शनिवार, 22 मई 2021

पेज की हदों से बाहर जाता भाईचारे की जीडीपी का ग्राफ

आरबीआई सरकार को 99,122 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में हस्तांतरित करेगा। ये रक़म खुद सरकार की उम्मीद से ज़्यादा है क्यूंकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इसके आधे की उम्मीद थी। 

ये तो एक बड़ी रक़म का मामला है और कुछ अख़बारों के ज़रिए ये खबर सामने भी आ गई है। क्या हम में से कोई उस रक़म का अंदाजा लगा सकता है जो इस महामारी के कारण सर्कुलेशन में है और जिसके ज़रिये भारतीय और एनआरआई किसी न किसी तरह मदद करने में जुटे हैं। 

इस बार 2020 की तुलना में महामारी का प्रकोप ज़्यादा है जबकि पिछले साल की जाने वाली मदद 2021 के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा रही। कोविड महामारी ऐसा मुद्दा था जहां लोग तमाम मतभेद भूलकर एक प्लेटफार्म पर आये और दिल खोल कर मदद भी की। इस मदद में खाना, दवा, ऑक्सीजन से लेकर मानसिक और शारीरिक श्रम भी जुड़ा है। करने वालों ने जीतोड़ मेहनत की है। इन हालात में जूझते हुए जब दवा, ऑक्सीजन और बेड जैसी सहूलियतें दिला पाना नामुमकिन रहा है। 

आर्थिक मदद की बात की जाए तो इस बार मदद का जज़्बा 2020 के मुकाबले कम ज़रूर है मगर आय या गर्त में डूबी जीडीपी की तुलना में इसे कहीं ज़्यादा माना जायेगा। हम में से हर शख्स एक बार अपने फ़ोन में मौजूद एक्टिविटी पर निगाह डालें तो पाते हैं कि ज़्यादातर लोग किसी न किसी ऐसे ग्रुप से जुड़े हैं जो महामारी के दौरान मदद के लिए कहीं न कहीं तत्पर है। इन ग्रुप की व्हाट्सएप्प, फेसबुक और ट्विटर पर पर भरमार है।  इसके अलावा कई नामचीन लोग जिनकी भारी भरकम फैन फॉलोइंग है वह भी अपने ज़रिये लोगों को सुविधा मुहैया कराते नज़र आये।  

अब एक बार मानसिक और शारीरिक श्रम को दरकिनार करते है और आते हैं आर्थिक मदद पर, तो खुद मेरा ताल्लुक़ कुछ ऐसे ग्रुप से रहा है जहाँ पर लोगों ने बड़े पैमाने पर मदद की है। ये वो मदद है जिसका न तो कोई रिकॉर्ड है और न ही रिवॉर्ड। जबकि मदद के विभिन्न आयामों के साथ अगर इन आर्थिक, मानसिक और शारीरिक सुविधाओं का कोई बार चार्ट बनाया जाये तो मुमकिन है कि इस बार की ऊँचाई उस ग्राफ पेज के बाहर चली जाए। 

इसे इस सरकार की खुशकिस्मती ही कहेंगे जिसके लिए इसके चाहने वालों के साथ इसके मुखालिफ भी एड़ी चोटी का ज़ोर लगाकर मदद करने में जुटे हैं, ये जानते हुए कि कल को अगर उनपर पड़ती है तो उन्हें गौ मूत्र भी नहीं मिलेगा। 

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Business Standard 
22 may 2021

https://www.business-standard.com/article/economy-policy/rbi-to-transfer-rs-99-122-cr-as-dividend-to-govt-changes-accounting-year-121052100624_1.html#:~:text=The%20transfer%20was%20approved%20on,in%20a%20statement%20on%20Friday.

बुधवार, 31 मार्च 2021

शहरे जानां

अपने शहर को देखने के लिए जब भी निगाह उठाई दिल की नज़र बाज़ी मार गयी। हम जब इन गली - कूचों में टहले, इसका हुस्न गर्दिश करता हुआ रग रग में दौड़ गया। अजब सा रिश्ता है इन गली - कूचों, इमारतों उन पर मंडराते बादलों यहां तक के उस मिट्टी से भी जिसकी आगोश ने पनाह दी।  

हर दिन फलता फूलता लखनऊ का नक़्शा इस बात का गवाह है कि जो भी यहां आया आबाद हो गया। यही तो है इस शहर की मोहब्बत की गिरफ्त। इन मोहब्बतों का ऐहवाल कोई उन दिलों से पूछे जिन्हे रोज़गार ने शहर बदर कर दिया है। जिस्म भले ही यहां से दूर हुए हों मगर ज़िक्र ने इसे दुनिया जहान की महफ़िलों में आबाद रखा है। 

हर दिन रफ़्तार की नई तेज़ी हासिल करती दुनिया में इन ठहरी इमारतों का दीदार वह सुकून दे जाता है कि बीमार दिल की बेक़रारी थम जाए, रूह को चैन मयस्सर आ जाए। यक़ीन न हो तो कभी ख़ामोशी से इन इमारतों को निहारिये, ये अपनी धड़कन का एहसास आप को खुद कर देंगीं। 

इस शहर ने यहां के हर बाशिंदे को हमेशा फख्र से सर उठाने का मौक़ा दिया है। इसकी तारीख़ में नवाबों के शाही क़िस्से भी हैं तो जंगे आज़ादी के रिस्ते ज़ख्म भी। तिजारत ने यहां बुलंदियां छुई हैं तो ताजिर हुनरमंदों को सर आंखों पर बैठाया है। यहां के ज़ायकों की खुशबू ने सारी दुनिया में लज़्ज़त का बोल बाला किया है तो क़लम ने सरहदों पार दाद बटोरी है। इस लबो लहजे ने यहां के बाशिंदों को सामने वाले के दिल में पनाह दी है। ये सब वही सरमाया है जो परदेस में बसे लखनऊ वाले के उस लम्हे को फख्र से नवाज़ देता है, जिस लम्हा वो अपना पता ये कहकर देता है - 'जी ! मेरा ताल्लुक़ लखनऊ से है।'  

एक नर्म  नाज़ुक से धड़कते दिल का मालिक ये शहर बड़ा ही सख्त जान है। दुनिया के उस हिस्से में इसका क़याम है जहां हर मौसम अपनी पूरी शिद्दत लेकर आता है। झुलसाती गर्मियां, रूह को ठिठुरा देने वाली सर्दियां और मूसलाधार बरसते कितने ही सावन आये और गुज़र गये। कितनी ही कड़कड़ाती बिजलियां और आंधी तूफ़ान यहां से रवाना हो गये। इन सबके दरमियान खिज़ा और बहारों का सिलसिला भी जारी रहा। 

हर सुबह निकलने वाले सूरज ने, हर रात घटते - बढ़ते चांद ने और हर बदलते मौसम ने इसके हुस्न को बदस्तूर पाया। इसलिए, इस शहर को आफरीन। 

(तस्वीर : सीमा सिंह) 

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

अन्नदाता हो, किसान रहो इंसान मत बनो!

वही हड्डियां जमा देने वाली पूस की रात थी। हल्कू समय के साथ चलने की खातिर प्रेमचंद की कहानी से निकला और सिंघु बॉर्डर पर जाने की तैयारी करने लगा। #Farmerprotest से बेखबर था वह। हल्कू के पहनावे ने रास्ते में ही उसके किसान होने की चुगली कर दी। न जाने कौन सा इलाक़ा था जब पुलिस ने उसे बुरी तरह खदेड़ा। जान बचाने के लिए किन-किन गाँवों की गलियों से होकर गुज़रा। घिसी चप्पल, फटे कपड़े और उखड़ती साँसों की धौंकनी के बीच उसने खुद को संभाला।

आँखें विकास की चकाचौंध से मिचमिचा रही थीं। चिरकुट से हल्कू ने जब सामने सभ्य मानव को देखा तो दहल गया। गरजती हुई आवाज़ ने हल्कू से पूछा - 'क्या आंदोलन में जा रहे हो?' हल्कू को हलक से शब्दों का गुज़र मुमकिन ही नहीं लगा। 

हल्कू की दहशत ने गरजती आवाज़ को और ख़ौफ़नाक बना दिया। 'जानते भी हो कौन लोग हैं वह? वह जींस पहनते हैं। पिज़्ज़ा खाते हैं। स्मार्ट फोन चलाते हैं। भरपूर जश्न मनाने के बाद आलीशान कैंप में आराम करते हैं। तुम तो किसान हो, जवाब दो! क्या किसान ऐसा होता है?'

जवाब के शब्द हल्कू की ज़ात में बचे ही नहीं थे मगर किसान की ऐसी कल्पना, जिसके कितने ही शब्द उसके कानों में पहली बार टकराये और सुन्न पड़ा दिमाग़ उन्हें समझ ही नहीं सका। 

समझ आया तो इतना - 'तुम तो किसान हो जवाब दो क्या किसान ऐसा होता है ?' इस सवाल को नरमी से पूछा गया था और इस नरमी ने हल्कू को इतनी हिम्मत दी कि उससे गर्दन को न की जुम्बिश दे सका।  

दहशत वाली आवाज़ और नरम पड़ी। 'वही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ "मित्र "। तुम किसान हो। अन्नदाता हो और वही बने रहो। किसान जब अन्नदाता है तो उसे इंसान बनने की क्या ज़रूरत?'

'ये सब इंसान बनने की कोशिश कर रहे हैं। इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा।' धीरे धीर हल्कू की समझ में इज़ाफ़ा होने लगा। अब वह स्थिर था। दहशत वाली आवाज़ की भी नरमी बढ़ चुकी थी। हल्कू के इस नन्हे से हौसले से दहशत वाली आवाज़ में अब नरमी के साथ उपदेशात्मक भाव दाखिल हो गया था। शिष्य बने हल्कू से उसने कहा -"खुद सोचो! जब मुर्ग़ी कभी अपने अंडे का दाम नहीं तय करती, बल्कि उसे तो ये भी नहीं पता कि इस अंडे को उबाला जायेगा, फ्राई किया जायेगा या बालों में लगाया जायेगा? बिलकुल वैसे ही जैसे मुर्ग़े और बकरे को नहीं मालुम की उनकी लागत क्या है? उनका सूप बनेगा या रोस्ट किये जायेंगे? कभी सोचा है जब एक मुर्ग़ी, एक मुर्ग़ा और एक बकरी, जानवर होकर एमएसपी की बात नहीं कर पाए तो तुम तो ठहरे अन्नदाता। क्यों तुच्छ मानव बनने की राह पर चल पड़े हो। 

हल्कू गहरी सोंच में पड़ गया। उसे याद आ गया कि वो किसान है। वही असली किसान जिसके पास तो कम्बल भी नहीं था। वह चुपचाप उठा और मुंशी जी की कहानी में वापस चला गया।


गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

Roses are red, Violets are blue


इश्क में सोहनी - महिवाल या लैला - मजनू हो जाना अलग बात है मगर एक मरे हुए आशिक़ के लिए रिया ने जो इम्तिहान दे दिया उसने भी इतिहास रच दिया है। उसे सुशांत से सोहनी या लैला वाला इश्क़ था या नहीं, पता नहीं मगर देश की तीन बड़ी एजेंसियों का इस जांच में शामिल होना, रिया को विषकन्या का खिताब दिया जाना और सोशल मीडिया जैसे सशक्त प्लेटफार्म पर उसको ज़लील करने के लिए एक से एक वाहियात हैश टैग चलाना। पुलिस, प्रशासन, सियासत, न्यायालय समेत देश की पूरी आबादी को इस मुद्दे के गड्ढे में ढकेलने की जी तोड़ कोशिशों के साथ हैवानियत का कोई करम न छोड़ना। मीडिआ का उसे गिद्धों की तरह नोचना और महीनाभर जेल की कोठरी में गुज़ारना। इश्क़ की ऐसी दलील शायद न तो इतिहास में होगी और न ही भविष्य में जल्दी नज़र आने के आसार हैं। सुशांत ने किन परिस्थितियों में खुदकुशी की किसी ने नहीं जानना चाहा मगर सबने ये देखा कि उस केस की भरपूर फ़ज़ीहत हुई और एक हालात के मारे इंसान की मौत पर हर किसी ने अपनी रोटी सेंकी। 

इतनी लागत ताक़त और मेहनत झोंककर अगर ख़ुदकुशी से जुड़े मामलों पर रिसर्चवर्क किया गया होता, ख़ुदकुशी से जुड़े आंकड़ों और ख़ुदकुशी करने वाले के हालात का जायज़ा लिया गया होता तो शायद आज बहुत कुछ ऐसा निकलकर आता जो इन मामलों की रोकथाम में सहायक होता। मगर ऐसा कुछ भी हाथ नहीं आया। और एक बार फिर से रिया चक्रवर्ती की हिम्मतों को सलाम जिसने एक जानलेवा जांच के बावजूद अपनी उस हिम्मत को बचाए रखा जिसके टूटने पर सुशांत या उनके जैसे लोग ख़ुदकुशी का रास्ता चुनते हैं। इतना तो कंगना रनौत को भी मान ही लेना चाहिए।   

#RheaChakraborty 

रविवार, 12 जुलाई 2020

हिम्मत की किताब में तजुर्बे का एक चैप्टर


आईआईसीयू की वो रात भी बहुत सुकून वाली थी जब जिस्म कई तरह के वायर से लैस था। सामने स्क्रीन पर चलता हुआ पारा क्या बता रहा था नहीं पता मगर उसका फुदकना याद है। बायां हाथ ब्लड प्रेशर के लिए बंधा था और दाहिने में ड्रिप के अलावा एक लिवर था जिसे कुछ वक़्त के बाद प्रेस करना होता था। नब्ज़ और धड़कन के सहारे मलकुल्मौत उर्फ़ यमराज के आने या ना आने का रुझान देखा जा रहा था। ...और इन सबके बावजूद भी गज़ब का सुकून था। इतना तय था कि या तो मरना है या जीना और जो होगा देखा जायेगा।

मगर आज का दिन जितना बेचैनी भरा था उसका बयान मुमकिन नहीं। चार महीने से लॉकडाउन ने कई आदतों को बदल दिया था। जब मार्च में पहली बार लॉकडाउन हुआ तो आस पास का पूरा एरिया सुनसान था, जो जहाँ था वहीँ फंसा रह गया था और महीनों फंसा रहा। अब जबकि अनलॉक के बाद फिर से दो दिन के लॉक डाउन की खबर आई तो काहिली और बेफ़िक्री अपने उरूज पर दिखी। आटे के कनस्तर में चोकर दिखाई दिया। बी पॉजिटिव रहने की कोशिश ने लापरवाही में इज़ाफ़ा किया था। पेट भरने का चावल और दालें देख तसल्ली हुई मगर सब्ज़ी वाले को फोन किया तो जवाब मिला -"सब्ज़ी मंडी में कोरोना का केस मिला है। अभी मंडी बंद है। इसलिए नहीं आ सकते।' रही सही कसर बिजली ने निकाल दी। आधे दिन तक तो आंख मिचौली का खेल चला मगर आधे दिन के बाद जो गायब हुई तो बिलकुल अच्छे दिन साबित हुई।

सूरज डूबते डूबते दिल का डूबना भी महसूस होने लगा था। सुकून के लिए फेसबुक पहले ही बंद कर चुके थे व्हाट्सएप्प पर आने वाली सच्ची और झूठी ख़बरें दहशत में ऐसा इज़ाफ़ा कर रही थीं अपने पैरों पर खड़ा होना मुश्किल महसूस हुआ। बिजली गए 5-6 घंटे हो चुके थे। पसीना इतना बहा चुके थे कि उसी को जमा करके छिड़काव करते तो कुछ बेहतर माहौल हो जाता। बारिश के बाद निकली धूप में उमस के नापने का कोई मीटर लगाते तो इसमें पापुलेशन घड़ी को पछाड़ने के पूरे तेवर मिलते।

सूरज डूबने के बाद ये एहसास मज़बूत होने लगा कि सुबह का सूरज देखना शायद नसीब न हो। आखिर वक़्त की रस्मों का सोचा तो वसीयत के लिए कोई रियासत थी नहीं और नसीहत भला किसे पसंद आती है। पिछले चार महीने में हिम्मत बटोरने की जितनी आदतें डालीं थीं वो सब साथ छोड़ गईं और डिप्रेशन का मीटर कोरोना पॉसिटिव केस की तरह बढ़ता महसूस हुआ। कोरोना के डिप्रेशन से मरना बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था।

घबराहट थोड़ी और बढ़ी और सब कुछ घूमता हुआ सा महसूस हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे उस चलती बस में सवार हैं जिसका ड्राइवर भाग गया है और इसके रुकने के साथ ही मेरी सांस और धड़कन भी थम जाएगी। अचानक फोन की घंटी बजी, दूसरी तरफ भावज थीं सोचा माफ़ी तलाफ़ी से पहले कैफियत बता दें। बात पूरी होने से पहले उसने कहा -'आपका बीपी बहुत पसीना बहने से लो हो गया है सबसे पहले नींबू की शिकंजी पियें। फ्रिज में एक नींबू मिल ही गया और शिकंजी के अलावा काफी सारा पानी पीने के बाद होश भी दुरुस्त हुए। 

चारों तरफ तैयार हुआ मौत का शिकंजा महज़ एक गिलास शिकंजी से धराशाई होने के साथ हिम्मत की किताब में तजुर्बे के एक और चैप्टर का इज़ाफ़ा कर गया था।


सोमवार, 22 जून 2020

बस तुम और सिर्फ तुम...


तुझ को देखा तो सेर-चश्म हुए 

तुझ को चाहा तो और चाह न की

जो कभी पैर में लिपट कर मेरे घुटने तक आते थे, आज हम उनके कंधे तक आ गए। इस तस्वीर को देखा तो गुज़रे वक़्त की रफ़्तार का एहसास हुआ।करीब 12 साल पहले मुम्बई की एक दोपहर। बड़ा अब्दुल रहमान और छोटा अब्दुल रहीम।

चेहरे की मासूमियत पर मत जाइयेगा। दोनों को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि छोटे में टशन कूट कूट कर भरी थी। इनकी आंखों में मासूमियत से ज़्यादा शरारत हमेशा पायी गई। इनका जिगरा भी हमेशा बड़े से बड़ा रहा। शरारत करनी है, तो करनी है और वो भी डंके की चोट पर। जब तक नासमझ थे तो बस ये ही ये थे। सामने वाले की उम्र, रुतबा, कद और वज़न कोई भी चीज़ इनके लिए बेमानी। बड़े में कुछ लिहाज़ रहा तो उन्होंने अपने शौक़ पूरे करने के लिए ख़ामोशी का रास्ता अपनाया। यक़ीन मानिए इनकी इस मासूम सूरत और खामोश फितरत ने एक वक़्त में मेरे अंदर छठा, सातवां, आठवां...न जाने कितने सेंस डेवलप कर दिए थे।


हमारे बचपन में परवरिश का फार्मूला होता था- 'बच्चे को खिलाओ सोने का निवाला और देखो शेर की नज़र से'। अपनी हैसियत के हिसाब से निवाले का इतिज़ाम करने के बाद मेरे लिए शेर का किरदार निभाया कपड़े टांगने वाले हैंगर ने। ज़रूरत पड़ने पर तबियत से चला। हम ज़रा पुरानी रवायतों वाले तौर तरीके पसंद करते हैं। भारी भरकम रिसर्च कभी समझ नही आई कि बच्चे को मारो मत उसकी साइकोलॉजी पर बुरा असर पड़ेगा। अपने पास इतना वक़्त नही था कि साइकोलॉजी समझते हुए आयुर्वेद और यूनानी वाला लंबा इलाज करते और माद्दा निकालते। हमें हमेशा से क्विक रिजल्ट वाला ऐलोपैथी ट्रीटमेंट समझ आया है। ये कारगर भी रहा और इसमें एक टिपिकल इन्डियन अम्मा होने का सुख भी मिला। इतना प्लान ज़रूर किया था कि किस उम्र से किस उम्र तक, कब कहाँ और कितना मारना है।

अब तक का सफर खैरियत और इज़्ज़त से गुज़र गया है। उम्मीद है आगे का भी गुज़र जायेगा। इनके आने वाले कल को लेकर अब इतने सवाल और बेचैनियां भी नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। अपनी ड्यूटी निभाने की प्रेक्टिस हो गई है। इन्हें भी अपने सवाल शेयर करने की आदत हो गई है। इनका एक सवाल आज भी महसूस करते हैं जो बचपन में एक बार इनकी ज़बान पर आया था- अम्मा! हम इतने बड़े कब हो जायेंगे कि लेट नाइट घर आ सकें?
...और मेरा जवाब था मेरी ज़िंदगी में ऐसा मुमकिन नहीं।


शुक्रवार, 5 जून 2020

ये मत कहियेगा कि इन बच्चों में तेवर नहीं




कार्टून की दुनिया के छोटा भीम की शादी छुटकी से न होकर ढोलकपुर की राजकुमारी इंदुमती से हो रही है। यह बात लोगों को पसंद नहीं आ रही है। इसी बात से नाराज होकर सोशल मीडिया पर यूजर्स मीम्स और ट्वीट पोस्ट कर रहे हैं। ट्विटर पर ये कैरेक्टर टॉप ट्रेंड में जगह बनाए हुए हैं। इन कैरेक्टर से जुड़े हैशटैग को ट्रेंड में देख कर लोग हैरान हैं। इन ट्वीट्स के जरिए कार्टून कैरेक्टर छुटकी को इंसाफ दिलाने की आवाज उठाई जा रही है।#JusticeForChutki जैसे ट्रेंड देखने को मिल रहे हैं। इससे पहले भी डोरेमोन में जब शिजुका की शादी डेकिसुगि से हुई थी तो भी काफी बच्चों को नागवार गुज़रा था। मगर छोटा भीम का मामला ट्विटर तक आ गया है। 




अब ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि इन आन्दोलनों में शामिल हों या ट्विटर छोड़ दें। पूरा लॉकडाउन रामायण और महाभारत की आसमान छूती TRP के बाद ये खबर पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा।

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...