़ाई हो जाया करती थी। ज़्यादातर इसका ताना देने से भी नहीं चूके हैं।       

इस पनपती पीढ़ी के पास भी बहुत ज़ख्म हैं। आपकी दी हर मुमकिन सुख-सुविधा के बाद भी। जिन बच्चों ने अपने समय के दबाव को महसूस किया है, उसे महसूस करना आसान नहीं। हर बात पर जरेशन गैप का इलज़ाम लगाकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता।

एक खोखली और कीड़े लगी ज़मीन में लगाए गए पौधे पर आप कितनी भी लागत लगा दें। उसे महंगे से महंगे पानी से धोएं या उसके आस-पास एयर प्यूरीफायर लगाकर साफ हवा मुहैया कराएं। मगर इन सभी कोशिशों में यह भी तो देखना होगा कि मिट्टी में कीड़ा न लगा हो और उसको उपजाऊ भी होना चाहिए। सिर्फ परीक्षा पर चर्चा करने से मिटटी उपजाऊ नहीं बनती बल्कि हालात ऐसे हो जाते हैं कि मुक़ाबले का इम्तिहान सेना की मदद से करवाना पड़ता है। 

इन सबके बीच इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि कल जो सड़कों पर थे, वह सिर्फ अपने लिए नहीं थे। वह अपनी पिछली पीढ़ी का भी खामियाज़ा भर रहे थे। वही पिछली पीढ़ी, जो अपने समय में इन सड़कों को सूनी रखने के लिए ज़िम्मेदार रही है और इन नौनिहालों की गुनहगार है।  

#JantarMantar 

गुरुवार, 18 जून 2026

मैं सियापा फैलाऊंगा

उसूल कहता है कि मूवी देखकर समीक्षा लिखी जाए मगर हालात यह हैं कि मूवी देखने वालों को देखकर समीक्षा लिखने का दिल कर रहा है। अब उसूल बदला है तो इतना किया जा सकता है कि नाम भी बदल दें। नया नाम ‘मैं सियापा फैलाऊंगा’ मुनासिब लग रहा है।

खैर! बचपन में अपने बुज़ुर्गों को अकसर यह कहते सुना है, ‘हम लोग तो अब मिस्ल चिराग़-ए-सहर हैं।’ इसका मतलब होता है रात भर का जला हुआ वह चिराग़ जो बुझने के करीब है। और इसी चिराग़-ए-सहर को इम्तियाज़ अली साहब ने बंटवारे से जोड़ते हुए ऐसा इमोशनली कैश किया है कि देखने वाले इस दुख की ताब नहीं ला पा रहे हैं।

ट्रेलर नुमा लिफाफा देखकर अंदर के जिस मज़मून का अंदाजा लगाया है, उससे इतना ही समझ आया कि माजरा यह है कि सन सैतालीस में जो सोलह बरस का था वह इस वक़्त पंचाननबे बरस का होगा। बस यही इस फिल्म का फार्मूला है कि सोलह की उम्र और बंटवारे की ट्रैजिडी। बाक़ी लंतरानी आप सबके सामने है। या थोड़ा भद्दा जुमला कहें तो यह कि इम्तियाज़ अली साहब थोड़ा और लेट हो जाते तो मोहब्बत की यह स्टैण्डर्ड उम्र उनके हाथ से निकल जाती। कुछ बरस पहले बनाते तो पंचाननबे की उम्र यानी मिस्ल चराग़ ए सहर की बेचारगी की नुमाइश इतनी आला न होती और कुछ बरस बाद बनाने में यह सवाल उठता कि उस ज़माने के लव बर्ड्स अब कहां ज़िंदा होंगे? और कहानी का जो मज़ा खुद किरदार के ज़रिए आता उसे किसी से कहलवाने में इमोशन ज़रा सेकेंड हैंड हो जाते इसलिए सटीक शगुन यही था।

कहानी में ईश्वर सिंह ग्रेवाल (नसरूद्दीन शाह) अगर अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की गिरफ्त में न आते तो शायद ही कोई जान पाता कि हिजरत का दर्द झेलने वाले यह वह लोग थे जिन्होंने अपनी जड़ों को खोया मगर अपने आपको खोखला होने से बचा लिया। बंटवारे के इस खूनी खेल में लाहौर और पंजाब के बाशिंदों ने सबसे ज़्यादा तकलीफें उठाई हैं जबकि इन दुखों की सबसे ज़्यादा ठेकेदारी हिन्दू और मुस्लमान के हिस्से रही। अपने दुखों को दरकिनार करते हुए या दिल की बिलकुल निचली तहों में दफन करने के बाद उस मुल्क को अपना माना जहां हिजरत कर के पहुंचे। फिर हर ग़म को तब तक छुपाकर रखा जब तक इस बीमारी के हाथों मजबूर न हो गए। दुख तो बेशुमार रहे होंगे। अब क्यूंकि लव स्टोरी सदाबहार फार्मूला होती है, तो किसी और तरफ जाने की ज़रूरत ही नहीं।

इंडस्ट्री आज भी मोहब्बत की थीम से बाहर नहीं निकल पा रहे जबकि मंटो बंटवारे के बाद ही ‘टोबा टेक सिंह’ से ऐसा रूबरू करा गए थे कि उनकी कहानी की कोई काट आजतक नज़र न आई। जिस अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की बदौलत यह कहानी पेश की गई है, बेहतर होगा कि एक बार उससे जुड़े आंकड़े भी देख लिए जाएं। भारत और एशिया के नहीं यूरोप और अमरीका के भी। इससे जूझते मरीज़ों को देखिए, उनके साथ रहने वालों को देखिए और अभी तक इसके लिए बेहतर दवा की तलाश में जुटे शोधकर्ताओं को देखिए।

अगर आपके शहर में जेरियटिक्स (geriatrics) सेंटर हैं तो खुद को खुशकिस्मत समझिए क्यूंकि फ्रंटलाइन डॉट द हिंदू डॉट कॉम की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में पंद्रह करोड़ बुज़ुर्गों के लिए सिर्फ़ 300-350 जेरियाट्रिशियन यानी बुज़ुर्गों के डॉक्टर हैं। मेंडिकल के मात्र नौ कॉलेजों में जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी की सिर्फ़ 31 सीटें ऑफ़र करते हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि आने वाले कुछ दशकों में भारत को हज़ारों ऐसे विशेषज्ञों की ज़रूरत होगी जो बुज़ुर्गों को पुरानी बीमारियों, डिमेंशिया और उम्र बढ़ने के साथ होने वाली शारीरिक अक्षमताओं से निपटने में मदद कर सकें। फिलहाल तो यहां सारा दारोमदार उस परिवार का है जिन का मरीज़ इस परेशानी को झेल रहा है।

वैसे भी हमारी सरकारें अब जिस्म को मज़बूत बनाने के लिए योग पर योग करवा रही हैं। मज़बूत जिस्म के साथ अगर जज़्बात कमज़ोर रह जाएं तो बुरा नहीं मगर एक तरफ़ा कमज़ोरी भी ठीक नहीं। यह तो ज़्यादती होगी कि ‘सय्यारा’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ देखकर रोया जाए और जिन मुद्दों पर वाक़ई रोना चाहिए उनसे नज़रें फेर ली जाएं। हालांकि मज़हबी मज़बूती के लिए भी आए दिन कोई न कोई ‘फाइल्स’ टाइप मूवी बन रही है मगर यहां हर क़ौम में ऐसे लोगों की भी भरमार है जिनका मज़हब बात-बात पर आहत हो जाता है। अच्छा होगा कि इस मज़बूती की तरफ भी फिल्मसाज़ कुछ ध्यान दें।

मंगलवार, 5 मई 2026

साहित्य हित में जारी

फिराक साहब उर्दू के साथ अंग्रेजी के भी जानकार थे और उनका मानना था कि इस मुल्क में अगर उनके बाद किसी को अंग्रेजी आती है तो वह पंडित नेहरू हैं। उनकी जानकारी का आलम यह था कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाते वक्त बच्चों से अकसर कहते कि आप मुझसे दुनिया की किसी भी किताब का सवाल पूछ सकते हैं। देर रात के हवाले से लिखे उनके कलाम को पढ़कर इस बात का अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि रतजगा उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा होगा। गोया फिराक साहब एक बैचेन रूह के मालिक थे। बात समझ भी आती है। एक लेखक और वह भी तरक्कीपसंद लेखक का रात को नींद से बैर ही उसकी फितरत का हिस्सा है। ऐसा होना भी चाहिए। दुनिया में बहुत से साहित्यकार और शायर गुजरे हैं जिन्होंने फिक्रों को ओढ़ना-बिछौना बनाया तो नींद उनसे रूठी मिली। गोया सच्चे साहित्यकार का नींद से नाता जरा नादिर (दुर्लभ) हुआ।

अगर कभी साहित्यकार की खूबियां दर्ज की जाएं तो इस खूबी का जिक्र जरूरी है। आज जब हम एक डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं, जहां बात-बात पर आंकड़े ओर डेटा पेश किया जाता है, फिर क्या यह मुमकिन नहीं कि साहित्य को भी थोड़ा साइंटिफिक रूप दिया जाए। इसके दो मोटे-मोटे फायदे तो साफ समझ आ रहे हैं। पहला यह कि साहित्यकार फिल्टर हो सकेंगे। और दूसरा फायदा यह होगा कि पाठक के साथ इंसाफ होगा। 

साहित्यकार की नींद का पता लगाने के लिए हार्ट रेट मॉनिटरिंग की मदद ली जा सकती है। वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे गाड़ी चलाने वाले की आंख की जांच जरूरी हो सकती है, तो कलम या कीबोर्ड चलाने वाले की बेचैनी का भी अंदाजा लगा लेने में कोई बुराई नहीं। रीडिंग के जरिए यह भी पता लगाना कितना आसान हो सकेगा कि कौन सबसे पक्की नींद वाला साहित्यकार है और कौन सबसे कच्ची नींद वाला।  

 कोर्स में भी एक चैप्टर का इजाफा हो जाएगा। शायर ए फिक्र या शायर ए बेफिक्र। साहित्य की सुकून भरी दुनिया का लेखक या साहित्य का बेचैन लेखक। फिर इन दोनों के बहस-मुबाहसे, गुटबंदी और भाईचारा जैसा काफी कुछ नयापन, जो यक़ीनन कई बदलाव के साथ साहित्य में एक ताजगी भी लाएगा। 

सिनेमा और सीरियल की दुनिया में भी छांट-बीन आसान हो सकेगी। सुकून ये बेसुकूनी की थीम पर बनने वाले ड्रामा या मूवी के लिए भटकने की गुंजाइश भी कम होगी। मुमकिन है कि इन खूबियों के सामने आते ही सुकून और बेचैन जैसे अवॉर्ड की दो नई किस्में भी वजूद में आ जाएं। वहीं प्रकाशन की दुनिया में भी इस एक अदद इजाफे को हाथों-हाथ लिया जाना चाहिए।

इसका एक और फायदा यह होगा कि सुकून का साहित्य कहने ओर सुनने वाले रात भर की भरपूर नींद के बाद सुबह से दोपहर तक अपने प्रोग्राम करें और बेसुकूनी वाला खेमा शाम से अपनी महफिल सजाए। अलबत्ता दोनों गुट इस बात का ख्याल जरूर रखें कि मौका निकालकर एक दूसरे के प्रोग्राम में भी शिरकत करें और चाहे तो साल भर बहसें करें मगर एक दिन सुकून और बेसुकूनी भाईचारा या बहनचारा के नाम करके साहित्य हित का भी ख्याल रख लें।

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

धूप के बंद दरवाज़े से गुज़रते हुए

जिन दिनों सच का ख़याल एक साज़िश नजर आने लगे, जिस दौर की दुनिया हवस के जूते पहने तकनीक के ट्रैक पर बेतहाशा भाग रही हो और जिस ज़माने में विकास की आड़ में ऐसी तामीर का चलन हो जहां क़ुदरत, सपने और प्रेम को बहुत गहराई में दफ़ना देना आम हो चुका हो, ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के बंद दरवाज़े' की आमद को शालिनी सिंह के ही शब्दों में बयान करें तो कह सकते हैं-

कि वे प्रेम से रिक्त होती धरती पर
प्रेम के उपजाऊ बीज रोपने आये हैं।

या जिन दिनों

न गांव में गांव बचे हैं
न पहाड़ पर पहाड़
जल जंगल जमीन को
कंक्रीट का धुंआ निगल रहा है

ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के बंद दरवाज़े' की आमद उम्मीद दिलाती है-

यक़ीन का एक सूरज है
फूल उसकी प्रतीक्षा में है
वह जब भी उदित होगा तो
दुनिया उजास से भर जाएगी।

सवा सौ पृष्ठों में सत्तावन कविताओं वाला संग्रह 'धूप के बंद दरवाज़े' शालिनी सिंह का पहला कविता संग्रह है। इन कविताओं में स्त्री विमर्श उतनी ही जगह घेरे है जितना उसे घेरना चाहिए। भूत, भविष्य, वर्तमान की स्त्री और उसके सिमटे संसार के विमर्श की गुहार को शालिनी ने इच्छाशक्ति के साथ बहुत दूर तक पहुंचाने का प्रयास किया है। शिकायत में भी शालीनता बरतते हुए जब शालिनी लिखती हैं-

हंसना
जो अनिवार्य पाठ था जीवन का
उसके लिए सबसे अधिक बार टोका गया

हंस मत पगली शीर्षक वाली कविता में शालिनी इस सच्चाई के पीछे की साज़िश को बड़ी ही सादगी से बेनक़ाब करती हैं-

दुनिया आश्वस्त थी
कि सत्ता किसी की भी हो
व्यवस्था यही चलेगी। 

शालिनी के कवि मन ने कविताओं को तो रचा है मगर यहां दर्ज कविताएं खास इसलिए हैं कि उन्होंने एक कवि की नैतिक जिम्मेदारी को जाना, समझा और फिर बरता है। इस रचने में शालिनी ने समीप और सुदूर की उन सभी चीज़ों को शामिल किया है जिन्हें अकसर हम हाशिए पर पाते हैं या रफ़्तार से भागते वक़्त ने जिन्हें कहीं बहुत पीछे गुमा दिया है। इस संग्रह के बहाने लोकगीतों का जुड़ाव शालिनी के उस अनुभव को कैनवास पर लाने में सफल है जो हमारी मिट्टी और ख़मीर का हिस्सा होने के बावजूद हमसे छूटता जा रहा है।

इन्हीं कविताओं में शालिनी शब्दों के साथ आंकड़ों से भी खेलती हैं, समाज और सत्ता से सवाल करती यह स्लेट उस समय एक आइना बन जाती है जब वह खुशरंग नज़र आने वाली दुनिया पर से फ़रेब की परतें उतारती हैं। जब लोकतंत्र का चौथा खंभा सरकारी मुखपत्र की भूमिका में हो उस समय शालिनी अपनी कविता के बहाने अपने समय के हाकिम और उनके मातहतों से साक्षत्कार करती हैं। शालिनी अपने मन की बात के वाले विचारों को चुनती हैं। वह मजलूमों के खेमे में खड़ी नजर आती हैं। शुभकामनाओं की बहती नदी शीर्षक वाली कविता के एक अंश की इस रिपोर्टिंग को देखिए-

अनुमान किया गुणा गणित हमेशा सच नहीं होता
जब कोई आला अधिकारी दुनिया के ख़ुशरंग
चेहरों का हिसाब लेकर बैठता है
तो ख़ुशी के सूचकांक में निचले पायदान पर
खिसक जाता है हमारा देश  

यही वह पंक्तियां हैं जो किसी भी नागरिक को हैप्पीनेस इंडेक्स से लेकर हंगर इंडेक्स तक के बारे में सोचने को मजबूर करती हैं, गोया यहां पर शालिनी सफल होती हैं उन सवालों को चिंगारी देने में जिन पर बारीक हेर-फेर के साथ बड़े ही चमकीले मुलम्मे चढ़ा दिए गए हैं।

सभ्यता, प्रकृति और रीत-रिवाजों वाली इस दुनिया में शालिनी प्रेम की सुंदरता को पूरी शिद्दत से महसूस करती हैं। यहां प्रेम के ख़ुमार की शिद्दत ज़रूर है मगर वह चेतना पर हावी नहीं होती। प्रेम की पेंग भरपूर ऊंचाई तक जाने के बावजूद छल की सीमा का अतिक्रमण नहीं करती है। शालिनी की इन कविताओं में प्रेम को भरपूर समर्थन मिला है मगर इस प्रेम में वह आधी आबादी को हवास बरक़रार रखने की नसीहत देने का फ़र्ज़ भी निभाती हैं। अपनी लंबी कविता प्रेम की हिस्सेदारी से बेदख़ल में वह कहती हैं-

 दुनिया की तमाम प्रेमिकाएं जब इन आख्यानों को पढ़ें
तो लगा दें मोहर अपने समर्थन की
और करवा लें समय की जमीन में अपने इस एलान की रजिस्ट्री
कि प्रेमियों अब तुमसे हमारा निबाह तभी होगा
जब तुम प्रेम को
संवेदना की स्याही से लिखना सीख जाओगे  

अपने संग्रह के बहाने शालिनी ने कई कालों में गश्त की है। आस्थाओं और अंधविश्वासों पर प्रहार किया है। भगवान से संवाद किया है। कई शब्दों को सहेजा है। मुहावरों से खेला है।  इन सबके बीच कविताओं की वैरायटी से गुजरते हुए जो सबसे महत्वपूर्ण लगा वह है, एडवेंचर का दख़ल। यात्रा करती स्त्रियां भला किस स्त्री का सपना नहीं होगा। इस लंबी कविता की एक पंक्ति के जिस एडवेंचर को समझा जाना चाहिए और जिस पर विमर्श की सबसे ज़्यादा जरूरत है वह है-

पर मर्दों के बिना यात्रा करती
स्त्रियों के समूह को भी अकेला ही मान लिया जाता है 

इसे लामबंद व्यवस्था के लिए अधिक चौकाने वाली बात बताने के अलावा कवयित्री उन भीतर की यात्राओं का ज़िक्र भी करती है जहां बरसों की कायरता के पिघलने के साथ उन्हें कोलंबस भी बनना है और हवा के रुख़ पर निगाह भी रखनी है।

विमर्श की इस यात्रा में शालिनी ने सहयात्रियों की भी पड़ताल की और इस नतीजे पर पहुंचीं कि स्त्रीवाद को स्त्रीवादियों से भी बचाए जाने की ज़रुरत है। कुछ बड़े उदारमना कवि शीर्षक से लिखी गई कविता को इस संग्रह का एक बड़ा ही दिलचस्प अध्याय कह सकते हैं। इसे पढ़ते वक़्त वह परतें खुलती हैं जिन पर आम इंसान का अमूमन कम ही ध्यान जा पाता होगा। स्त्रीवाद के एजेंडे में कब विपरीत एजेंडा शामिल हो जाता है, इसे शालिनी ने क्या ख़ूब समझा है। वैसे तो कविता का हर हिस्सा कई तरह की धुंध को साफ करता है मगर मिसाल के लिए इस पंक्तियों का सहारा ले रहे हैं-

उनसे कौन कहे कि तुम्हारे अतिस्रवाद से हम
कितना कमतर महसूस करते हैं 

शालिनी के ख़यालात के घोड़े अधिकतर दिशाओं में दौड़े और उन्होंने हर दिशा का मुआयना किया। शब्दों के चुनाव पर ख़ास महारत के साथ सियाह को सियाह और सफ़ेद को सफ़ेद कहने की कोशिश की है। और ऐसे में एक ख़्वाहिश सामने आई है। या शायद एक पाठक के तौर पर एक लेखक से यह मेरी अपेक्षा भी हो सकती है। सदियों से ही हालात ऐसे बने रहे जहां अधिकार की लड़ाई और इसकी जागरूकता ने स्त्री और पुरुष को दो पालों में बांट दिया है। अपेक्षा बस इतनी है कि, क्यों न एक ऐसे पाले की बुनियाद डाली जाए जिसमें उन स्त्री और पुरुषों को जगह मिले जो एक दूसरे के अधिकार और अपने फ़र्ज़ की बात करते हैं।

बदलते दौर ने तमाम रवायतों को बदला है। कई अच्छे तो कई बुरे तजुर्बे से दो-चार किया है, वही आज हमारे बीच एक ऐसी पीढ़ी भी है जो अपनी समझ के बल पर तमाम पिछली दकियानूसी रवायतों को रौंद चुकी है। इस पीढ़ी से आने वाले वक़्तों को लेकर बहुत उम्मीदें जुड़ती हैं। यह पीढ़ी उस तीसरे पाले को विस्तार देने के साथ समृद्ध करने की भी सलाहियत रखती है। और ऐसे में शालिनी ही नहीं हर आने वाले से यह अपेक्षा तो हमारा समय कर ही सकता है कि उस विचार को जगह मिले, जो इस समय सृजन की जरूरत भी है और उम्मीद का सबसे बड़ा प्रकाश स्तम्भ भी।  

अगर पहला संग्रह इतना परिपक्व है तो अगले का इन्तिज़ार करना हर ईमानदार पाठक की चाहत होनी ही चाहिए। अपने ख़याल ज़ाहिर करते हुए हर कविता को समेटना न ही मुमकिन है और न ही उचित मगर शालिनी को इस पहले संग्रह के लिए बहुत-बहुत मुबारकबाद देना चाहेंगे।

क्यूंकि शालिनी की कविताएं प्रेम का एक संसार रचती हैं। कुदरत का दामन थामना जानती हैं। शब्दों से सहलाने और वार करने के साथ उनके तरकश में व्यंग की पूंजी भी मौजूद है। इस संग्रह से गुजरते हुए उन्हें पथरीली भूमि पर चलने के साथ लड़खड़ाते क़दमों को साधने की कोशिश में पाया है। ज़ुल्म और अंधेरे का बयान करने के साथ वह उम्मीद और सूरज की बात करती हैं। इसलिए उनकी ही कही बात से अपनी बात को मुकम्मल करने के लिए मन के मंजीरे कविता की इन पंक्तियों को दोहराना चाहेंगे-

जानती हूं इस रात की
अवधि थोड़ी लंबी है
पर ऐसा भी नहीं कि
पूरब दिशा से सूरज उगेगा ही नहीं
और अंजोर होगा ही नहीं 

https://www.jansandeshtimes.net/view/13074/varanasi/8

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

साहित्य हित में जारी

यह शोध का विषय नहीं होना चाहिए कि हमारे आस-पास समस्या ज़्यादा हैं या कवि, मगर यह विमर्श का विषय ज़रूर होना चाहिए कि एक 'मसला मंच' हो और यहाँ पर समस्याओं की एक फेहरिस्त बनाकर उनका हिस्सा बांट किया जाए।

मसलन चाँद पर खूब-खूब शायरी हुई है और इस चक्कर में धरती की ज़रा अनदेखी हो गई। चाँद से अगर नज़रों को ज़रा नीचे लाया जाए और धरती की सुंदरता के परे कुछ मुद्दों पर नज़र डाली जाए तो पता चलेगा कि एक बार फिर से हुस्न के मयार बदलने का वक़्त आ नहीं चुका बल्कि बहुत पहले ही गुज़र चुका है।

इसमें अलजेब्रा की भी मदद ली जा सकती है। जैसा हम सबने बचपन में पढ़ा है, 'क' बराबर फलाना और 'ख' बराबर ढिकाना। अब ठीक उसी तर्ज़ पर चलते हुए कुछ समय के लिए अगर स्त्री विमर्श को प्लास्टिक प्रदूषण मान लें तो हमें पता चल सकेगा कि देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत एकत्र नहीं हो पाता और नदियों, मिट्टी व शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों में पहुँच जाता है।

अब अगर स्त्री विमर्श का स्टीयरिंग एक साल, छह माह या एक माह के लिए इस तरफ मोड़ दिया जाए और इस पर स्त्री विमर्श का आधा, चौथाई या दसवां हिस्सा भी काम किया जाए तो नतीजों का एहसास ही मन पुलकित करता है। मिशन में दम फूकने के लिए कहीं इसे फैशन से भी जोड़ दें तो नतीजे आफत हो सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे फेस्टिवल सीज़न पर होने वाली बम्पर सेल, ऑफर और ढिंचैक धूम वगैरह-वगैरह।

इसका एक और सुखद पहलू यह होगा कि होली के समय में छिछोरे कवियों को भी इस मुहिम में शामिल किया जा सकेगा। जो अभी तक जीजा-साली और देवर-भाभी के विषयों तक सीमित रह गए थे वह भी बुरा न मानो होती है के दम पर दमदार पेशकश दे सकेंगे।

फिलहाल सभी साहित्यकारों से गुज़ारिश है कि साहित्य-हित की खातिर इस विमर्श को संज्ञान में लें और अपनी कीमती राय से अवगत कराएं।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

क्या कांग्रेस की तरफ लौट रहा है मुसलमान?

 

 

 -समीना खान

पिछले दिनों सीतापुर जेल में बंद वरिष्ठ सपा नेता आजम खान से मिलने गईं उनकी पत्नी पूर्व सांसद तंजीन फातिमा ने आजम की रिहाई के मुद्दे पर मीडिया से बातचीत में कहा- ‘उन्हें अब किसी से कोई उम्मीद नहीं है। उम्मीद है तो केवल अल्लाह से।‘ दूसरी तरफ, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने यह कहकर तंजीन फातिमा के बयान की तस्दीक कर दी कि मैं उनसे सहमत हूं। आजम खान पर गलत मुकदमे लगाकर उन्हें जेल में बंद किया गया है। अब तीन ही सूरत में वह जेल से बाहर आ सकते हैं-पहली, प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आए, दूसरी उन्हें कोर्ट से न्याय मिले और तीसरा उन्हें भगवान न्याय दें।

तंजीन फातिमा का यह बयान उनके समाजवादी पार्टी से मोहभंग के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीति के एक जानकार बताते हैं कि अखिलेश यादव ने आजम खान को पूरी तरह बिसराकर अपना सारा ध्यान पीडीए की राजनीति पर लगा रखा है। उन्हें जिस तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छी सफलता मिली है, उससे उत्साहित होकर वह मुस्लिमों पर अपनी राजनीति केंद्रित न करके पीडीए का समीकरण साधकर 2027 के विधानसभा चुनाव का किला फतह करना चाह रहे हैं।

अखिलेश यादव का राजनीतिक आकलन और रणनीति अपने स्थान पर सही हो सकती हैं लेकिन उन्होंने आजम खान को जिस तरह दरकिनार किया है, उससे मुस्लिम समुदाय में घोर निराशा है। मुस्लिम समाज अभी तक एकजुट होकर सपा को वोट देता आया है लेकिन आजम खान के प्रकरण के बाद से आहिस्ता-आहिस्ता मुस्लिमों का एक वर्ग अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस की तरफ देखने लगा है। उस कांग्रेस की तरफ, जिसकी छत्रछाया में उसने आजादी के बाद से आज तक अपने को महफूज महसूस किया है। दूसरी तरफ, भाजपा जिस तरह हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे को उछालकर हिंदुओं के थोक वोट हासिल कर रही है और जिस तरह कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार भाजपा पर हमलावर हैं, उससे भी मुसलमानों के एक बड़े तबके को लग रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर अगर भाजपा को कोई पार्टी चुनौती दे सकती है तो वह कांग्रेस ही है। ऐसे में क्यों न कांग्रेस की तरफ ही चला जाए? दूसरे शब्दों में कहें तो मुसलमान अपने मूल की तरफ लौटना चाह रहा है।

सीबीएसई बोर्ड के एक स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने वाले सलमान सोशल होने के साथ मेल-जोल का एक अच्छा दायरा रखते हैं। अलीगंज निवासी सलमान ख़याल के सामने इन सवालों को रखा कि क्या वाक़ई मुस्लमान कांग्रेस की तरफ वापसी कर रहा है और आज़म खान प्रकरण से मुसलमानों का सपा से मोह भंग हुआ है?  सलमान का जवाब था कि मुस्लिम समुदाय उतना पिछड़ा भी नहीं है जितना अमूमन समझा जाता है। आगे वह कहते हैं कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक बड़ा पढ़ा-लिखा तबका कांग्रेस के शासन में अपना भविष्य तलाश रहा है।

सलमान इस बात का इक़रार करते हैं कि एक दौर था जब मुस्लमान आंख बंद करके कांग्रेस को वोट दिया करता था। मगर अब वह मानते हैं कि मुस्लिम वोटर की अपनी चॉइस है। सलमान इस बात को एक अच्छा संकेत मानते हैं कि इस दौर का मुसलमान किसी एक पार्टी को बिना सोचे विचारे सपोर्ट नहीं कर रहे हैं। मौजूदा सियासी तब्दीलियों के हवाले से सपा से मुसलामानों के मोहभंग पर सलमान का कहना है कि बेशक तमाम बदलाव हुए हैं मगर इन तब्दीलियों से ऐसा कुछ स्पष्ट नहीं होता कि मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी से दामन छुड़ाने की तैय्यारी कर ली है।

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डॉक्टर सीमा जावेद ने अपने करियर की शुरुआत लखनऊ के सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट से की थी। कुछ वर्ष पत्रकारिता की दुनिया में रहने के बाद उन्होंने एक बार फिर से एकेडमिक और रिसर्च की की तरफ वापसी की। वर्तमान में वह क्लाइमेट साइंटिस्ट के तौर पर काम कर रही हैं। मौसम के मिज़ाज पर पैनी निगाह रखने वाली डॉक्टर सीमा जावेद को राजनीतिक उतार-चढ़ाव की खासी पकड़ है। मुसलामानों का समाजवादी पार्टी से मोहभंग होने और कांग्रेस के खेमे में कूच करने के सवाल पर उनका जवाब एक तीसरा एंगिल सामने लाता है। डॉक्टर सीमा का मानना है कि अपने सूबे में मुस्लिम वोट में शिया और सुन्नी का डिवीजन हमेशा से रहा है और इस सोच के हवाले से यहां के हालात में कोई ज़्यादा बड़ा बदलाव उनको महसूस नहीं हुआ है। इस बटवारे से इतर वह राहुल और अखिलेश के गठजोड़ को मौजूदा सियासत का सबसे प्रभावी फैक्टर मानती हैं। उनका कहना है कि राहुल और अखिलेश का साथ मुसलामानों को एकजुट करने की बड़ी वजह है और यहाँ पर मुसलमान आज़म खान प्रकरण को इतनी अहमियत नहीं देगा जितनी इस गठबंधन को मिलेगी । उनके मुताबिक़, इन दोनों का सियासी गठजोड़ वह बड़ा फैक्टर होगा जो मुसलामानों को बड़ी तादाद में लेकर चलने में कामयाब होगा।

डॉक्टर जावेद, आज़म खान की गिरफ्तारी और उनसे जुड़े लोगों की दिलआज़ारी की बात करती हैं। इस मामले पर उनका कहना है कि ताज़ीन खान उनके परिवार और कुछ करीबी लोगों का दिल दुखना लाज़िमी है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। 

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“मुस्लमान तो कांग्रेस का ही था!” ये त्वरित टिप्पणी अनवर मिर्ज़ा ने तब की, जब उनसे सवाल पूछा गया कि क्या मुसलमान कांग्रेस की तरफ लौट रहा है? टूरिज़्म इंडस्ट्री से जुड़े अनवर मिर्ज़ा पुराने लखनऊ के कटरा अबूतराब के रहने वाले हैं। करीब डेढ़ दशक से भी ज़्यादा समय  से अनवर इस ट्रेड से जुड़े हुए हैं। कोविड से पहले वह एक ऑफिस में बतौर इम्प्लॉई काम करते थे मगर जब महामारी फैली तो ऑफिस बंद हो गया और धीरे-धीरे उन्होंने अपने नेटवर्क को फैलाया और इसी कारोबार को जारी रखा। आज उनका अपना सेटअप है। अनवर का कहना है कि मुसलमान और कांग्रेस दोनों को ही एक दूसरे का साथ छोड़ने का खामियाज़ा भुगतना पड़ा है मगर आज दोनों ने ही एक दूसरे की अहमियत को जान लिया है।

आज़म खान विवाद पर अनवर का स्पष्ट जवाब था कि कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों ने मुसलामानों का हितैषी बनकर उन्हें सिर्फ वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया है मगर यह सब असल में खुद की हितैषी रही हैं। अनवर पूरे यक़ीन से कहते हैं कि सपा की इस हरकत से मुसलमानों की आंख खुली है और उन्हें कांग्रेस की क़द्र हुई है। साथ ही वह यह भी कहते हैं कि कांग्रेस को भी इस बात का एहसास है कि इस मुल्क का मुसलमान ही उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकता है। अनवर यहां पर एक और बात जोड़ते हैं, वह यह कि कांग्रेस और मुसलमान का साथ किसी मज़हबी या पसर्नल फायदे के लिए नहीं बल्कि पहले भी एक सेक्युलर राष्ट्र के लिए था और एक बार फिर से ऐसा ही होगा।

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खालिद खान रिटायर्ड एलआईसी ऑफिसर हैं और दुबग्गा क्षेत्र में रहते हुए सामाजिक कार्यों में अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा व्यतीत करते हैं। मुसलमानों के कांग्रेस के खेमे में लौटने पर उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया कि सुबह का भूला शाम को घर लौट रहा है। हालांकि वह इसे गलत भी नहीं मानते। उनका कहना है कि हमारे पुरखों और नेहरू-इंदिरा वाली कांग्रेस के बीच एक अलग ही बॉन्डिग थी। मुसलमान सुकून से अपनी नौकरी-धंधा करते थे और पांच बरस बाद जाकर कांग्रेस को वोट दे दिया करते थे। सब-कुछ सही सलामत चल रहा था। फिर वही बदलाव जो दुनिया में हमेशा से और हर मामले में होता आया है। मुसलमानों ने भी सपा का एतबार किया, उन्हें भर-भर वोट दिया मगर मुलायम सिंह तक तो फिर भी हालात बेहतर कह सकते हैं, लेकिन उनके बेटे में वह बात नहीं।

दूसरे सवाल के जवाब में खान साहब का कहना था कि आज़म खान केस हमारी पूरी कौम के सामने एक डेमो है। मुसलमानों को समझ आ रहा है कि जब अपने करीबियों की तरफ से अखिलेश किनारा कर सकते हैं तो फिर क़ौम के लिए उनसे उम्मीद रखें बमानी होगा। उनके मुताबिक़ आज़म खान क्या किसी भी मुस्लमान की पैरवी करके अखिलेसग हिन्दू वोटर की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहेंगे।  

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चिकन के कपड़ों के कारोबारी मोहम्मद मतीन नक्खास इलाक़े में रहते हैं और चौक में इनका कारखाना है। मुसलमानों के कांग्रेस के खेमे में वापसी के सवाल पर मतीन का अंदाज़ बिलकुल जोशीला हो जाता है और पूरी खुशमिज़ाजी के साथ वह कहते हैं कि मुसलमान ही नहीं जानकार हिन्दू भी अब कांग्रेस की तरफ लौटता नज़र आ रहा है। मतीन आगे कहते हैं कि वह यह बात हवा में या महज़ दिल को बहलावा देने के इरादे से नहीं कह रहे। अपने इस जोश और कॉन्फिडेंस के पीछे वह दिनभर बाज़ारों के लगाए गए चक्कर और लोगों से होने वाली मुलाक़ातों का हवाला देते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि देख लीजिएगा, ऐसा ही होगा।

आज़म खान मामले में सपा के सहयोग पर मतीन की थ्योरी बिलकुल अलहदा थी। मतीन के मुताबिक़, सपा इस इन्तिज़ार में हैं कि आज़म खान अपनी रिहाई के लिए भाजपा का दामन थामे और सपा को उनसे दूर होने का मौक़ा मिले। यहाँ भी मतीन ने पूरे विश्वास के साथ अपना पिछले वक्तव्य दोहराया- कि देख लीजिएगा, ऐसा ही होगा।

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कांग्रेस प्रवक्ता मनीष हिंदवी से इस सिलसिले में बात हुई और जानना चाहा कि क्या वाक़ई मुसलमान कांग्रेस की तरफ लौट रहा है? इसके जवाब में उनका कहना था कि मैं आपको एक किस्सा सुनाता हूं जिसमें आपके सवाल का जवाब मिल जाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता के मुताबिक़, जिस समय अकबरनगर के निवासियों को इस सरकार ने बुलडोज़ करने के बाद उनके बरसों पुराने घरों से बेदखल कर दिया और इन्हें बसंतकुंज शिफ्ट किया गया, वहां पर यह लोग भी अपनी टीम के साथ पहुंचे। वह बताते हैं कि इस बदहाली में उन्होंने वहां एक अधेड़ उम्र मुस्लिम महिला को यह कहते सुना- हमें राहुल भैया पर भरोसा है। वह कहते हैं कि यह उम्मीद एक ऐसी महिला का बयान था जिसको कोई स्वार्थ नहीं, वह बेघर हो चुकी थी, उसे एक ऐसे कमरे में डाल दिया गया था जिसके लिए उनसे पांच लाख मांगे जा रहे थे। वह इसे लोगों पर राहुल का बढ़ता हुआ ट्रस्ट बताते हैं। उनके अनुसार, खासकर भारत जोड़ो यात्रा के बाद से राहुल गांधी का लोगों से कनेक्ट बना है। अपनी बात में वह यह भी जोड़ते हैं कि मौजूदा सरकार में जो भी समुदाय सत्ता के निशाने पर रहा है वह इस समय कांग्रेस से आस जोड़ रहा है।

सपा से मोहभंग और वापसी के सवाल पर उनका कहना है कि ये हकीकत है कि कम्युनिटी का ट्रस्ट हासिल करना इतना आसान नहीं होता है इसके बावजूद आने वाले समय को लेकर उनका कहना है कि न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि देश में मुस्लिम कम्युनिटी एक स्ट्रांग पिलर बनकर वापस कांग्रेस के साथ ऐसे ही खड़ी होगी जैसे वह जवाहर लाल और इंदिरा जी के साथ खड़ी थी।

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सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से जब इस बारे में जानना चाहा और तज़ीन खान की मायूसी के साथ मुसलमानों के कांग्रेस की तरफ वापसी करने की बात उनके सामने रखी तो उन्होंने दोनों ही बातो का खंडन किया। उनका कहना था कि दोनों ही बातें गलत हैं, न तो मुस्लमान सपा से किनाराकशी कर रहा है और न ही कांग्रेस की तरफ लौट रहा है। तज़ीन खान के सपा से नाउम्मीदी पर राजेंद्र चौधरी ने जवाब दिया कि पार्टी बराबर से उनके साथ खड़ी है। उनके अनुसार, ऐसे में तज़ीन खान अगर कुछ सोचती या कहती हैं तो यह उनका व्यक्तिगत नजरिया हो सकता है। आगे उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि इस समय वह एक मुश्किल दौर से गुज़र रही हैं मगर उन्हें भी सोचना चाहिए कि सपा सत्ता में नहीं है। राजेंद्र चौधरी ने तज़ीन खान की ही बात को दोहराते हुए कहा कि हम भी तो वही बात कह रहे हैं जो तज़ीन खान का कहना है,  कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आए तो आज़म खान को इंसाफ दिलाने में कोई दिक्कत ही नहीं होगी।

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शनिवार, 24 मई 2025

हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद

 साहित्य अकादमी का नय्यर मसूद पर पब्लिश मोनोग्राफ ‘हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद’  पढ़ना अच्छा लगा। 'शहर-ए-अदब' और 'शहर-ए-सुख़न' जैसे हवालों पर ज़माने की जो गर्द आ गई है, उसे इस तहरीर ने जैसे साफ कर दिया। हर पलटते पन्ने के साथ नय्यर मसूद की शख्सियत नुमाया होती गई और इस बात का एहसास भी बढ़ता गया कि इस मोनोग्राफ की बदौलत अदब और सुखन से इस शहर के रिश्ते में एक मज़बूत गिरह लगाने वाले का शुक्रिया अदा करना चाहिए।

इस मोनोग्राफ को लिखने के लिए अगर महज़ एक फ़ोन की मदद लेकर शोएब साहब का शुक्रिया अदा किया जाए तो यह ज़्यादती होगी। और तब इरादा किया कि जिस शख्स ने यह काम किया है, उससे फोन पर इतनी बात-चीत तो कर ही लें कि कुछ लिखा जा सके।

शोएब साहब यानी शोएब निज़ाम रिटायर प्रिंसिपल रहे हैं। मेरे बुज़ुर्ग दोस्त हैं और अदब के उन जानकारों में से हैं जिनके पास मुल्क नहीं दुनियाभर के अदब और अदीबों से जुड़ी ढेरो-ढेर जानकारियां है। उनकी मालूमात का हवाला हम क्या देंगे जिनका चुनाव खुद साहित्य अकादमी ने किया हो। लेकिन शोएब निज़ाम से पहले नय्यर मसूद को समझना ज़्यादा ज़रूरी है।

साहित्य अकादमी ने अगर नय्यर मसूद साहब के नाम का इंतिखाब किया तो यक़ीनन उनकी खूबियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बीसवीं सदी की तीसरी दहाई में पैदा हुए नय्यर मसूद का घराना ईरान से ताल्लुक रखता है। इनका खानदानी पेशा हकीमी था मगर वालिद इन्हें एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में भेजना चाहते थे और उस वक्त की मुनासिबत से तय हुआ कि इन्हें फारसी पढ़ाई जाए। मगर नय्यर मसूद लखनऊ यूनिवर्सिटी में फ़ारसी के प्रोफेसर बने।

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के दौरान नय्यर मसूद की दोस्ती शम्सुर्रहमान फारूकी से हुई। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से 1964 में उन्होंने रजब अली बेग सुरूर और उनके कलमी आसार' पर अपनी पीएचडी मुकम्मल की। कुछ दिन शहर बरेली में बतौर उस्ताद पढ़ाने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में फारसी के लेक्चरर हो गए। अफ़सानानिगारी के अलावा तनक़ीद (आलोचना), अनुवाद जिनमें काफ्का की कहानियां, बोर्खेस की नज्मों अलावा भी बहुत कुछ लिखने वाले नय्यर मसूद ने बच्चों के लिए भी लिखा है।  

नय्यर मसूद न सिर्फ एशिया बल्कि पूरी दुनिया के कुछ खास फ़ारसी दानिश्वरों में से हैं। वह ज़माने के जदीद (आधुनिक) उर्दू के अफसानानिगार होने के साथ आला दर्जे के मुतर्जिम (अनुवादक) भी हैं। नय्यर मसूद की कहानियों में वजूदियत (अस्तित्ववाद) के अलावा जादुई हक़ीक़त पसंदी और तहज़ीब का असर साफ झलकता है। नय्यर मसूद काफ्का, कैमियो, पिंचन, एडगर एलन पो, ब्रैंट और दोस्तोवस्की से मुतास्सिर थे।

अदब की खिदमत के लिए नय्यर मसूद को जिन अवॉर्ड से नवाजा गया है उनमें साहित्य अकादमी और सरस्वती सम्मान (ताऊस चमन की मैना, 2007), कथा अवॉर्ड (1992_93), उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवॉर्ड, राष्ट्रपति सम्मान ओर ग़ालिब अवॉर्ड के अलावा भी तमाम नाम शामिल हैं।

 साहित्य अकादमी के लिखे इन मोनोग्राफ का मक़सद होता है कि हिन्दुस्तान की एक ज़बान की अदबी हस्ती के कारनामों से बाक़ी ज़बानों के लोग भी वाक़िफ़ हों। भारत की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी देश में अदब को बढ़ावा देने वाली ऐसी केंद्रीय संस्था है 24 भारतीय ज़बानों में अदबी सरगर्मियां करती है।

हालांकि शोएब साहब बड़ी ही बेतकल्लुफी से इस बात का ज़िक्र करते हैं कि जब पिछले बरस साहित्य अकादमी ने ये तय किया कि नय्यर मसूद पर मोनोग्राफ लिखा जाएगा, तो उस वक़्त पद्म श्री से नवाज़े गए शीन क़ाफ़ निज़ाम को भी यही लगा कि इस काम के लिए सबसे मुनासिब नाम शोएब निज़ाम का ही हो सकता है। 

अक्टूबर या नवम्बर 2024 में साहित्य अकादमी के उर्दू विभाग से शीन क़ाफ़ निज़ाम उर्फ़ शिव किशन बिस्सा ने शोएब निज़ाम से कहा कि वह नय्यर मसूद साहब पर उर्दू में एक मोनोग्राफ लिखें जो साहित्य अकादमी के लिए होगा। शीन क़ाफ़ निज़ाम ने उन्हें इस लिए चुना था क्योंकि शोएब निज़ाम, नय्यर मसूद के ख़ास शागिर्द होने के साथ-साथ उन पर कई आर्टिकल लिख चुके थे।

इस फरमाइश के जवाब में शोएब निज़ाम ने अनीस अशफ़ाक़ के नाम की पैरवी यह सोचकर की कि वह इसे ज़्यादा बेहतर कर सकेंगे। शीन क़ाफ़ निज़ाम ने जब अनीस अशफ़ाक़ से राब्ता किया तो इत्तिफ़ाक़ से उन दिनों उनकी सेहत ठीक नहीं थी और वह किसी और काम में ऐसे उलझे हुए थे कि कि इस मोनोग्राफ के लिए शोएब निज़ाम को खुद से ज़्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देने वाला बताया। इस तरह शोएब निज़ाम का नाम इस काम के लिए तय हो गया।

शोएब निजाम की अलीगढ़ से मोहब्बत ने इस मोनोग्राफ के मुकम्मल होने में बड़ा ही बेहतरीन रोल अदा किया है। शोएब साहब को अलीगढ़ से कुछ ख़ास दिलचस्पी थी और किसी भी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार के बहाने वहां पहुंचने की कोशिश भी किया करते थे। एक ऐसी ही कामयाब कोशिश के मौके पर ज़फर अहमद सिद्दीक़ी ने शोएब साहब से कहा कि आपसे एक काम है। जब जवाब मिला- 'हुक्म कीजिए' तो इस पर ज़फर साहब ने उन्हें एक शागिर्द महजबीं खान से ये कहकर मिलाया कि इसकी पीएचडी नय्यर मसूद साहब पर है और आप इसकी मदद कर दीजिए।

 उस रिसर्च के बहाने खुद शोएब साहब ने भी अपने उस्ताद की ज़िंदगी को एक बाइस्कोप की तरह से प्ले किया और इस तरह किया कि सिलसिलेवार उनकी ज़िंदगी के हर लम्हे से गुज़रते चले गए।

 मोनोग्राफ पढ़ा तो शोएब साहब के लिए के लिए उस्ताद के हवाले से अफीफ सिराज का ये शेर याद आया-

''आज हुए मजबूर हम ऐसे, हार के हमने माना है
तुमने हमको हमसे बेहतर जाना है पहचाना है।''

 महजबीं खान को पीएचडी कराने के दौरान जो जानकारी जमा हुई उसमे सबसे बढ़ा हिस्सा शोएब साहब की उस याददाश्त का था जो बतौर शागिर्द उन्होंने अस्सी की दहाई की इब्तिदा से उनके साथ या उनके ज़िक्र के साथ गुज़ारा था। इसके अलावा बाक़ी जानकारी नय्यर मसूद साहब के साहबज़ादे तिमसाल मसूद की बदौलत मिली। और कुछ हिस्सा नय्यर साहब पर रिसर्च कर रही इस इस्टूडेन्ट ने जमा किया था।

 इस रिसर्च को कराते हुए नय्यर मसूद की ज़िंदगी की सिलसिलेवार दस्तावेज़ी जानकारी शोएब साहब के ज़ेहन में जमा हो चुकी थी। यही वजह रही कि जब मोनोग्राफ पर काम शुरू किया गया तो इसमें ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

 क़रीब सौ पन्नो वाले इस मोनोग्राफ, 'हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद' के ज़रिये उनकी ज़िंदगी से मौत तक की तमाम छोटी बड़ी जानकारियों को इसमें शामिल किया गया है। उनकी ज़िंदगी के खाके के साथ अफसा नानिगारी, तहक़ीक़, तनक़ीद (आलोचना), बच्चों का अदब और तर्जुमे के अलावा मुख्तलिफ गैरअफसानवी कारनामे भी शामिल हैं।

 हालांकि साहित्य अकादमी के लिए शोएब साहब का पहला मोनोग्राफ मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी पर साल 2015 में आया था। इससे पहले उर्दू अकादमी के लिए अनीस अशफ़ाक़ के मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी पर लिखे मोनोग्राफ पर शोएब साहब को कुछ ऐतराज़ थे और किताब का जवाब किताब से देते हुए उन्होंने साहित्य अकादमी के मोनोग्राफ की सूरत में अपनी बात कही। इस मोनोग्राफ को अदबी दायरे में खासी मक़बूलियत मिली।

 'हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद' के हवाले से शोएब निज़ाम कहते हैं कि इसे पढ़ने वाला इस हद तक जान सके कि हिस्पानवी शायर बोर्खेस की नज़्में हो या फिर सूफी के ड्रामे का तर्जुमा, नय्यर मसूद ने इन सभी पर काम किया है।

 जब शोएब निज़ाम से जानना चाहा कि किस जानकारी को हासिल करने में उन्हें सबसे ज़्यादा वक़्त लगा तो मालूम हुआ वह 'हकीम-ए-नबातात' थी। टाइटल से शोएब साहब ने अंदाजा लगाया की ये हकीमी नुस्खे होंगे मगर सूरत ए हाल वह न निकली जो उन्होंने समझी थी। ये फ़ारसी में तर्जुमा किए गए एक तुर्की ड्रामे की उर्दू पेशकश थी। इस तर्जुमे में अल्फ़ाज़ की रवानी और मुहावरे के इस्तेमाल इतने खूबसूरत थे कि तर्जुमे का एहसास ही नहीं होता था।

 शोएब साहब खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि उन्हें नय्यर मसूद साहब की बैठकों में शामिल होने का मौक़ा मिला है। वह कहते हैं- ''मैं वहां बहुत बैठा हूं। बहुत पाबन्दी से बैठा हूं। इसलिए बैठा हूं कि वहां जी बहुत लगता था।''

 मिसाल देते हुए वह कहते- ''नय्यर साहब बहुत उम्दा गुफ्तगू करते थे। मसलन हॉलीवुड की फिल्मों की बात हो रही हो तो नय्यर साहब बताते कि मर्लिन मुनरो का चेहरा किस ज़ाविये (एंगल) से अच्छा लगता है। और यह ऐसे ज़िक्र थे जिसका हम लोग तसव्वुर भी नहीं कर सकते थे।''

 शोएब निज़ाम कहते हैं- ''मैंने तमाम पढ़ने वालों को देखा है जो यह बताने की कोशिश में रहते थे कि देखो मैंने कितना पढ़ा है। इसके बरअक्स नय्यर साहब इसको छुपाते रहते कि उन्होंने कितना पढ़ा है। जब कोई मौज़ू छिड़ता और नय्यर साहब उस पर बोलते तो अंदाजा होता कि इस शख्स को कितनी जानकारी है।''

 आगे वह कहते हैं- ''नय्यर साहब के साथ जितना वक़्त गुज़रा वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत और यादगार ज़माना है। इसकी वजह यह है कि बहैसियत इंसान नय्यर साहब बहुत बड़े आदमी थे।''

 शोएब निज़ाम सन 1980 में नय्यर साहब के शागिर्द बने और उसके बाद यहीं मुलाज़िमत मिल गई। वह बताते हैं कि उस ज़माने में लखनऊ बड़े अदीबों से छलकता रहता था। एक वक़्त में लखनऊ में इतनी मारूफ अदबी हस्तियां थीं कि मैं अभी भी बिना रुके कम से कम 25 नाम गिना सकता हूं।

 बदले हुए दौर का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं कि अब मोबाईल ने उसकी जगह ले ली हैं मगर हमारे वक़्तों का तरीक़ा ये था कि जहां कोई नया रिसाला आया, हम सारे दोस्त रात में बैठकर उस रिसाले की अहम चीज़ों पर गुफ्तगू किया करते थे। तब हर शख्स की कोशिश ये हुआ करती थी कि पहली फुर्सत में रिसाला खरीद कर पढ़े।

 बाराबंकी जिला रोज़ागांव के रहने वाले शोएब निज़ाम ने नय्यर मसूद की सरपरस्ती में यास यगाना पर पीएचडी पर काम तो शुरू किया था मगर इस बीच कानपूर में मुलाज़िमत मिलने की वजह से रिसर्च मुकम्मल न हो सकी। उनका संग्रह ‘अक्स गुम-ए-गश्ता’ साल 2020 में आया और उनकी यादों की बुनियाद पर तैयार ‘सरे सय्यार गान-ए सुख़न’ 2021 में आया। उनका अगला नॉविल गर्द-ए-सफ़र छपने के लिए लगभग तैयार है।

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...