शनिवार, 25 अप्रैल 2026

साहित्य हित में जारी

यह शोध का विषय नहीं होना चाहिए कि हमारे आस-पास समस्या ज़्यादा हैं या कवि, मगर यह विमर्श का विषय ज़रूर होना चाहिए कि एक 'मसला मंच' हो और यहाँ पर समस्याओं की एक फेहरिस्त बनाकर उनका हिस्सा बांट किया जाए।

मसलन चाँद पर खूब-खूब शायरी हुई है और इस चक्कर में धरती की ज़रा अनदेखी हो गई। चाँद से अगर नज़रों को ज़रा नीचे लाया जाए और धरती की सुंदरता के परे कुछ मुद्दों पर नज़र डाली जाए तो पता चलेगा कि एक बार फिर से हुस्न के मयार बदलने का वक़्त आ नहीं चुका बल्कि बहुत पहले ही गुज़र चुका है।

इसमें अलजेब्रा की भी मदद ली जा सकती है। जैसा हम सबने बचपन में पढ़ा है, 'क' बराबर फलाना और 'ख' बराबर ढिकाना। अब ठीक उसी तर्ज़ पर चलते हुए कुछ समय के लिए अगर स्त्री विमर्श को प्लास्टिक प्रदूषण मान लें तो हमें पता चल सकेगा कि देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत एकत्र नहीं हो पाता और नदियों, मिट्टी व शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों में पहुँच जाता है।

अब अगर स्त्री विमर्श का स्टीयरिंग एक साल, छह माह या एक माह के लिए इस तरफ मोड़ दिया जाए और इस पर स्त्री विमर्श का आधा, चौथाई या दसवां हिस्सा भी काम किया जाए तो नतीजों का एहसास ही मन पुलकित करता है। मिशन में दम फूकने के लिए कहीं इसे फैशन से भी जोड़ दें तो नतीजे आफत हो सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे फेस्टिवल सीज़न पर होने वाली बम्पर सेल, ऑफर और ढिंचैक धूम वगैरह-वगैरह।

इसका एक और सुखद पहलू यह होगा कि होली के समय में छिछोरे कवियों को भी इस मुहिम में शामिल किया जा सकेगा। जो अभी तक जीजा-साली और देवर-भाभी के विषयों तक सीमित रह गए थे वह भी बुरा न मानो होती है के दम पर दमदार पेशकश दे सकेंगे।

फिलहाल सभी साहित्यकारों से गुज़ारिश है कि साहित्य-हित की खातिर इस विमर्श को संज्ञान में लें और अपनी कीमती राय से अवगत कराएं।

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