मंगलवार, 5 मई 2026

साहित्य हित में जारी

फिराक साहब उर्दू के साथ अंग्रेजी के भी जानकार थे और उनका मानना था कि इस मुल्क में अगर उनके बाद किसी को अंग्रेजी आती है तो वह पंडित नेहरू हैं। उनकी जानकारी का आलम यह था कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाते वक्त बच्चों से अकसर कहते कि आप मुझसे दुनिया की किसी भी किताब का सवाल पूछ सकते हैं। देर रात के हवाले से लिखे उनके कलाम को पढ़कर इस बात का अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि रतजगा उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा होगा। गोया फिराक साहब एक बैचेन रूह के मालिक थे। बात समझ भी आती है। एक लेखक और वह भी तरक्कीपसंद लेखक का रात को नींद से बैर ही उसकी फितरत का हिस्सा है। ऐसा होना भी चाहिए। दुनिया में बहुत से साहित्यकार और शायर गुजरे हैं जिन्होंने फिक्रों को ओढ़ना-बिछौना बनाया तो नींद उनसे रूठी मिली। गोया सच्चे साहित्यकार का नींद से नाता जरा नादिर (दुर्लभ) हुआ।

अगर कभी साहित्यकार की खूबियां दर्ज की जाएं तो इस खूबी का जिक्र जरूरी है। आज जब हम एक डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं, जहां बात-बात पर आंकड़े ओर डेटा पेश किया जाता है, फिर क्या यह मुमकिन नहीं कि साहित्य को भी थोड़ा साइंटिफिक रूप दिया जाए। इसके दो मोटे-मोटे फायदे तो साफ समझ आ रहे हैं। पहला यह कि साहित्यकार फिल्टर हो सकेंगे। और दूसरा फायदा यह होगा कि पाठक के साथ इंसाफ होगा। 

साहित्यकार की नींद का पता लगाने के लिए हार्ट रेट मॉनिटरिंग की मदद ली जा सकती है। वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे गाड़ी चलाने वाले की आंख की जांच जरूरी हो सकती है, तो कलम या कीबोर्ड चलाने वाले की बेचैनी का भी अंदाजा लगा लेने में कोई बुराई नहीं। रीडिंग के जरिए यह भी पता लगाना कितना आसान हो सकेगा कि कौन सबसे पक्की नींद वाला साहित्यकार है और कौन सबसे कच्ची नींद वाला।  

 कोर्स में भी एक चैप्टर का इजाफा हो जाएगा। शायर ए फिक्र या शायर ए बेफिक्र। साहित्य की सुकून भरी दुनिया का लेखक या साहित्य का बेचैन लेखक। फिर इन दोनों के बहस-मुबाहसे, गुटबंदी और भाईचारा जैसा काफी कुछ नयापन, जो यक़ीनन कई बदलाव के साथ साहित्य में एक ताजगी भी लाएगा। 

सिनेमा और सीरियल की दुनिया में भी छांट-बीन आसान हो सकेगी। सुकून ये बेसुकूनी की थीम पर बनने वाले ड्रामा या मूवी के लिए भटकने की गुंजाइश भी कम होगी। मुमकिन है कि इन खूबियों के सामने आते ही सुकून और बेचैन जैसे अवॉर्ड की दो नई किस्में भी वजूद में आ जाएं। वहीं प्रकाशन की दुनिया में भी इस एक अदद इजाफे को हाथों-हाथ लिया जाना चाहिए।

इसका एक और फायदा यह होगा कि सुकून का साहित्य कहने ओर सुनने वाले रात भर की भरपूर नींद के बाद सुबह से दोपहर तक अपने प्रोग्राम करें और बेसुकूनी वाला खेमा शाम से अपनी महफिल सजाए। अलबत्ता दोनों गुट इस बात का ख्याल जरूर रखें कि मौका निकालकर एक दूसरे के प्रोग्राम में भी शिरकत करें और चाहे तो साल भर बहसें करें मगर एक दिन सुकून और बेसुकूनी भाईचारा या बहनचारा के नाम करके साहित्य हित का भी ख्याल रख लें।

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साहित्य हित में जारी

फिराक साहब उर्दू के साथ अंग्रेजी के भी जानकार थे और उनका मानना था कि इस मुल्क में अगर उनके बाद किसी को अंग्रेजी आती है तो वह पंडित नेहरू हैं...