शुक्रवार, 2 जून 2023

मिस माशा और साहिल

बहुत अरसे से आप से बात करना चाह रहे थे मगर तमाम मसरूफियतों के चलते नहीं की। एक और वजह थी कि खुद को धोखा दे रहे थे कि शायद आप दोनों मान जाएँ और हमें मुखातिब न होना पड़े। 

अब एक छोटी सी गुज़ारिश है कि मेरी इस चिट्ठी को पूरा पढ़ियेगा। ये सिर्फ गुज़ारिश है। बाक़ी जैसी आपकी मर्ज़ी।

क़ायदे से कहना तो अपने बेटे को चाहिए था मगर माशा साहिबा आपको भी कहने का दिल कर रहा है। दरअसल आप दोनों उम्र के उस दौर में हैं जहाँ अपने से बड़ा हर सामने वाला बेवक़ूफ़ और जाहिल नज़र आता है। क़ुदरत का सितम देखिए जो वक़्त आपके कुछ बनने और करने का होता है, उसी वक़्त में आपके हार्मोनल चेंजेस आपका सबसे सख्त इम्तिहान लेते हैं। हर लड़का लड़की इस बदलाव पर बेकाबू हो दुनिया को अपने क़दमों में समझता हैं।

बहरहाल मेरा बेटा बस नाम का ही मेरा बचा है। आपने उसे काबू कर लिया। इसमें मेरे बेटे की नालायक़ी थी या आपकी सलाहियतें, यह तो नहीं मालूम मगर इतना मालूम हो गया कि मेरा बेटा एक बड़ी ही कमज़ोर शख्सियत का मालिक निकला।

न न... आप दोनों कतई ये मत सोचियेगा कि पुरानी रवायती अम्माओं की तरह हम बेटे को पालकर उसकी कमाई खाने का कोई ख्वाब देख रहे हैं। हम तो ऐसी माँ है जिसने अपने बच्चे के लिए उसके सब्जेक्ट भी उसकी मर्ज़ी से चुनने की इजाज़त दी थी, फिर आप दोनों आज कल कभी चांद सितारों के सफर पर होंगे, कभी बादलों की सैर पर और इन सबके साथ एक साथ जीने मरने के मरहले तय कर रहे होंगे। लाइफ पार्टनर चुनने में भी हम कभी उसके खिलाफ न जाते। अपने बच्चे को बस हमने एक तरबियत दी थी कि बेटा कभी झूठ मत बोलना। अफ़सोस की आपके साथ ने उसे झूठ बोलना सिखा दिया मिस माशा।

मेरा बेटा कभी मेरा गुरूर हुआ करता था। पढ़ाई में बड़े शानदार नंबर आते थे उसके। फिर उसने खुद को ज़्यादा क़ाबिल समझ लिया। इतना कि बाक़ी सब उसे जाहिल नज़र आने लगे। आपकी सोहबत में आने से बहुत पहले उसने सिगरेट की लत अपना ली थी। एक माँ के लिए ये खबर जानलेवा न सही नींद उड़ा देने वाली होती है। उसे हर तरह से समझाया और हर बार उसने झूठ बोला। अब हमने सब्र कर लिया है। उसने बताया था कि एक दिन उसने खुद को बहुत कमज़ोर महसूस किया और सिगरेट से उसे ताक़त मिली। कमाल है एक पढ़ा लिखा इंसान अगर एक तबाह कर देने वाली चीज़ को ताक़त पाने का जरिया समझता है तो मेरे मुल्क की जाहिल अवाम से हमे कोई शिकायत नहीं। खासकर उन बेचारे लोगों से जिनके पास रहने, खाने, सोने के भी इंतिज़ाम नहीं।  

हमने हर मुमकिन जतन किया, फिर मेरा इस इलाक़े में शिफ्टिंग का फैसला हमें यह उम्मीद दिला गया कि अब शायद इनका  अकेलापन दूर हो जायेगा और इनकी लत छूट जाएगी। मगर हम मुग़ालते में थे। यहाँ आकर इनकी कमज़ोरी और बढ़ गई। अब इन्हे आपकी भी ज़रूरत दरकार हो गई। 

आपको क्या इलज़ाम दें मिस माशा! जब अपना ही सिक्का खोटा हो। आप तो उसकी ज़िंदगी पर ऐसा छायीं कि उसे जूठ के साथ लफ़्फ़ाज़ी और बदकलामी का भी हुनर आ गया। माफ़ कीजियेगा- जब जब उसने ये झूठ बोले कि उसका आपसे कोई ताल्लुक़ नहीं तब तब मजबूरन हमें उसके साथ आप पर निगाह रखनी पड़ी। हमें उससे कोई  मगर ये देखकर अफ़सोस होता था कि एक लड़की अपने घर से बैठे बैठे किसी लड़के की ज़िंदगी कितनी खूबी से बर्बाद कर रही है और उसे इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं।

अब ये मत कहियेगा कि अपने कुछ नहीं किया। अगर उसके साथ बतियाने वाली चैट डिलीट नहीं की है तो अपनी बातो के कुल घंटों का हिसाब जोड़ लीजियेगा। ये वह घंटे थे जो हमने उसे पढ़ाई के लिए मुहैया कराये थे। उसे अपनी हैसियत में हर मुमकिन सहूलियत देकर यह वक़्त निकला था। इन्ही घंटों में आपकी मोहब्बत के चोंचलों ने उसका रिज़ल्ट तबाह कर दिया। मेरे बेटे का दसवीं का नतीजा 84 % था और बारहवीं में जिस हिसाब से वह तैयारी कर रहा था यक़ीनन 85 % लाता। ऐसा सिर्फ मेरा नहीं उसके टीचर्स का भी मानना था। 

आपको और आप जैसी तमाम लड़कियों को सैल्यूट जिन्होंने इस मुल्क के कितने ही लड़कों की ज़िंदगी और मुस्तक़बिल तबाह कर दिया। एक अच्छी मार्कशीट शायद उसके अच्छे मुस्तक़बिल की अलामत होती। फिर भी आप दोनों इसमें बराबर के शरीक है इस लिए पूरी शर्मिंदगी का बोझ अकेले उठाने की ज़रुरत नहीं।  हां! हमें ये नहीं मालूम कि आप ने अपनी इन कारगुज़ारियों की खबर अपने वालिदैन को दी है या नहीं। मुमकिन है दे दी हो।

सुना है आजकल की लड़किया पापा की परियां होती हैं। बड़ी अच्छी बात है मगर मेरी नज़र में हर उस बाप को, जिसे अपनी बेटी से मोहब्बत है नाज़ुक परी नहीं मज़बूत चट्टान बनाना चाहिए। हुस्न और नज़ाकत की जगह हुनर और क़ाबिलियत ज़यादा ज़रूरी है। ये हमेशा साथ देता है। अरे हां! याद आया। मेरी मुखबिरी की बदौलत हमें पता चला है कि आप ताइक्वांडो सीख रही हैं। अच्छी बात है मगर सेल्फ डिफेन्स की हद तक। तोड़ना बड़ा आसान होता और जोड़ना बेहद मुश्किल। किसी के हाथ पैर हों या किसी का घर। साहिल के मामले में यह भी नहीं कह सकते कि आपने यह सब अनजाने में किया होगा। अपने डिफेन्स के नाम पर किसी के हाथ पैर तोड़ना समझ आता है मगर अपने शौक़ के लिए किसी का आशियाना और मुस्तक़बिल तबाह करना अच्छी बात नहीं। आप बच्ची नहीं। खैर से बालिग़ होने वाली होंगी। मेरा बेटा भी अभी बालिग़ नहीं हुआ है। जल्दी एडमिशन कराने की वजह से 18 बरस का पूरा होने से पहले उसने बारहवीं का इम्तिहान पास कर लिया है। अब पता नहीं आप उससे छोटी हैं या बड़ी। हाँ इतना मालूम है कि आपकी सालगिरह उससे 12 दिन पहले आती है। दरअसल हमारी सोसाइटी में एक और बीमारी भी पाई जाती है। मां बाप एडमिशन से पहले बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट अपनी मर्ज़ी से बनवा लेते हैं। मेरे साथ भी ऐसे तमाम बच्चे पढ़ते थे जिनकी असली पैदाइश की तारीख कुछ और जबकि सर्टिफिकेट में घटाकर कुछ और कर दी जाती है। एक साहब ने तो बड़े जोश में यह भी बता दिया था कि अगर कल को बच्चा सरकारी नौकरी में आता है तो रियायरमेंट असली उम्र के बाद होगा और उसे कई और महीने की सरकारी सेलरी मिल सकेगी। आज भी सरकार और ऊपरवाले की आँख में धूल झोंकने वाले यह सब करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं।

खैर यह सब आपके घरेलू मामले हैं और इसमें दखल देने का हमें भी हक़ नहीं। काश आपने भी कुछ ऐसी सोच रखी होती मिस माशा! तो मेरी घरेलू ज़िन्दगी भी पुरसुकून होती और हमें आपके करीबियों से कोई मुखबिर न तलाश करना पड़ता।

बहरहाल आपके घरेलू मामलों में हम दखल न देते लेकिन मेरा कंसर्न मेरा बेटा है। वही बेटा जो आपसे मिलने से पहले बड़ा सच्चा और सीधा हुआ करता था, वही बेटा जो लड़कियों की मुखालिफत करता था और उसका पूरा बचपन हमें ये समझाने में बीता कि लड़के और लड़कियां अल्लाह की बनाई मख्लूक़ हैं, दोनों बराबर हैं। किसी से हमें नफरत का न तो हक़ है न इजाज़त। उसे लड़कियों से यह शिकायत थी कि उनके लिए स्कूल घर और बाहर सब जगह सॉफ्ट कॉर्नर रखा जाता है और लड़कों के साथ ज़्यादती हो जाती है। मगर कमाल है आपकी ज़ात का। उसकी जिस शिकायत को हम प्यार और मोहब्बत से न दूर कर सके उसे आपके हथकंडे ने ऐसा घोलकर पिलाया कि मेरा बेटा आज आपका असीर है। ऐसा असीर की मेरे मुक़ाबिल भी खड़ा होना सीख गया। उसे हमसे शिकायतें होने लगीं। जबसे आपके फरेब में आया है तबसे हाल यह है कि वह तबतक तो ठीक है जबतक उसकी मर्ज़ी की बातें हो रही हों मगर जहाँ उन्हें कुछ नागवार लगा वहीँ उनकी बदली शख़्सियत नुमाया हो जाती है।

ये बताना इसलिए ज़रूरी है कि आप ये न सोचें कि मेरे घर से या आपके और साहिल की दोस्तों में कोई मेरा मुखबिर है। यह मुखबिर आपका बड़ा ही क़रीबी है और आपको अंदाजा ही नहीं। उसके पास तो आपको तबाह करने के बेशुमार सुबूत भी हैं। ऐसे ऐसे सुबूत जिन्हे देखकर आपके होश उड़ जायेंगे और ऐसे करीबियों से यक़ीन उठ जायेगा। मगर मेरा यक़ीन कीजिये कि हमने उसमे से कोई भी सबूत नहीं लिया। न ही मेरी किसी को ब्लैकमेल करने में दिलचस्पी या यक़ीन है।

मिस माशा क्या ही अच्छा होता कि आप ज़रा सब्र से काम लेतीं। खुद भी कुछ बन जातीं और उसको भी कामयाब हो जाने देतीं। ये वक़्त आपके स्कूली इम्तिहान के साथ ज़िंदगी के इम्तिहान का भी था।  वैसे एक बात और बता दें स्कूल के इम्तिहान तो एक वक़्त में ख़त्म हो जाते हैं मगर ज़िंदगी के इम्तिहान आखिरी सांस तक चलते ही रहते हैं। जैसे आप मेरे सामने एक इम्तिहान बन कर खड़ी हुई हैं और इसे हल करना मेरे लिए ज़रूरी है।

शायद साहिल ने आपको बताया हो कि मेरे खानदान में आजतक हर लड़के लड़की से उसकी शादी से पहले यह सवाल पूछा गया है कि अगर उसकी अपनी कोई पसंद हो तो बता दे। यक़ीन कीजिये मेरे घर का कोई भी इंसान आजतक इस सवाल पर हां का जवाब न दे सका और सबने अपनी शादी का फैसला अपने बड़ों पर छोड़ा। साहिल से भी उसकी शादी से पहले हम यही सवाल करते और उसकी पसंद का एहतराम करते। मगर आपने मेरा दिल बुरा कर दिया है। मेरा बड़ा नुक्सान किया है आपने। अब मेरा दिल कभी भी आपको क़ुबूल नहीं कर पायेगा। मुमकिन है साहिल को मेरे इस फैसले से ऐतराज़ हो और ये भी मुमकिन है कि  वह आपके साथ जाना चाहे तो बस इतना बता दें कि आपका साथ पाने के लिए उसे हमें छोड़ना होगा।

मेरा बड़ा ही सीधा सा उसूल है कि नापसंद लोगों के साथ रहने के बजाय अकेला रहा जाए। ये मत समझियेगा कि हम अपने बेटे की किसी ज़िम्मेदारी से पीछे हैट रहे हैं। हमें अपना फ़र्ज़ पूरा करना आता है और कोशिश भी यही है कि उसमे कोई कमी न होने पाए। रही बात आप दोनों की तो आप अब अगर अभी भी उसमे दिलचस्पी रखती हैं तो ये भी नोट कर लीजिए कि वह बिना बाप का है और हमने उसके मां बाप दोनों बनकर पाला है मगर आपकी उसमे दिलचस्पी उसे माँ - बाप दोनों से महरूम कर देगी।

आज आपकी सालगिरह है मगर मेरा दिल आपको दुआ देने को राज़ी नहीं हो रहा  बेटे के लिए हर हर सांस से दुआ है कि अल्लाह उसे नेक हिदायत दे। दोनों जहाँ की कामयाबी दे।


मंगलवार, 30 मई 2023

गंगा में मैडल के साथ सवा सौ करोड़ का प्रतिनिधित्व भी डूबेगा

मेलानी मोलिटोरोवा और करोल हिंगिस की बेटी मार्टिना हिंगिस का जन्म 30 सितम्बर 1980 को चेकोस्लोवाकिया में हुआ था। हिंगिस के माँ बाप दोनों ही टेनिस खिलाड़ी थे। महज़ 6 बरस की उम्र में मार्टिना के माता पिता का तलाक़ हो गया और मार्टिना अपनी माँ के साथ स्विट्ज़रलैंड आ गईं। यहाँ उनकी मां एक कंप्यूटर टेक्नीशियन एंड्रियाज़ ज़ोग से दुबारा शादी कर लेती हैं। मार्टिना के स्विस पिता कोई कलाकार नहीं थे मगर एक दिन उन्हें एहसास होता है कि इस बच्ची का रुझान टेनिस की तरफ है। वह बच्ची को टेनिस सिखाने का इरादा करते हैं। 

... और एक दिन मार्टिना हिंगिस दुनिया की पहली रैंकिंग वाली स्विस खिलाड़ी बनती हैं। ख़ास बात ये है कि इससे पहले ये खिताब किसी भी महिला क्या पुरुष स्विस खिलाड़ी को भी नहीं मिला था। 

ये खिताब सिर्फ मार्टिना की टेनिस कोर्ट में की गई प्रेक्टिस का तमग़ा भर नहीं था। इसकी कहानी दशकों में लिखी गई थी। उसके माँ बाप का खिलाड़ी होना और बेटी के लिए टेनिस खिलाड़ी बनने का सपना देखना। माँ बाप के रिश्ते का टूटना। माँ का खुदमुख्तारी भरा फैसला, जब वह घर ही नहीं राज्य भी छोड़ देती है। एक अलग प्रोफेशन के शख्स का एक बच्ची की माँ से शादी करना और उसकी सलाहियतों को परवान चढ़ाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करना। 

मार्टिना के नंबर वन बनने के सफर में पेरेंट्स का अलगाव, वतन से बेदखल होना और सौतेलापन जैसे कई मुद्दे सामने आये होंगे मगर इन्हे बेअसर इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इनमे से कोई भी उसके खिताब में रोड़े नहीं लगा सका। 

इसके बरक्स जब बात हिन्दुस्तानी महिला खिलाड़ी के तमग़े की की जाए तो मार्टिना जैसे मुद्दे से परे यहाँ हर मोर्चे पर दुशवारियों के झुण्ड होते हैं। ये देश एनीमिया से लेकर कमज़ोर हड्डी वाले बच्चों और औरतों की सूची में सरफेहरित है। यहाँ लड़कियों की पढ़ाई और खेल तो दूर, अस्तित्व भी खतरे में रहा है। वर्ष 2011 में इस देश का सेक्स रेशियो 1000 पुरुषों के मुक़ाबले में 943 महिलाएं था, जिसके वर्ष 2036 तक प्रति 1000  पुरुष पर बढ़कर 952 महिलाएँ होने की उम्मीद है।

इन हालात में उन जज़्बात, मेहनत और हौसलों का अंदाज़ा लगाइये जो एक बच्ची को खेल के मैदान तक पहुंचाता होगा। क्योंकि इन मेहनतों, हौसलों और जज़्बों की पैमाइश का कोई मीटर नहीं इसलिए इसका ज़िक्र दफ़न हो जाता है। ज़िक्र आता है बेटी बचाओ का, खेलो इण्डिया का और इन जैसी तमाम पॉलीटिकल ब्रांडिग का। फिर सरपरस्त को इसका सारा क्रेडिट जाता है और शानदार फोटोशूट की बदौलत इस बात का डंका पीटा जाता है। इस बीच खिलाडियों को पता ही नहीं चलता कि उनके खिताब अपनी क़ीमत खो चुके हैं।

ब्रांडिंग कामयाब हो जाती है और पॉलिटिक्स बताती है कि  आपका ये मैडल 15 - 15 रुपये  में बाज़ार में बिकता है। एक सियासी के लिए इसकी क़ीमत 15 रुपये हो सकती है मगर एक खिलाड़ी के लिए ये अमूल्य और अमर है। खिलाड़ी अपवित्र तंत्र से हारकर अपने मैडल गंगा में बहाने का फैसला कर रहे हैं। 

वह मैडल जो इन खिलाड़ियों ने जीते हैं, उस पर देश का भी अधिकार है। ये मैडल उन सवा सौ करोड़ लोगों का भी प्रतिनिधित्व करते है जिनमे से कुछ खिलाड़ियों के खिलाफ है और बाक़ियों ने चुप्पी साध ली है। 

बुधवार, 17 मई 2023

''ये साथ सलामत रहे''

हमसफ़र, सफर और साहिल। उसके आगे समंदर। हम ज़मीन पर चलने वाले राही, भला आसमान के नज़ारों से हमें क्या लेना। तुम्हारा साथ ही मेरे पंख है और तुम्हारा हाथ ही मेरी पतवार। फिर आगे ठाठे मारता समंदर हो या पीछे गुज़रे पथरीले रास्ते। अपने हिस्से का कुछ सफर तय करने के बाद ये जाना है कि तुम्हारे साथ चलना ही मेरी मंज़िल है, मेरी कामयाबी है।  

हमें यहाँ तक सलामत लाने वाले बेशुमार क़दमों का शुक्रिया। हमें और आगे ले जाने आने उन अनगिनत क़दमों का भी शुक्रिया जो हमें आने वाले वक़्तों में बढ़ाने हैं। हमने तो बढ़ना जाना है। आगे बढ़ते जाना।

सुना है हम ज़मीन पर रहने वालों का आसमान के सितारों से भी नाता होता है। हुआ करे! सितारों को देखा तो है मगर उस नाते से अनजान। देखा तो बादलों को भी है। इस सफर में उसने कई बार भिगोया। ... और देखा उस सूरज को भी है जिसने देखते ही आँखों को चकाचौंध कर दिया था। उस सूरज की तपिश हमसफ़र की गिरफ्त की हरारत के आगे बेमानी लगी और बादलों का बरसना भी इन क़दमों को थामने में नाकाम नज़र आया। 

क़ुदरत मेरे चारो सिम्त है। हवा पानी बादल सूरज और अँधेरा बन कर। बारिश ने शराबोर किया, हवा ने तरोताज़ा। सूरज ने घटते बढ़ते साये बख्शे थे मगर अँधेरा उन्हें निगल गया और साथ रहा सिर्फ हमसफ़र। चांद ने भी अपने हर हर रूप में आकर हम पर निगाह रखी होगी। चाँद से भी ऊंचाई पर रहने वाले झिलमिल सितारे इसके गवाह हैं। चाँद की मौजूदगी में धुंधला गए इन तारों ने भी अमावस की रातों को टिमटिमाते हुए हमें निहारा है। 

इस हाथ का साथ हो तो इस गोल धरती के अनगिनत चक्कर लगाने की चाह है। बिना रुके बिना थके। फिर क्या साहिल और क्या समंदर। इस साथ पर क़ुदरत भी रश्क़ करते हुए कानो में सरगोशी करती गुज़र जाती है कि ''ये साथ सलामत रहे''।

शुक्रवार, 12 मई 2023

तरक़्क़ी पसंद तहरीक और उर्दू

तारीख़ पर ये इलज़ाम कभी नहीं लगाया जा सकता है कि वह अदबी तंज़ीमों से महरूम रही है। बग़ावत इंसानी फितरत है। बर्दाश्त के ख़त्म होने पर अवाम बग़ावत कर बैठती है। लेकिन बग़ावत और इन्क़िलाब में फ़र्क़ है। बग़ावत के आगे मुस्तक़बिल का कोई नक़्शा नहीं होता है जबकि इन्क़िलाब एक मनसूबे की बुनियाद पर होता है। और इस सूरत में तरक़्क़ी पसंद तख़लीक़ और उर्दू मिलकर एक इन्क़िलाब की बुनियाद डालते हैं। 

बीसवीं सदी की शुरुआत से ही दुनियाभर में आज़ादी की लहर उभरने लगी थी। दुनिया पहली आलमी जंग की तरफ जा रही थी। पहली आलमी जंग में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने अंग्रेज़ों की नुमाइंदगी के बदले हिन्दुस्तानियों का भरोसा तोड़ दिया था। अंग्रेज़ों की इस वादा खिलाफी ने हिंदुस्तान में हिन्दू मुस्लिम इत्तिहाद और खिलाफत की तहरीक को और मज़बूती दी। गाँधी जी की आमद ने मुल्क में एक सामाजि तहरीक को हवा दी। इस वक़्त की उर्दू अदब की खिदमत तारिख के ज़रीन सफ़हात पर दर्ज हुई।

दुनिया की बाक़ी ज़ुबानों की तरह उर्दू अदब भी इस तहरीक में पेश पेश रहा। शायद इसी को डॉक्टर एजाज़ हुसैन ने उर्दू का तरक्की पसंद खमीर कहा है।

बहरहाल 1932 में the world congress of the writer of defence of culture के नाम से एक कॉन्फ्रेंस होती है। जिसमे लंदन से दो हिंदुस्तानी शख्सियत मुल्कराज आनंद और सज्जाद ज़हीर हिस्सा लेते हैं। इससे मुतास्सिर होकर मुल्क राज आनंद और सज्जाद ज़हीर लंदन में अपने चंद साथियों के साथ मिलकर इस अंजुमन का मंशूर (मेनिफेस्टो) तैयार करते हैं। इसकी एक कॉपी हिन्दुस्तान भेजी जाती है जिसपर हिन्दुस्तान के तमाम अदीब दस्तखत करते हैं। इनमे प्रेमचंद, मौलवी अब्दुल हक़, जोश, फ़िराक़, हसरत, क़ाज़ी अब्दुल गफ्फार और अली हुसैनी के अलावा शामिल नामों की एक लम्बी फेहरिस्त है। फिर 15 अप्रैल 1936 को लखनऊ में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफीन का एक इजलास होता है। 

 प्रेमचंद 1936 में दिए गए इसके सदारती ख़ुत्बे में कहते हैं-

'अदब में हुस्न और इख़लाक़ के अनासिर उसी वक़्त पैदा होंगे जब हमारी निगाहे हुस्न आलमगीर हो जाएगी। जब सारी ख़िलक़त इसके दायरे में जाएगी।'

अदीब की मसनद का ज़िक्र करते हुए प्रेमचंद कहते हैं कि अदीब वतनियत और सियासत के पीछे चलने वाली हक़ीक़त नहीं बल्कि उनके आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली हक़ीक़त है।

मुंशी प्रेमचंद ने इसकी सदारत की और इजलास में अदीबों के सामने तरक्की पसंद नज़रियात रखे गए। इस तहरीक ने समाजी नाइंसाफियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। अब अदब का मौज़ू आम इंसान, मेहनतकश और किसान थे। अदब के नए मौज़ू के साथ इसमें नए अलफ़ाज़ भी शामिल किये गए। या कह सकते हैं कि अदब के ज़रिये मार्क्सिज़्म, कम्युनिज़म और सोशलिज़्म के नज़रिये को सामने लाना था।

ग़ज़ल, नज़्म, अफ़साना, नॉविल जितनी भी तख़्लीक़ी असनाफ़ थीं, तरक्की पसंद तहरीक की आमेज़िश हर असनाफ़ में नज़र आने लगी। तनक़ीद, रिपोर्ताज, सफरनामे, ड्रामे कुछ भी इससे अछूता नहीं रह गया था। 

 नतीजे में ये अदब उम्मीद और जोश से भरपूर होने के साथ अक्खड़पन और तेवरों से लबरेज़ होता गया। इसका असर ये हुआ कि एक खास नज़रिये के तहत उर्दू अदब की नौइयत बदल गई। ज़्यादातर शोअरा ने आज़ाद नज़्म का सहारा लिया। जिसमे पहला नाम अली सरदार जाफरी का है। इन्होने मार्क्स के फलसफे को अपनी शाइरी की बुनियाद बनाया। हक़ को मांगने के नहीं बल्कि छीनने के क़ायल अली सरदार जाफरी की नज़र में एक अदीब एक इन्किलाबी सिपाही की तरह होना चाहिए। फैज़ का इन्क़िलाब रुमानियत लिए हुए था। जोश, मजाज़, साहिर गरज़ ये कि हर अंदाज़ में और हर ज़ाविये से तरक्की पसंद नज़्म और नस्र की तख़लीक़ हो रही थी।

 प्रेमचंद के बाद तरक्की पसंद अफ़साना निगारों ने जिंदिगी के मसायल को अपने अफसानों का मौज़ू बनाया ,इन तमाम अफ़साना निगारों ने अपने सियासी शऊर की बिना पर अफ़साने में मकसदियत को नुमाया किया। तरक्की पसंद अफसानों में प्रेमचंद के अफ़साने शहर से गांव का रुख करते हैं। कृश्नचंदर ने फसादात को जगह दी। नदीम अहमद क़ासमी मुनाफ़िक़ात को दिखाते हैं। मंटो और इस्मत चुग़ताई आम ज़िंदगी में हुक़ूक़ ए निस्वां की बात करते है। राजेंद्र सिंह बेदी भी समाज की तल्ख़ हकीकतों को सामने लाते है। उर्दू अफसानों पर तरक्की पसंद अफसाना निगारों की छाप आज भी गहरी है। उर्दू के नए अफसाना निगार चाहे बिल्वास्ता ही सही मगर इससे मुतास्सिर नज़र आते हैं।

तरक़्क़ी पसंद तहरीक का असर इतना ज़्यादा था कि जिसका अंदाजा लगाने के लिए सज्जाद ज़हीर के मुरत्तिब मजमुए अंगारे की दलील ही काफी है। तल्ख़ हक़ीक़तों का बयान करने वाला ये मजमुआ 1932 के आखिर में शाया हुआ था और मार्च 1933 में हुकूमत ने इसे ज़ब्त कर लिया।

तरक्की पसंद तहरीक का एक और यादगार कारनामा 'गाये जा हिन्दुस्तान' के नाम से निकाला गया वह मजमुआ है जो 1946 लाहौर से पब्लिश हुआ। करीब 150 वरक़ वाली यह किताब उन लोकगीतों पर मुश्तमिल है जिसे देवेंद्र सत्यार्थी ने पूरे मुल्क में घूम घूम कर जमा किया था।   

देखते ही देखते थियेटर, रेडियो और सिनेमा में भी तरक़्क़ी पसंद अदब अपनी जगह बनाने में कामयाबी पा रहा था। लखनऊ में इप्टा के क़ायम होने के बाद पहला ड्रामा मुंशी प्रेमचंद का कफ़न पेश किया गया था। गंगा प्रसाद मेमोरियल हॉल में इसमें खुद रशीद जहाँ ने अदाकारी की थी। थियेटर के अलावा वह आल इण्डिया रेडियो से भी इस क़िस्म के ड्रामों को वॉइस ओवर के साथ पेश कर रही थीं। तहरीक के असर की गिरफ्त से सिनेमा की दुनिया भी न बच सकी।

बीसवीं सदी की दूसरी दहाई तक जहाँ मज़हबी और तिलसीमाती फिल्मों का बोल बाला था, वहीँ कुछ ऐसे फिल्मसाज़ आये जिन्होंने इस सनअत को समाजी और इख़लाक़ी क़द्रों से जोड़ा। बंबई टाकीज़, फिल्मिस्तान और दीगर फिल्म कपनियों के लिए फार्मूला फिल्मे लिखने वाले मंटो की अपनी तख़लीक़ पर 1940 में अपनी नगरीया फिल्म आई।

 1916 में मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू नॉविल बाज़ार ए हुस्न लिखा। 1919 में इसका हिंदी तर्जुमा सेवासदन आया और 1938 में इसपर फिल्म बनी। फिर अगले 50 बरसों तक कोई ऐसी दहाई नहीं गई जिसमे मुंशी प्रेमचंद की तख़लीक़ पर कोई फिल्म न बनी हो। 

रंग भूमि- 1946

पंचायत - 1958

हीरा मोती - 1959

गोदान - 1963

गबन - 1966

शतरंज के खिलाड़ी - 1977

टेलीफिल्म सदगति - 1981 

इस्मत चुग़ताई अपने फिल्मसाज़ शौहर शाहिद लतीफ़ के लिए कई फ़िल्में लिखी। इसके अलावा उनकी कहानियों और अफसानों पर भी फिल्मे बनीं। 1973 में गर्म हवा और 1978 में शशि कपूर की फिल्म जुनून यादगार फ़िल्में हैं। जुनून उन्होंने न सिर्फ लिखी थी बल्कि उसमे किरदार भी निभाया। चौथी का जोड़ा और कुछ और कहानियों पर 1990 की दहाई में टेलीफिल्में बनाई हैं।

तरक्की पसंद तहरीक की नुमाइंदगी करने वाले बलराज साहनी की दो बीघा ज़मीन किसी भी हस्सास शख्स के रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है।

समाज की तश्कील नौ एक मंसूबे पर मुन्हसिर है और इसके लिए एक तंज़ीम की ज़रूरत है। इस ज़रूरत का खुलासा 1945 में हैदराबाद में होने वाली तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफीन कांफ्रेंस में दिए गए सज्जाद ज़हीर के इस ख़ुत्बे के ज़रिये सामने आता है-

''बाज़ लोग सवाल करते हैं कि जब हर दौर में तरक्की पसंद अदब की तख़लीक़ होती है और जब हाली, शिब्ली, और इक़बाल भी तरक़्क़ी पसंद हैं तो आखिर तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफीन की अंजुमन बनाने की क्या ज़रूरत है? ये सवाल ऐसा है कि जब दुनिया में इब्तिदा आफ़रीनिश से लेकर आज तक फूल खिलते रहे हैं तो बाग़ लगाने की क्या ज़रूरत है? इस अंजुमन की ज़रूरत इस वजह से पैदा हुई, जिस वजह से दूसरी अंजुमनों की ज़रूरत होती है। यानी अफ़राद इज्तिमाई तौर से अदबी मसायल पर गुफ्तगू और बहस करे। फ़र्द और जमात की ज़रूरत को समझे। समाजी कैफियत का तजज़िया करे। और इस तरह मुश्तर्का नस्बुलऐन क़ायम करे और उसके मुताबिक़ अमल करे।

तरक्की पसंद तहरीक के सामने कुछ इस किस्म के भी सवाल आये जैसे-

* क्या अदब को सियासी तहरीकों में अदबी हिस्सा लेने की ज़रूरत है?

* क़दीम और क्लासिकी अदब की तरफ हमारा रवैया क्या होना चाहिए? 

* हमारी ज़बान कैसी हो?

* मज़हब की तरफ हमारा रवैया कैसा हो?

* या फिर रूमान पसंदी और हक़ीक़त पसंदी के हुदूद क्या हैं?

क्योंकि तरक्की पसंद तहरीक ने इफ़ादियत (Utility) वाले अदब पर ज़ोर दिया था और इज़हार ख्याल की आज़ादी ने कई तरह की सरहदों को तोड़ा था। जिसकी वजह से इस तहरीक के असरात बहुत वसी थे। अगर दुनिया भर की मुख्तलिफ अदबी तहरीकों के दरमियान तौसी (توصیع) और वक़्त के बीच एक ग्राफ बनाया जाए तो यक़ीनन तरक़्क़ी पसंद तहरीक चोटी पर नज़र आएगी। 

 जहाँ एक तरफ तरक़्क़ी पसंद तहरीक अपनी तौसी के साथ बुलंदिया छू रही थी, वहीँ इसके कुछ अदबी नुक़सान भी सामने आये। तरक़्क़ी पसंद तहरीक की ऐसी लहर चली कि इसके ज़ेरे असर तमाम हक़ीक़ी लोगों के साथ गैर हक़ीक़ी लोग भी इसमें शामिल होने लगे। या ये कहें कि उस वक़्त ये तहरीक एक फैशन की शक्ल ले चुकी थी।

 रोशनाई में सज्जाद ज़हीर खुलासा करते हैं कि स्टेटमेन में नामानिगार के नाम से तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफीन के खिलाफ मज़ामीन शाया हुए। बाद में ये भी पता चला की ये पुलिस के एक खास महकमे की कारगुज़ारी है। तरक़्क़ी पसंदों को बिदेसी एजेंट, हिन्दुस्तानी समाजी रवायत का मुनकिर और मआशरे के गद्दार के अलावा औरतों के लिए अफसोसनाक और अज़ीयत वाला रवैया रखने वाला बताया गया। इसका जवाब अखबारात, रिसायल और बहसों के ज़रिये दिया गया।

आज़ादी के साथ तक़सीम हिन्द और इसके ज़ेरे असर होने वाले फसादात ने तरक़्क़ी पसंदों के सामने नए मसायल खड़े कर दिए। जिस आज़ादी का ख्वाब देखा गया था उसकी तकमील नहीं हुई। 1948 आते आते कुछ नौजवान इसे आज़ादी मानते हुए हक़ीक़ी आज़ादी के ज़राय तलाश करने लगे थे। लोगों का रुख सोशलिज़्म की सिम्त होने लगा था। और सबसे बड़ी महरूमी सज्जाद ज़हीर जैसे रहनुमा का पकिस्तान चले जाना था। वहां पहुंचकर खुद सज्जाद ज़हीर अदबी से ज़्यादा सियासी मसरूफियरों में फँस चुके थे। नतीजा ये हुआ कि तरक्की पसंद तहरीक में एक खामोशी का दौर गया था ऐसे में कृश्नचंदर ने इस ज़िम्मेदारी को संभाला। सज्जाद ज़हीर पकिस्तान जेल से आज़ाद होकर हिन्दुस्तान आते हैं। आज़ादी और तकसीम के बाद की निस्फ़ दहाई इन उलझनों  के सही नतीजे तलाशने में निकल जाती है।

हालात ये थे कि अब मज़लूम अवाम को रोटी और रोटी पा चुकी अवाम को रूहानियत की ज़रूरत अभी भी बेचैन कर रही थी। तरक़्क़ी पसंद अदीबों के सामने तरक़्क़ी पसंद मौज़ूआत के तालुक से तशफ्फी और तसल्लीबख़्श जवाब नहीं थे। हालांकि तहरीक के एलाननामे, मेनिफेस्टो, खिताब और तक़रीर का बग़ौर मुताल्या इन पेचीदा सवालों के जवाब मुहैय्या कराता है। मगर इन मसायल के पैदा होने का अहम सबब तरक्की पसंदों की इंतिहा पसंदी माना गया। नतीजे में सिर्फ तहरीक का बड़ा नुकसान हुआ बल्कि यही इसके ज़वाल का भी सबब बना।

तहरीक बनने के 50 बरस बाद हालात ये थे कि उर्दू को न सिर्फ हिक़ारत की नज़र से देखा गया बल्कि इसका वजूद खतरे में आ गया और तब जनवादी लेखक संघ ने इसकी हिफाज़त के साथ फ़रोग़ का ज़िम्मा उठाया और इस तरह अंजुमन जम्हूरियत पसंद मुसन्निफीन के नाम से इसे एक नई ज़िंदगी मिली।

तरक़्क़ी पसंद तहरीक का हर नुमाइंदा अपनी भरपूर काविशों के साथ अदबी तख़लीक़ में तआवुन कर रहा था मगर पूरी तहरीक को फैज़ की कैफियत के हवाले से समझा जाए तो उनके चंद मिसरे इसे बयान कर देंगे-

परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करने वाला सहर और उम्मीद का शायर फैज़ 1941 में शाया नक़्शे फरयादी में कहता है-

हम ने माना जंग कड़ी है, सर फूटेंगे खून बहेगा

खून में ग़म भी बह जाएंगे, हम न रहेंगे ग़म भी न रहेगा।

आज़ादी और तक़सीम के बाद 1953 में शाया दस्ते सबा में फैज़ दाग़ दाग़ उजाला और शब ग़ज़ीदा सहर की बात करते है। बांग्लादेश बनने के बाद यही फ़ैज़ खुद को कहने से नहीं रोक पाए-

हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बाद

और खुद ही उनका सवाल आता है

 कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार

ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द

 इसी नज़्म में तरक़्क़ी पसंद तहरीक का ये नुमाइंदा कहता है-

उन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किए

अन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द

दस्ते सबा की तख़्लीक़ी दौर की मायूसी फैज़ को ये भी लिखने को मजबूर कर देती है- 

बला से हम ने न देखा तो और देखेंगे

फ़रोग़-ए-गुलशन ओ सौत-ए-हज़ार का मौसम


इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...