शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

'दो आवाज़ें'- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उम्मीद के शायर है, स्याह रात में सुबह की उम्मीद के शायर। फ़ैज़ की नज़्म 'दो आवाज़ें' एक ऐसे ही वक़्त की आवाज़ है। टूटी हुई उम्मीद से जब पहली आवाज़ मायूसी की गिरफ्त में आती है तो दूसरी आवाज़ के ज़रिये फ़ैज़ सिर्फ उम्मीद भरे जवाब तराशते हैं बल्कि एक नई सुबह की इबारत लिखते हैं। 

पहली आवाज़

अब सई का इम्काँ और नहीं पर्वाज़ का मज़मूँ हो भी चुका

तारों पे कमंदें फेंक चुके महताब पे शब-ख़ूँ हो भी चुका

अब और किसी फ़र्दा के लिए उन आँखों से क्या पैमाँ कीजे

किस ख़्वाब के झूटे अफ़्सूँ से तस्कीन--दिल--नादाँ कीजे

शीरीनी--लब ख़ुशबू--दहन अब शौक़ का उनवाँ कोई नहीं

शादाबी--दिल तफ़रीह--नज़र अब ज़ीस्त का दरमाँ कोई नहीं

जीने के फ़साने रहने दो अब इन में उलझ कर क्या लेंगे

इक मौत का धंदा बाक़ी है जब चाहेंगे निप्टा लेंगे

ये तेरा कफ़न वो मेरा कफ़न ये मेरी लहद वो तेरी है

 

दूसरी आवाज़

हस्ती की मता--बे-पायाँ जागीर तिरी है न मेरी है

इस बज़्म में अपनी मिशअल--दिल बिस्मिल है तो क्या रख़्शाँ है तो क्या

ये बज़्म चराग़ाँ रहती है इक ताक़ अगर वीराँ है तो क्या

अफ़्सुर्दा हैं गर अय्याम तिरे बदला नहीं मस्लक--शाम--सहर

ठहरे नहीं मौसम--गुल के क़दम क़ाएम है जमाल--शम्स--क़मर

आबाद है वादी--काकुल--लब शादाब--हसीं गुलगश्त--नज़र

मक़्सूम है लज़्ज़त--दर्द--जिगर मौजूद है नेमत--दीदा--तर

इस दीदा--तर का शुक्र करो इस ज़ौक़--नज़र का शुक्र करो

इस शाम ओ सहर का शुक्र करो इन शम्स ओ क़मर का शुक्र करो

 

पहली आवाज़

गर है यही मस्लक--शम्स--क़मर इन शम्स--क़मर का क्या होगा

रानाई--शब का क्या होगा अंदाज़--सहर का क्या होगा

जब ख़ून--जिगर बर्फ़ाब बना जब आँखें आहन-पोश हुईं

इस दीदा--तर का क्या होगा इस ज़ौक़--नज़र का क्या होगा

जब शेर के ख़ेमे राख हुए नग़्मों की तनाबें टूट गईं

ये साज़ कहाँ सर फोड़ेंगे इस क्लिक--गुहर का क्या होगा

जब कुंज--क़फ़स मस्कन ठहरा और जैब--गरेबाँ तौक़--रसन

आए कि न आए मौसम--गुल इस दर्द--जिगर का क्या होगा

 

दूसरी आवाज़

ये हाथ सलामत हैं जब तक इस ख़ूँ में हरारत है जब तक

इस दिल में सदाक़त है जब तक इस नुत्क़ में ताक़त है जब तक

इन तौक़--सलासिल को हम तुम सिखलाएँगे शोरिश--बरबत--नय

वो शोरिश जिस के आगे ज़ुबूँ हँगामा--तब्ल--क़ैसर--कै

आज़ाद हैं अपने फ़िक्र ओ अमल भरपूर ख़ज़ीना हिम्मत का

इक उमर है अपनी हर साअत इमरोज़ है अपना हर फ़र्दा

ये शाम--सहर ये शम्स--क़मर ये अख़्तर--कौकब अपने हैं

ये लौह--क़लम ये तब्ल--अलम ये माल--हशम सब अपने हैं

 


अनुवाद-पहली आवाज़

परवाज़ की तमाम कोशिशें पूरी हो चुकी हैअब लगता नहीं की किसी जद्दोजहद की ज़रूरत है

सितारों पर लंगर डाले जा चुके है और चाँद पर भी पहुंचा जा चुका है

कल का कोई बाक़ी वादा नज़र नहीं आ रहा है

किसी भी झूठे ख़्वाब से दिल को तसल्ली देने का कोई मक़सद सुझाई नहीं दे रहा है

शौक़ का हर मज़मून (विषयबदल चुके है अब न ही अल्फ़ाज़ में खुशबू बची है और न ही आवाज़ में मिठास बाक़ी है

दिल और नज़र की शोखी और शादाबी में जिंदिगी के इलाज नहीं रहे

जीने के फ़साने रहने दो अब इनमे उलझ कर क्या लेंगे

एक मौत का मामला बाक़ी है जब चाहेंगे निपटा लेंगे

ये तेरा कफ़न वो मेरा कफ़नवो तेरी क़ब्र ये मेरी है

 

अनुवाद-दूसरी आवाज़

हुनर के ख़ज़ाने की कोई हद नहीं न ही ये किसी की जागीर है

इस महफ़िल में अपना दिल मुरझाया है या खिला हुआ है ये बेमानी है

ये तो वह महफ़िल है जहाँ किसी एक झरोके के वीरान हो जाने के बावजूद सारा मंज़र झिलमिलाता है

तुम्हारे दिन रात अगर बोझिल है तो भी रात और दिन का सिलसिला जारी है

चाँद और सूरज अपनी जगह पर बरक़रार हैंमौसम का उन पर कोई असर नहीं है

ज़ुल्फ़ और लब खिले हुए है और हसीं फूल आबाद हैं

दिल के दर्द का एहसास और भीगी आँखों की नेमत अभी बाक़ी है

इन आंसू भरी आँखों का शुक्र करोइसे भांप लेने वाली नज़र का शुक्र करो

इस सुबह शाम का शुक्र करोइस चाँद सूरज का शुक्र करो

 

अनुवाद-पहली आवाज़

अगर चाँद और सूरज का यही दस्तूर है तो इस दस्तूर से क्या होगा?

झिलमिलाती रात का क्या मतलब और चमकदार सुबह से क्या होगा?

जब जिगर का सारा खून बर्फ की तरह जम जायगा और आँखें लोहा पहन लेंगी

तब इस भीगी आँखों और दूरअंदेशी का क्या होगा?

जब शेर (कविताख़ाक हो जायगे और नग़मों की तान टूट जाएगी

तब इन नायाब मोतियों का क्या होगा और ये साज़ कहाँ सर फोड़ेंगे

जब पिंजरे का कोना ही ठिकाना होगा और जेब और गिरेबान ही फांसी का फन्दा होगा

तब बहारों का मौसम आये या न आयेइस दुखते दिल का क्या फ़ायदा

 

अनुवाद-दूसरी आवाज़

जब तक ये हाथ सलामत है और जब तक इस खून में जोश है

जब तक इस दिल में सच्चाई है और जब तक बोलने की हिम्मत बाक़ी है

इन बेड़ियों और ज़ंजीरों को हम तुम हंगामे की एक नई भाषा सिखाएंगे

हंगामे की वह भाषा जिसके आगे ऐतिहासिक योद्धाओं के नक्कारों की आवाज़ कमज़ोर पड़ जायगी

हमारे पास हिम्मत का भरपूर ख़ज़ाना हैसोचने और उस पर अमल करने की सलाहियत है

जीवन का हर लम्हा एक सदी के सामान है और हर नया दिन एक नया सवेरा है

ये सुबह और शामये सूरज और चाँद और ये सितारे सब अपने है

ये कागज़ और क़लमये नक्कारेये विरासतें और मान सब अपने है

 

बुधवार, 24 अगस्त 2022

अन अल हक़ की वकालत करती थीं इस्मत आपा

कागज़ पर दर्ज इस्मत चुग़ताई की तहरीर को अगर एक खंजर माना जाए और उनके ख़यालात को हमला, तो निशाने पर कौन है ये बताने की ज़रूरत नहीं। इस्मत का ये खंजर जब भी उठा उसने हया और बनावटी तहज़ीब के उन तंबुओं को तार तार किया है, जिसकी पनाह में न जाने कितने सारे हक़ दफ़न होते रहे हैं। 

इस्मत चुग़ताई के बाद ज़माना बदला। दकियानूसी समाज ने उनका साहित्य तो क़ुबूल किया मगर उनके विचार नहीं। अन अल हक़ की आवाज़ बुलंद करने वाली इस्मत का नाम आज भी दकियानूसी की पैरोकारी करने वालों को दहला देता है। इस दहशत से बचने के लिए उन्होंने तरक़्क़ी पसंद को फैशन माना और उसका लिबास पहनकर खुद को तरक़्क़ी पसंद जमात का हिस्सा बना लिया। 

जिस इस्मत चुग़ताई का साहित्य आज सात आठ दशक बाद पढ़ने वालों के लिए एक स्पार्क का एहसास कराता है उसकी शिद्दत का अंदाजा उनके दौर में क्या रहा होगा। इसे जानने के लिए अगर उन लोगों के ख्यालात जानें जिन्होंने इस्मत के लेखन के साथ उनके जूनून और तेवर भी देखे है तो शायद ज़्यादा बेहतर होगा। इसके लिए उनके समकालीन मंटो से ज़्यादा मुनासिब नाम क्या हो सकता है। 

1948 में मोहम्मद अली रोड बम्बई के क़ुतुब पब्लिशर से छपने वाली एक किताब 'नए अदब के मयमार- इस्मत चुग़ताई' में मंटो लिखते हैं-

आज से तक़रीबन डेढ़ बरस पहले जब मैं बम्बई में था, हैदराबाद से एक साहब का पोस्टकार्ड मौसूल हुआ। उसका मज़मून कुछ इस क़िस्म का था। "ये क्या बात है कि इस्मत चुग़ताई ने आप से शादी न की? मंटो और इस्मत। अगर ये दो हस्तियां मिल जातीं तो कितना अच्छा होता। मगर अफ़सोस कि इस्मत ने शाहिद से शादी कर ली और मंटो...''
उन्ही दिनों हैदराबाद में तरक़्क़ीपसंद लेखकों की एक कॉन्फ्रेंस होती है, मैं इसमें शरीक नहीं था। लेकिन हैदराबाद के एक पर्चे में इसकी रुदाद देखी जिसमे ये लिखा था कि वहां बहुत सी लड़कियों ने इस्मत को घेर कर ये सवाल किया -"आपने मंटो से शादी क्यों न की?''
उस वक़्त तो मैंने ग़ौर नहीं किया लेकिन अब सोचता हूं अगर मैं और इस्मत वाक़ई मियां - बीवी बन जाते तो क्या होता? ये अगर भी कुछ इस क़िस्म की 'अगर' है, अगर कहा जाए कि क्लियोपेट्रा की नाक एक इंच का अट्ठारवां हिस्सा बड़ी होती तो उसका नील वादियों के इतिहास पर क्या असर पड़ता। लेकिन यहां न तो इस्मत क्लियोपेट्रा हैं और न तो मंटो एंटोनी। लेकिन इतना ज़रूर है कि अगर मंटो और इस्मत की शादी हो जाती तो इस हादसे का असर अहद ए हाज़िर के अफ़सानवी अदब की तारीख़ पर एटमी हैसियत रखता। अफ़साने अफ़साने बन जाते, कहानियां मुड़ तुड़ कर पहेलियां हो जातीं। इंशा (लेख) की छातियों में सारा दूध ख़ुश्क होकर या तो एक नादिर सफूफ (दुर्लभ पाउडर) की शक्ल इख़्तियार कर लेता या भस्म होकर राख बन जाता। और ये भी मुमकिन है कि निकाहनामे पर उनके दस्तख़त उनके क़लम की आखिरी तहरीर होते। लेकिन सीने पर हाथ रखकर ये भी कौन कह सकता है कि निकाहनामा होता! ज़्यादा क़रीन क़यास (सम्बद्ध आसार) तो यही मालूम होता है कि निकाहनामे पर दोनों अफ़साने लिखते और क़ाज़ी साहब की पेशानी पर दस्तख़त कर देते ताकि सनद रहे।
अपने आस पास के अलावा दूर दराज़ तक उन्हें इस्मत आपा के नाम से शोहरत मिली थी। जिस वक़्त इस्मत आपा अपनी मौजूदा दुनिया से क़लम के सहारे मोर्चा संभाल रही थीं तो अपनी इस जंग के बदले एक आज़ाद दुनिया का ख़ाका भी उनके ज़ेहन में था। हमारी आज की दुनिया को लेकर इस्मत आपां ने जो ख़्वाब देखा था उसका ज़िक्र अपने मज़मून 'हीरोइन' में करते हुए वह लिखती हैं-
अब देखना ये है कि हमारी आइंदा ज़िन्दगी की हीरोइन किस शान से जलवा अफ़रोज़ होती है। खुदा के बाद औरत की ही परस्तिश अदब में की गई है। या शायद उसका नंबर पहले आता है और फिर दुनिया की दूसरी ताक़तों का। जहां तक अंदाज़ा लगाया जाता है, आने वाली हीरोइन न तो ज़ालिम होगी न मज़लूम। बल्कि सिर्फ एक औरत होगी। और अहरमन ओ यज़दा के बजाए अदीब उसे औरत का ही रुतबा बख्शेंगे और फिर तामीर शुरू होगी। 

(अहरमन ओ यज़दा = फ़ारसी शब्द - फ़ारसियों के मुताबिक़ अहरमन और यज़दां खुदा थे जिनमे अहरमन बदी का और यज़दां नेकी का था।)

नए अदब के मयमार में एक और जगह मंटो लिखते हैं -

हमारी 5 - 6 बरस की दोस्ती के ज़माने का ऐसा कोई वाक़िया नहीं जो क़ाबिल ए ज़िक्र हो। फ़हाशी (अश्लीलता) के इलज़ाम में एक बार हम दोनों गिरफ़्तार हुए। मुझे तो पहले दो दफ़ा तजुर्बा हो चुका था लेकिन इस्मत का पहला मौक़ा था। इसलिए बहुत भन्नाई। इत्तिफ़ाक़ से गिरफ्तारी ग़ैर क़ानूनी निकली। क्योंकि पंजाब पुलिस ने हमें बग़ैर वारंट पकड़ लिया था। इस्मत बहुत खुश हुईं लेकिन बकरे की मां कब तक ख़ैर मनाती। आखिर उसे लाहौर की अदालत में हाज़िर होना पड़ा। 

बम्बई से लाहौर तक काफी लम्बा सफर है लेकिन शाहिद और मेरी बीवी साथ थे। सारा वक़्त खूब हंगामा रहा। सफ़िया और शाहिद एक तरफ हो गए और चिढ़ाने की ख़ातिर हम दोनों की फ़हशनिगारी पर हमले करते रहे। क़ैद की सोबतों (सांगत) का नक़्शा खींचा। जेल की ज़िन्दगी की झलकियां दिखाईं। इस्मत ने आख़िर में झल्लाकर कहा- “सूली पर भी चढ़ा दें लेकिन यहां हलक़ से अन अल हक़ ही निकलेगा।‘’

इस मुक़दमे के सिलसिले में हम दो दफ़ा लाहौर गए। दोनों मर्तबा कॉलेज के तमाशाई तालिबे इल्म मुझे और इस्मत को देखने के लिए टोलियां बांध बांध कर अदालत में आते रहे। इस्मत ने मुझसे कहा- ''मंटो भाई! चौधरी नज़ीर से कहिए कि वह टिकट लगा दें कि यहां आने जाने जाने का किराया ही निकल आएगा।" हम दो दफ़ा लाहौर गए और दोनों ही दफ़ा हमने करनाल शॉप से मुख़्तलिफ़ डिज़ाइनों के दस-दस बारह-बारह जोड़े सैंडिलों और जूतों के ख़रीदे। बम्बई में किसी ने इस्मत से पूछा- "लाहौर आप क्या मुक़दमे के सिलसिले में गए थे? इस्मत ने जवाब दिया- "जी नहीं जूते ख़रीदने गए थे।"

जगदीश चन्द्र विद्धावन अपनी किताब 'शख्सियत और फ़न इस्मत चुग़ताई' के साथ बीते उस वाक़िये का ज़िक्र करते हैं, जिसका असर उनकी शख्सियत पर ऐसा पड़ा जिसने उन्हें खुद से मुलाक़ात करा दी। और न सिर्फ मुलाक़ात कराइ बल्कि ज़िन्दगी का ढर्रा ही बदल दिया।  

''मंगू उनके कोचवान की बेटी इस्मत की बड़ी प्यारी सहेली थी। उम्र में वह उनसे कुछ बड़ी ही होगी। तरह चौदह साल की ही उम्र में उसकी शादी हो गई और वह अपने ससुराल चली गई। जब वह अपनी पलौठी की बेटी को लेकर आई तो उसकी तबियत, शोखी और शरारत और होंठों पर खेलती मुस्कराहट नापैद (दुर्लभ) हो चुकी थी और वह चुरमुरा सी गई थी। उसने इस्मत को बताया कि बेटी जनने के जुर्म में उसकी सास उसे बड़ी बेरहमी से मारती पीटती हैं और उसके मियां से भी पिटवाती हैं। मंगू ने ऊपरतले तीन बेटियों को जन्म दिया तो उसके वहां कोहराम सा मच गया। सास उसपर सौत लाने के मंसूबे बनाने लगी। मंगू पर ज़िंदगी पहाड़ सी भारी हो गई। मंगू के वालिदैन, जो उसकी तीन बच्चियों का बार ए गिरां (भारी बोझ) उठाने से क़ासिर थे, आहें भरते थे। इस्मत अपनी सहेली की तीन रोती बिसूरति भिनकती बच्चियों को भारी दिल से देखती तो उन्हें उसकी हालत ए ज़ार पर रहम आने लगता कि मंगू औरत की बेबसी और बेचारगी की दूसरी मिसाल थी। मंगू को देखकर इस्मत को ख्याल आता कि ख़ुदा ए रहीम ओ करीम ने इस्मत को औरत क्यों बनाया और वह अंदर ही अंदर ख़ौफ़ज़दा हो जाती। इस्मत ने अपने गिर्द ओ पेश नज़र दौड़ाई तो उन्हीं औरतों की बेबज़ायती (बेसहारा) और बेवक़अती का बड़ा घिनौना (घिनावना) और लरज़ाख़ेज़ (दहलाने वाला) मंज़र दिखाई दिया। उनके पास पड़ोस की बेशतर औरतें मदक़ूक़ (बीमार) और सितम रसीदा (ज़ुल्म का शिकार) थीं। वह ख़ुशामद और जीतोड़ मशक़्क़त के बूते पर सुसराल में अपनी ज़िन्दगी के दिन लश्तम पश्तम (ज्यों त्यों करके) काट रही थीं। वह अपने शौहरों, सासों और ननदों के रहमो करम पर थीं। ये देखकर इस्मत को अपने औरतपन पर घिन आती और वह लरज़ लरज़ जातीं। इस्मत के वालिद मुलाज़िमत से सुबकदोश होकर आगरा आ चुके थे। उन्हें इस्मत के ज़रिए मंगू के मामले का पता चला तो उन्होंने लखनऊ के सुपरिटेंडेंट पुलिस के ज़रिए उसके मियां पर दबाव डाला कि  वह मंगू पर सौत लाने से बाज़ रहे वरना उसे क़ैद ओ बंद का सामना करना पड़ेगा। धमकी कारगर साबित हुई। कोई साल भर बाद मंगू आगरा आई तो वह पहचानी न जाती थी। उसके वहां लड़का नहीं हुआ था फिर भी वह चिकनी चुपड़ी दिखाई देती थी और उसके रूखे सूखे मुरझाये हुए चेहरे पर हरियाली और शादाबी थी। इस्तफ़्सार (पूछताछ) पर उसने इस्मत को बताया कि उस पर भूतों का साया हो गया था जो उसके शौहर के वजूद में उठकर उसे वरग़लाते थे और वह अपनी सास की ठुकाई करती। यहां तक कि उसने एक दिन अपने शौहर की पिंडली में काट खाया। इस से सब पर उसकी दहशत बैठ गई। भूत उतारने वालों को बुलाया गया तो उन्होंने सास को मनहूस क़रार दिया और कहा कि  वह अगर उनके साथ रही तो मंगू सात लड़कियों को जन्म देगी और सारा ख़ानदान बरबाद हो जाएगा। सास बेचारी की शामत आ गई और मंगू का मियां उसे अपने साथ अपनी नई मुलाज़िमत पर डालीगंज ले गया।''

इस्मत इस मामले पर अपने रद्दे अमल का इज़हार बड़े मुअस्सर (असरदार) अंदाज़ में यूं करती हैं-

"तब मुझे मालूम हुआ कि मंगू जाहिल और अनपढ़ थी, बिलकुल अहमक़ न थी। अपनी बिसात भर जो कुछ कर सकती थी कर डाला। औरत कमज़ोर हो सकती है नाक़िस अक़्ल (कम अक़्ल) होना ज़रूरी नहीं। मेरे दिल से कुछ एहसास ए कमतरी निकल गया। लड़का होना ज़रूरी नहीं। लड़कों जैसी अक़्ल और सूझ बूझ चाहिए। फिर तो मैंने सीना पिरोना और सुघड़ापा धरा ताक़ पर और पढ़ने की तरफ मुतवज्जो हो गई।“

मंगलवार, 16 अगस्त 2022

लाल सिंह चड्ढा: इस मासूम किरदार को दंगे और कोर्ट कचहरी से दूर ही रखें

 यक़ीनन आमिर खान मिस्टर परफेक्शनिस्ट हैं मगर फॉरेस्ट गंप, फॉरेस्ट गंप है। टॉम हैंक्स की फारेस्ट गंप और आमिर खान की लाल सिंह चड्ढा को लेकर किसी भी तरह की बहस बेमानी है। फॉरेस्ट गंप अगर चांद पर रखा जाने वाला पहला क़दम है तो लाल सिंह चड्ढा तीन दशक बाद उसी चांद पर रखा गया दूसरा क़दम। दोनों को इस चांद तक पहुंचाने वाली शख़्सियत का ज़िक्र ज़रूरी है। रोमांटिक कॉमेडी ड्रामा फारेस्ट गंप 1986 में उपन्यासकार विंस्टन फ्रांसिस ग्रूम के इसी नाम से लिखे उपन्यास पर आधारित है।

बल्कि लाल सिंह चड्ढा की तुलना उस पास्ता डिश से की जा सकती है जो मूलभूत रूप से इटालियन डिश है मगर हिंदुस्तान में इसे यहां के मसालों से तैयार और गार्निश करके खाने वालों के सामने पेश किया जाता है। वह बात अलग है इटालियन और इंडियन को एक दूसरे के पास्ते का ज़ायक़ा लेने के लिए सरहद पार करनी पड़े मगर फॉरेस्ट गंप और लाल सिघ चड्ढा को दुनिया के किसी भी कोने में देखा जा सकता है। 

फिल्म के वर्ल्डवाइड होने के साथ आमिर की मक़बूलियत के रुझान भी सामने आने लगे हैं। लाल सिंह चड्ढा को ऑस्कर एकेडमी ने ख़ास सम्मान दिया है। ऑस्कर एकेडमी के ऑफिशियल इंस्टाग्राम पेज ने एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें फिल्म लाल सिंह चड्ढा और फॉरेस्ट गंप के कुछ सीन की तुलना की गई है।

वीडियो को शेयर करते हुए एकेडमी ने कैप्शन में लिखा कि अद्वैत चंदन और अतुल कुलकर्णी की फिल्म लाल सिंह चड्ढा रॉबर्ट ज़ेमेकिस और एरिक रोथ की फिल्म फॉरेस्ट गंप का हिंदी वर्जन है। इस फिल्म की कहानी एक ऐसे शख़्स की ज़िन्दगी पर आधारित है जो कि सिर्फ अपनी मेहरबान तबीयत से दुनिया को बदल देता है।

फिल्म शुरू होती है एक लम्बे चौड़े डिस्क्लेमर के साथ जिसमें मेकर्स ख़ुद को बचाने के साथ किसी को आहत न करने की हर संभव कोशिश करते नज़र आते हैं। मगर डिस्क्लेमर हो, या चुनावपूर्व जारी घोषणापत्र या फिर संविधान, सबकी एक ही कहानी है। अनदेखा किया जाना। 

रिलीज़ के पहले और बाद में फिल्म की अच्छाई और बुराई को लेकर लगभग सभी एंगेल से लाल सिंह चड्ढा का पोस्टमॉर्टम किया जा चुका है। इसलिए बात उन मुद्दों पर की जाए जिन पर या तो कम लिखा गया है या अनदेखा रखा गया है। और यही बात आमिर खान का विरोध करने वालों को समझनी होगी। टॉम हैंक्स की फारेस्ट गंप अपनी कामयाबी का परचम लहराने के बाद उस बरस के 6 अकादमी अवार्ड जीतती है जबकि लाल सिंह चड्ढा के आमिर खान अवार्ड विरोधी रहे हैं। अकादमी अवार्ड जीतने के अलावा फिल्म और भी कई अवार्ड के लिए ढेरों ढेर नॉमिनेशन में भी शामिल होती है जिनमें से कई अवार्ड  हासिल भी करती है।

अब देखना ये है कि ये रिलीज़ में रोड़े अटकाने वाले इस फिल्म के नॉमिनेशन और अवार्ड पर किस तरह के बवाल कर सकते हैं। क्योंकि यहां विरोध में नाक काट लेने की सज़ा अभिनेत्रियों के लिए रखी गई है।

फिल्म के बिज़नेस की बात करें तो विरोध करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि आमिर की फिल्म उनकी असहमति की मोहताज नहीं है। इसका अंदाज़ा दंगल मूवी के कलेक्शन को लेकर लगाया जा सकता है। दंगल मूवी की शक्ल में एक लोकल खेल को आमिर की प्रस्तुति वर्ल्डवाइड बना देती है। दंगल का वर्ल्डवाइड कलेक्शन 2 हज़ार करोड़ होता है जिसमे से एक हज़ार 300 करोड़ रक़म चाइना का दर्शक जुटाता है। लाल सिंह चड्ढा के ओटीटी राइट्स की नेटफ्लिक्स भारी क़ीमत पहले ही अदा कर चुका है। ये फिल्म समय लेगी। इसकी गूंज कहां तक जाएगी ये वक़्त बताएगा। मगर विरोध करने वालों को ये जान लेना ज़रूरी है कि फिल्म रिलीज़ से पहले ही अपनी लागत वसूल कर चुकी है। 

प्रीतम और अरिजीत सिंह सरल, सोंधा और ताज़गी भरा संगीत इसके जोड़ का है। सिनेमाटोग्राफी का कमाल दर्शक लम्बे अरसे तक याद रखेंगे। जिन बातों से ये फिल्म आने वाले समय में यादगार बनेगी उनमें एक कारण इसकी सिनेमाटोग्राफी को भी जाता है।

दोनों ही फिल्मों में नायक का किरदार उनके मुक़द्दर का मोहताज है। नायक पैदाइश से ही स्पेशल चाइल्ड है जिसे उसकी मां की तदबीर और उसकी तक़दीर अहम बनाती है। नायक की सादगी, नेकी और मासूमियत आज की दुनिया में उसे अंत तक बिलकुल वैसा ही बचाए रखती है और ये उसकी क़िस्मत का कमाल है।

लाल सिंह चड्ढा के हर पहलू पर बारीक निगाह रखने वाले आमिर डायलॉग डिलीवरी के मामले में चूक गए हैं और फारेस्ट गंप के टॉम हैंक्स से बहुत बहुत पीछे नज़र आते हैं। फारेस्ट गंप का गंप बेहद नम्र और थमे हुए अंदाज़ में एक बहाव के साथ अपने लफ्ज़ अदा करता है जबकि आमिर यहां मात खा जाते हैं। अच्छा होता कि पंजाबी जैसी मीठी ज़बान बोलने के लिए वह किसी और की मदद लेते। आमिर की डायलॉग डिलीवरी न सिर्फ भाषा के नर्म बहाव को ख़त्म कर देती है बल्कि उसकी चाशनी भी खो देती है।

पिछले तीन बरसों से ये फिल्म चर्चा का विषय बनी है। आमिर ख़ान आज उस स्टेज पर पहुंच चुके हैं जहाँ वह किसी सीमित काल या स्थान के लिए सिनेमा नहीं बनाते। ऐसे में चार बरस बाद आई लाल सिंह चड्ढा उनकी मेहनतों को साबित करती नज़र आती है। लाल जैसे एक स्पेशल चाइल्ड को नार्मल बनाने के लिए उसकी मां हर मुमकिन मेहनत और जतन करती है मगर आगे घटने वाली हर घटना उसकी तक़दीर की देन है। यही वजह है कि जंग के बीच रेस्क्यू के दौरान वह एक दुश्मन को लाने और उसे इंसान बनाने में कामयाब होता है। इस हद तक कि उसे इंसानियत के सबक़ की सीख लाल सिंह से मिलती है जिसको अपने जैसे गुमराह लोगों तक पहुंचाना वह अपना मक़सद बना लेता है। फिल्म ऐसे कई संदेशों से भरी हुई है जो कहानी की रवानी के साथ लाल की मासूम हरकतों की बदौलत बड़ी ही आहिस्तगी से अपना पैग़ाम देती जाती है। जिनमें महिलावाद भी है और कम्युनल दंगे भी। ग्लैमर भी है और महत्वाकांक्षा भी। इन सबके बावजूद लाल सिंह की मासूमियत ताउम्र वैसी ही बनी रहती है। एक आदमी के जीवन से जुड़ी तमाम घटनाओं के समानंतर चलने के बावजूद फिल्म कहनी भी इन्साफ की कचहरी नहीं लगाती। गुज़रते समय की हर घटना नायक की पाक मासूमियत को अनछुआ बनाए गुज़रती जाती है।

इस फिल्म में टॉम हैंक्स और आमिर खान ने जिस चीज़ को आत्मसात किया है वह है किरदार में पूरी ईमानदारी से उतर जाना और कैसे भी हालात में उसे बनाये रखना। क्योंकि फिल्म एक फ़िक्शन है और फिल्म की बैकग्राउंड एक हक़ीक़त। और इन दोनों का तालमेल अंत तक बनाये रखना ही टॉम और आमिर की खूबी है।

इस फिल्म के निर्माण के साथ सोचने वाली बात ये है कि एक ही समय काल में आमिर खान और कबीर खान अपने गुज़रे दौर के साथ अपने समय के दर्शकों को कनेक्ट करने का प्रयास करने की परिकल्पना करते हैं। जब कबीर खान फिल्म 83 के बहाने उस सुनहरे दौर को बड़ी ही ख़ूबसूरती से रिक्रिएट करने के प्रयास में जुटे होंगे उसी दौरान आमिर फॉरेस्ट गंप की मदद से अपने हमउम्र दर्शकों को लाल सिंह चड्ढा के साथ बीते समय की सैर कराने का ताना बाना बुनते हैं। बेशक ये दोनों बेमिसाल विषय चुनते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अपनी आत्मकथा में एक लेखक को सम्बोधित करते हुए रसूल हमज़तोव नसीहत करते हैं-

ये मत- ''कहो मुझे विषय दो।''

ये कहो- ''मुझे आंखें दो।''

इसलिए आमिर का विषय चयन इस फिल्म को बहुत ख़ास बनाता है। विवाद से परे हॉलीवुड और बॉलीवुड की सीमाओं के पार यह सिनेमा के संसार में मील का पत्थर है।

साभार: न्यूज़क्लिक

https://hindi.newsclick.in/Lal-Singh-Chaddha-Keep-this-innocent-character-away-from-riots-and-courtroom?fbclid=IwAR0FXjAhyHS0p9TF8VBklIIdhpg9ZJfnyCeTPTtRpJJCoFxlZySTdd1At-o

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

जद्दोजहद

 वाक़िया 1994 का है। इस साल हाजी आखिरी बार पानी के जहाज से बम्बई जद्दा बम्बई का सफ़र करने वाले थे। इत्तिफ़ाक़ कहें या ख़ुशकिस्मती, ये मौक़ा हमारे दादा अब्दुल हलीम ख़ान के भी हिस्से में आया। दादा अपनी दुनियावी ज़िम्मेदारियां पूरी कर चुके थे। कलमा, रोज़ा, नमाज़ और ज़कात को बड़ी ख़ामोशी से उन्होंने उम्र भर पाबन्दी के साथ पूरा किया था। इस आखिरी ज़िम्मेदारी को पूरा करने की हैसियत रखते थे तो वहां जाने की तैयारी भी पूरी की।

 लखनऊ से बम्बई तक का सफर ट्रेन से और आगे का सफर पानी के जहाज़ से होना था। बम्बई से जद्दा पहुंचने में तकरीबन दो हफ्ते लगा करते थे। सही तारीखें तो याद नहीं, न ही ये याद है कि तब कितने दिनों में वापसी होती थी मगर यह एक लम्बी ट्रिप हुआ करती थी। उन दिनों ज़िंदगी की हलचलें अखबार, रेडियो, दूरदर्शन, कैलेण्डर, रिस्टवॉच और डाकिया से जुड़ी रहती थीं। इसके अलावा घर में पांच डिजिट वाला लैंडलाइन फ़ोन भी हुआ करता था। क्योंकि उस वक़्त इसमें आईएसडी सहूलियत थी तो हम बच्चों की खुराफात से बचाने के लिए इसे एक लकड़ी के केस में ताला लगाकर रखा जाता था। फ़ोन आने पर इसका चोगा उठाने की सहूलियत हर किसी के लिए थी मगर डायल करने के लिए लेटरबॉक्स जैसे केस का छोटा सा ताला खोलना पड़ता था। फ़ोन पाबन्दी से आते थे और डाकिया भी। देर सवेर सभी की खैरियत भी मिल जाया करती थी।

 दादा घर ही नहीं पूरे खानदान में सबसे बड़े थे। ऐसे में मेल जोल का दायरा भी बहुत बड़ा हुआ करता था। वह दिन भी आया जब दादा बम्बई बंदरगाह से हज के लिए रवाना हुए। उनके इस सफर को हम सब अपनी ख़याली दुनिया में महसूस करते थे उसका ज़िक्र होता था। तट छोड़ने के बाद अगले कई दिनों के लिए खुद के पानी के हवाले कर देने का ज़िक्र। सुबह, दोपहर, शाम और रात के बदलते रंगों के साथ न थमने वाली पानी की लहरें। उम्र के मुताबिक़ ढेरो ढेर खयालात। जिसमे शार्क से लेकर समुद्री डाकुओं के भी कई किस्से सुने और दोहराये थे। कई ऐसे सवाल जिनका जवाब कभी मिल जाता और कभी खुद तलाश लेते।

 सब कुछ सुकून से गुज़र रहा था। हज की तारीखें आईं और इसी बीच पता चला कि हज के दिनों में मिना के इलाक़े में भगदड़ होती है। इस हादसे में 270 हाजियों की मौत की खबर आती है। फिर शुरू होता है रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त और तमाम मिलने वालों की आमद और फोन का न थमने वाला सिलसिला। बेचैन घर वालों के पास अख़बार, टेलीविज़न और फ़ोन को हसरत से देखने के सिवा कोई चारा नहीं था। दादा हैं तो खैरियत की खबर क्यों नहीं दे रहे और नहीं रहे तो कैसे खबर मिलेगी। इस इन्तिज़ार में अब डाकिया की आमद भी शामिल हो चुकी थी। घर वालों की तरफ से की जाने वाली सबसे हाई टेक कोशिश की बदौलत दूरदर्शन वाले टेलीविज़न को केबिल में अपग्रेड कर दिया गया। मगर इन्तिज़ार ख़त्म नहीं हो रहा था। दादा की कोई खबर नहीं मिली। टेलीविज़न और अखबार से ये जानकारिया आनी बंद हो गईं, फोन और डाकिया भी उनकी कोई खबर न दे सके। आपस में की जाने वाली सारी बातें ख़त्म हो चुकी थीं। इन्ही हालात में वापसी का दिन आया और दादा बख़ैरियत बम्बई के बंदरगाह पहुंचे। घर आने के लिए लखनऊ तक का ट्रेन का सफर भी पूरा हुआ।   

दादा मुखिया थे मगर ये शायद दादा की ज़िन्दगी का पहला मौक़ा रहा होगा जब उनसे सवाल किया गया था। "आपने अपनी खैरियत से बाख़बर क्यों नहीं किया?" इस पर दादा का जवाब था - "मैं भला अपनी खैरियत की इत्तिला क्यों देता? अव्वल तो मैं अल्लाह की राह में निकला था और मेरा कफ़न मेरे सामान में था। ये बात सभी के इल्म में थी कि इस सफर में मेरी मौत हो जाती है तो कोई बड़ी बात नहीं। और दूसरी बात कुछ होने की हालत में मेरी खबर देना सऊदी सरकार की ज़िम्मेदारी थी क्योंकि मैं उनका मेहमान था।'

 इस जवाब के बाद किसी और जिरह की कोई गुंजाईश ही नहीं बची थी। 28 बरस पुराने इस किस्से को याद करने की वजह भी बता दें। पिछले दिनों हज के दौरान आने वाली एक खबर का असर था कि दादा और उनका ये अंदाज़ याद आ गया। खबर के हवाले से जानकारी मिली कि हज के दिन मक्का में हाजियों ने मोबाइल कंपनियों के 3000 टेराबाइट डेटा का इस्तेमाल किया है।

 सऊदी अरब के टेलीकॉम रेग्युलेटर कम्युनिकेशन एंड टेक्नोलॉजी कमीशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यह डेटा लगभग 13 लाख घंटे एचडी क्वालिटी वाले वीडियो देखने के बराबर था।

 स्मार्ट फोन और सस्ते इंटरनेट पैकेज से लैस हाजियों ने काबा का (तवाफ़) चक्कर लगाने से लेकर मैदान अराफात और जमरात (मक्का के करीब मिना का सफर) तक के अपने विडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डायरेक्ट शेयर किये थे। कुछ अपने घरवालों और मां बाप को घर बैठे काबा की ज़ियारत कराइ थी।

 कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक हर दिन हर एक यूज़र ने 805 मेगाबाइट डेटा का इस्तेमाल किया था। यह गिनती दुनिया में औसत इंटरनेट डेटा के इस्तेमाल की 200 मेगाबाइट से तीन गुना से ज़्यादा थी। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप यूट्यूब, टिकटॉक, स्नैपचैट, फेसबुक और इंस्टाग्राम हैं।

 भीड़ पर नजर रखने और किसी भी तरह के हादसे से बचने के लिए सऊदी अधिकारियों ने इस बार बड़े पैमाने पर तकनीक का इस्तेमाल किया है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की विजन 2030 प्लान के तहत टेक्नोलॉजी के भरपूर इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसे प्लानिंग का हिस्सा बनाते हुए सऊदी अरब ने 2030 तक 50 लाख हज यात्रियों को खुशामदीद  कहने का इरादा बनाया है।

 टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल निगरानी और हिफाज़त तक तो समझ आता है मगर हर शख्स का अपने घरवालों को हज का लाइव टेलीकास्ट कराना कब से फ़र्ज़ बन गया। इंटरनेट की दुनिया के बादशाहों तक में हज के लाइव टेलीकास्ट के ये आंकड़े सनसनी बनकर पहुंचे होंगे। इस नए बाज़ार ने उनका ध्यान भी खींचा होगा और अब तक कई कैलकुलेशन के साथ बाज़ार नई तिकड़मों के साथ फॅमिली हज दर्शन के नए गैजेट को लाने के साथ उन्हें ज़रूरी बनाने की कवायद भी पूरी कर चुका। उस क़ौम के लिए जिसे जब तब ये याद आ जाता है कि किन किन इस्राइली सामानों का उन्हें बॉयकॉट कर देना चाहिए। जो कभी लाउडस्पीकर की मुखालिफत में फतवे दे दिया करती थी। टेक्नोलॉजी के रसियाओं की देन है कि आज मस्जिद में नमाज़ी हो या न हो मगर लाउडस्पीकर होना ज़रूरी है।

 खुमार वाली टेक्नोलॉजी और लाउडस्पीकर के शोर ने ये समझने की सलाहियत भी ख़त्म कर दी कि पिछले कई दशकों से इस क़ौम के नाम में लफ्ज़ जिहादी जुड़ चुका है। मगर अफ़सोस कि जिहाद की पहली पायदान अपनी ख्वाहिशों से जद्दोजहद को भी न ये समझ सके और न समझा सके। जिस क़ौम को दुनिया ने सबसे ऊंचे दर्जे का जिहादी बना दिया है आज वह उसकी पहली पायदान पर भी खड़े होने की हैसियटत नहीं रखती। 

बुधवार, 20 जुलाई 2022

शुक्र है कि विलियम वर्ड्सवर्थ कोई बिल्डर नहीं थे

नर्गिस उर्फ़ डेफोडिल के फूल! तुम वही हो न जिसके पुरखों ने ढाई सौ साल पहले, सात समंदर पार विलियम वर्ड्सवर्थ का मन मोह लिया था। शुक्र है कि विलियम वर्ड्सवर्थ कोई बिल्डर नहीं थे, नहीं तो उन वादियों में उन्हें झूमते हुए डेफोडिल्स न नज़र आते। शुक्र है रचियता ने वर्ड्सवर्थ को बनाते वक़्त उनके खमीर में कुदरत से इश्क़ का कुछ हिस्सा मिला दिया था, वरना न तो वह कभी खुद को आज़ाद बादल मानते और न हवाओं की लय पर तुम्हे झूमता हुआ महसूस कर पाते!


 प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथाओं में नर्गिस के फूल का ज़िक्र मिलता है। ये उस समय का किस्सा है जब चेहरा देखने के लिए आइना नहीं हुआ करता था। ज़ियुस आसमान का देवता था। उसे तमाम इंसानों और हुक्मरानों पर सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया था। इन सबकी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी भी ज़ियुस की ही थी। ज़ियुस को पेड़ और पानी बड़े ही खूबसूरत नज़र आते थे। इतने कि उन्हें इनसे मोहब्बत थी। मगर उनकी पत्नी हेरा को ज़ियुस की यह आदत बहुत नापसंद थी। यूनान के पुराने किस्सों में ये खुलासा मिलता है कि जब ज़ियुस एक खूबसूरत जंगल से गुजरता तो इको नाम की एक परी उसे घेर लेती और अपनी बातों में उलझा लिया करती। ज़ियुस को भी परियों के झुरमुट में बैठने में बड़ा मज़ा आता था।

 जल्दी ही हेरा को इस मामले की जानकारी हो गई। उसने इको को बद्दुआ दी, जिसके नतीजे में इको की प्यारी सी आवाज़ गूंज में बदल गई। फिर इको जंगल जंगल भटकती रहती और अपने दिल का सुकून तलाशा करती। इसी तलाश में उसे एक दिन जंगल में एक शहज़ादा नज़र आया। शहज़ादा नारसेसस (Narcissus) बेहद खूबसूरत था। इको उसके हुस्न पर मर मिटी। मगर शहज़ादा उससे लापरवाह रहा। अकसर वह इको को दुत्कार भी दिया करता था। दुखी इको इस बेरुखी को बर्दाश्त न कर सकी और अपने दर्द पर काबू पाने में नाकामयाब होकर उसने शहज़ादे को बद्दुआ दे डाली- ‘ईश्वर तुम्हे अपनी ही मोहब्बत में गिरफ्तार कर दे और तुम्हे खुद को पाने का कोई जरिया न मिले।‘

एक दिन नारसेसस नदी में झुका कुछ तलाश कर रहा था, तब उसने पानी में अपना अक्स देखा। वह खुद अपने हुस्न पर फ़िदा हो गया। इतना कि अपनी ही मोहब्बत में गिरफ्तार हो गया। अब खुद को निहारना ही उसे याद रहा। शहज़ादा पानी में अपना रूप निहारता और उसे चूमने के लिए और क़रीब जाने की कोशिश करता। खुद को चूम लेने की चाहत उसे पानी के करीब ले जाती तो वह पानी में गिर जाता। बेचैन शहज़ादा इसी कोशिश में लगा हुआ था। आस पास के पेड़, फूल, जंगल, खुशबु, हवा और पहाड़ इस मंज़र के गवाह थे। उन सबने देखा कि किस तरह खुद की चाहत में मजबूर शहज़ादा पानी में अपनी ही तलाश करता। खुद को चूमने की खातिर वो उसी जगह बैठा रह गया। इस चाहत में वह दुनिया से बेगाना हो गया और खुद को पाने के इन्तिज़ार में उसने दम तोड़ दिया। इसकी खबर इको को भी मिली। बेक़रार इको जब वहां पहुंची तो उसने पाया उस जगह पर नर्गिस का फूल खिला हुआ था।

वही नर्गिस का फूल जिसकी सुंदरता का बखान विलियम वर्ड्सवर्थ को 'द डेफोडिल' रचने पर मजबूर कर गया। एक ही नज़र में इन फूलों और उस घाटी में उन्होंने क्या कुछ नहीं देख डाला। खुद को एक टहलते बादल का टुकड़ा मान कभी वह इन फूलों को दस हज़ार महसूस करते और उसी पल इनका हवा में हिलकोरे खाता झुण्ड उन्हें किसी लहर की तरह नज़र आता। इसी बीच इन नन्हे नर्गिस को वह आसमान में टांके गए तारे जैसा पाते और यही फूल ख़ुशी के लम्हों में उनके साथ नाचते उनके ख्यालों का हिस्सा बने।

 शुक्र है कि विलियम वर्डस्वर्थ के पास स्मार्ट फोन नहीं था, नहीं तो दुनिया उनकी इस रचना से महरूम रह जाती। और शुक्र है कि विलियम वर्डस्वर्थ कोई बिल्डर नहीं थे। वरना उस घाटी में उन्हें नज़र आतीं गगनचुम्बी इमारतें, जिनमें लोगों को बसाने के लिए इन डेफोडिल्स की कब्र बनाने के सिवा कोई चारा ही नहीं था।

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...