जिन दिनों सच का ख़याल एक साज़िश नजर आने लगे, जिस दौर की दुनिया हवस के जूते पहने तकनीक के ट्रैक पर बेतहाशा भाग रही हो और जिस ज़माने में विकास की आड़ में ऐसी तामीर का चलन हो जहां क़ुदरत, सपने और प्रेम को बहुत गहराई में दफ़ना देना आम हो चुका हो, ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के बंद दरवाज़े' की आमद को शालिनी सिंह के ही शब्दों में बयान करें तो कह सकते हैं-
कि वे प्रेम से रिक्त होती धरती पर
प्रेम के उपजाऊ बीज रोपने आये हैं।
या जिन दिनों
न गांव में गांव बचे हैं
न पहाड़ पर पहाड़
जल जंगल जमीन को
कंक्रीट का धुंआ निगल रहा है
ठीक उन्हीं दिनों में 'धूप के
बंद दरवाज़े' की आमद उम्मीद
दिलाती है-
यक़ीन का एक सूरज है
फूल उसकी प्रतीक्षा में है
वह जब भी उदित होगा तो
दुनिया उजास से भर जाएगी।
सवा सौ पृष्ठों में सत्तावन कविताओं वाला
संग्रह 'धूप के बंद दरवाज़े' शालिनी सिंह का पहला कविता संग्रह है। इन कविताओं में स्त्री
विमर्श उतनी ही जगह घेरे है जितना उसे घेरना चाहिए। भूत, भविष्य, वर्तमान की स्त्री
और उसके सिमटे संसार के विमर्श की गुहार को शालिनी ने इच्छाशक्ति के साथ बहुत दूर तक
पहुंचाने का प्रयास किया है। शिकायत में भी शालीनता बरतते हुए जब शालिनी लिखती हैं-
हंसना जो
अनिवार्य पाठ था जीवन का
उसके लिए सबसे अधिक बार टोका गया
हंस मत पगली शीर्षक
वाली कविता में शालिनी इस
सच्चाई के पीछे की
साज़िश को बड़ी ही
सादगी से बेनक़ाब करती
हैं-
दुनिया आश्वस्त थी
कि सत्ता किसी की भी हो
व्यवस्था यही चलेगी।
शालिनी के कवि मन
ने कविताओं को तो रचा
है मगर यहां दर्ज
कविताएं खास इसलिए हैं
कि उन्होंने एक कवि की
नैतिक जिम्मेदारी को जाना, समझा
और फिर बरता है।
इस रचने में शालिनी
ने समीप और सुदूर
की उन सभी चीज़ों
को शामिल किया है जिन्हें
अकसर हम हाशिए पर
पाते हैं या रफ़्तार
से भागते वक़्त ने जिन्हें
कहीं बहुत पीछे गुमा
दिया है। इस संग्रह
के बहाने लोकगीतों का जुड़ाव शालिनी
के उस अनुभव को
कैनवास पर लाने में
सफल है जो हमारी
मिट्टी और ख़मीर का
हिस्सा होने के बावजूद
हमसे छूटता जा रहा है।
इन्हीं कविताओं में शालिनी शब्दों के साथ आंकड़ों से भी खेलती हैं, समाज और सत्ता से सवाल करती यह स्लेट उस समय एक आइना बन जाती है जब वह खुशरंग नज़र आने वाली दुनिया पर से फ़रेब की परतें उतारती हैं। जब लोकतंत्र का चौथा खंभा सरकारी मुखपत्र की भूमिका में हो उस समय शालिनी अपनी कविता के बहाने अपने समय के हाकिम और उनके मातहतों से साक्षत्कार करती हैं। शालिनी अपने मन की बात के वाले विचारों को चुनती हैं। वह मजलूमों के खेमे में खड़ी नजर आती हैं। शुभकामनाओं की बहती नदी शीर्षक वाली कविता के एक अंश की इस रिपोर्टिंग को देखिए-
अनुमान किया गुणा गणित हमेशा सच नहीं होता
जब कोई आला अधिकारी दुनिया के ख़ुशरंग
चेहरों का हिसाब लेकर बैठता है
तो ख़ुशी के सूचकांक में निचले पायदान पर
खिसक जाता है हमारा देश
यही वह पंक्तियां हैं जो किसी भी नागरिक को हैप्पीनेस इंडेक्स से लेकर हंगर इंडेक्स तक के बारे में सोचने को मजबूर करती हैं, गोया यहां पर शालिनी सफल होती हैं उन सवालों को चिंगारी देने में जिन पर बारीक हेर-फेर के साथ बड़े ही चमकीले मुलम्मे चढ़ा दिए गए हैं।
सभ्यता, प्रकृति और रीत-रिवाजों वाली
इस दुनिया में शालिनी प्रेम की सुंदरता को पूरी शिद्दत से महसूस करती हैं। यहां प्रेम
के ख़ुमार की शिद्दत ज़रूर है मगर वह चेतना पर हावी नहीं होती। प्रेम की पेंग भरपूर ऊंचाई
तक जाने के बावजूद छल की सीमा का अतिक्रमण नहीं करती है। शालिनी की इन कविताओं में
प्रेम को भरपूर समर्थन मिला है मगर इस प्रेम में वह आधी आबादी को हवास बरक़रार रखने
की नसीहत देने का फ़र्ज़ भी निभाती हैं। अपनी लंबी कविता प्रेम की हिस्सेदारी से बेदख़ल
में वह कहती हैं-
तो लगा दें मोहर अपने समर्थन की
और करवा लें समय की जमीन में अपने इस
एलान की रजिस्ट्री
कि प्रेमियों अब तुमसे हमारा निबाह तभी
होगा
जब तुम प्रेम को
संवेदना की स्याही से लिखना सीख जाओगे
अपने संग्रह के बहाने शालिनी ने कई कालों
में गश्त की है। आस्थाओं और अंधविश्वासों पर प्रहार किया है। भगवान से संवाद किया है।
कई शब्दों को सहेजा है। मुहावरों से खेला है।
इन सबके बीच कविताओं की वैरायटी से गुजरते हुए जो सबसे महत्वपूर्ण लगा वह है,
एडवेंचर का दख़ल। यात्रा करती स्त्रियां भला किस स्त्री का सपना नहीं होगा। इस लंबी
कविता की एक पंक्ति के जिस एडवेंचर को समझा जाना चाहिए और जिस पर विमर्श की सबसे ज़्यादा
जरूरत है वह है-
पर मर्दों के बिना यात्रा करती
स्त्रियों के समूह को भी अकेला ही मान
लिया जाता है
इसे लामबंद व्यवस्था के लिए अधिक चौकाने
वाली बात बताने के अलावा कवयित्री उन भीतर की यात्राओं का ज़िक्र भी करती है जहां बरसों
की कायरता के पिघलने के साथ उन्हें कोलंबस भी बनना है और हवा के रुख़ पर निगाह भी रखनी
है।
विमर्श की इस यात्रा में शालिनी ने सहयात्रियों
की भी पड़ताल की और इस नतीजे पर पहुंचीं कि स्त्रीवाद को स्त्रीवादियों से भी बचाए जाने
की ज़रुरत है। कुछ बड़े उदारमना कवि शीर्षक से लिखी गई कविता को इस संग्रह का एक बड़ा
ही दिलचस्प अध्याय कह सकते हैं। इसे पढ़ते वक़्त वह परतें खुलती हैं जिन पर आम इंसान
का अमूमन कम ही ध्यान जा पाता होगा। स्त्रीवाद के एजेंडे में कब विपरीत एजेंडा शामिल
हो जाता है, इसे शालिनी ने क्या ख़ूब समझा है। वैसे तो कविता का हर हिस्सा कई तरह की
धुंध को साफ करता है मगर मिसाल के लिए इस पंक्तियों का सहारा ले रहे हैं-
उनसे कौन कहे कि तुम्हारे अतिस्रवाद से
हम
कितना कमतर महसूस करते हैं
शालिनी के ख़यालात
के घोड़े अधिकतर दिशाओं में दौड़े और उन्होंने हर दिशा का मुआयना किया। शब्दों के चुनाव
पर ख़ास महारत के साथ सियाह को सियाह और सफ़ेद को सफ़ेद कहने की कोशिश की है। और ऐसे में
एक ख़्वाहिश सामने आई है। या शायद एक पाठक के तौर पर एक लेखक से यह मेरी अपेक्षा भी
हो सकती है। सदियों से ही हालात ऐसे बने रहे जहां अधिकार की लड़ाई और इसकी जागरूकता
ने स्त्री और पुरुष को दो पालों में बांट दिया है। अपेक्षा बस इतनी है कि, क्यों न
एक ऐसे पाले की बुनियाद डाली जाए जिसमें उन स्त्री और पुरुषों को जगह मिले जो एक दूसरे
के अधिकार और अपने फ़र्ज़ की बात करते हैं।
बदलते दौर ने
तमाम रवायतों को बदला है। कई अच्छे तो कई बुरे तजुर्बे से दो-चार किया है, वही आज हमारे
बीच एक ऐसी पीढ़ी भी है जो अपनी समझ के बल पर तमाम पिछली दकियानूसी रवायतों को रौंद
चुकी है। इस पीढ़ी से आने वाले वक़्तों को लेकर बहुत उम्मीदें जुड़ती हैं। यह पीढ़ी उस
तीसरे पाले को विस्तार देने के साथ समृद्ध करने की भी सलाहियत रखती है। और ऐसे में
शालिनी ही नहीं हर आने वाले से यह अपेक्षा तो हमारा समय कर ही सकता है कि उस विचार
को जगह मिले, जो इस समय सृजन की जरूरत भी है और उम्मीद का सबसे बड़ा प्रकाश स्तम्भ भी।
अगर पहला संग्रह इतना परिपक्व है तो अगले का इन्तिज़ार करना हर ईमानदार पाठक की चाहत होनी ही चाहिए। अपने ख़याल ज़ाहिर करते हुए हर कविता को समेटना न ही मुमकिन है और न ही उचित मगर शालिनी को इस पहले संग्रह के लिए बहुत-बहुत मुबारकबाद देना चाहेंगे।
क्यूंकि शालिनी की कविताएं प्रेम का एक
संसार रचती हैं। कुदरत का दामन थामना जानती हैं। शब्दों से सहलाने और वार करने के साथ
उनके तरकश में व्यंग की पूंजी भी मौजूद है। इस संग्रह से गुजरते हुए उन्हें पथरीली
भूमि पर चलने के साथ लड़खड़ाते क़दमों को साधने की कोशिश में पाया है। ज़ुल्म और अंधेरे
का बयान करने के साथ वह उम्मीद और सूरज की बात करती हैं। इसलिए उनकी ही कही बात से
अपनी बात को मुकम्मल करने के लिए मन के मंजीरे कविता की इन पंक्तियों को दोहराना चाहेंगे-
जानती हूं इस रात की
अवधि थोड़ी लंबी है
पर ऐसा भी नहीं कि
पूरब दिशा से सूरज उगेगा ही नहीं
और अंजोर होगा ही नहीं
https://www.jansandeshtimes.net/view/13074/varanasi/8

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