बुधवार, 6 सितंबर 2023

IATA में कंट्री कोड IN और लखनऊ शहर LKO ही रहेगा

International Air Transport Association यानी IATA ग्लोबल एयरलाइन इंडस्ट्री है। IATA की स्थापना 19 अप्रैल 1945 को हवाना, क्यूबा में हुई थी। इस समय इसका मुख्यालय मॉनट्रियल, कनाडा में है। यह दुनिया के हवाई यात्रियों के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय और किफायती सेवाएं मुहैया कराती है। दुनियाभर की 240 एयरलाइन इसकी सदस्य्ता में जबकि मुल्कों की गिनती 195 है।

IATA ने दुनियाभर में 120 देशों को सुविधा प्रदान करने के लिए 50 से अधिक कार्यालय खोल रखे हैं, जो लगभग 120 देशों को सुविधा प्रदान करते हैं। संगठन की वेबसाइट के मुताबिक़ वर्तमान में दुनिया भर में 11,000 से अधिक एयरपोर्ट कोड हैं जिन्हे शहर कह सकते हैं।

IATA दुनिया के हर देश को 2 अक्षर का कोड अलॉट करता है और शहर के लिए 3 अक्षर का। मसलन INDIA वहां पर IN नाम से दर्ज है और हमेशा इसी नाम से रहेगा। BH नाम बहरीन को आवंटित किया जा चुका है। अगर शहरों की बात करें तो मुंबई के लिए सारी दुनिया में इंटरनेशनल ट्रेवल कोड BOM था और 1995 में इसे मुंबई किये जाने के बाद भी IATA की लिस्ट में इसका कोड नहीं बदला। इसी तरह मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई हुआ मगर इसका IATA कोड आज भी MAA ही है।
यहां एक और ख़ास बात बता दें। सारी दुनिया में लखनऊ नाम के 7 शहर हैं, जिनमे 3 लखनऊ अमरीका में, 2 ऑस्ट्रेलिया में, एक कनाडा में और एक लखनऊ हिंदुस्तान या भारत या कह सकते हैं कि इंडिया में हैं। मगर क़ाबिल ए फख्र बात ये है कि IATA ने इंडिया के लखनऊ को LKO कोड अलॉट किया है और हमेशा यही रहेगा।

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

सिस्टर बानो

 बात साल 2000 की है। हमें हिन्दुस्तान अखबार में काम करने का मौक़ा मिला। उन दिनों ख़बरों को तलाशना और लिखना सीख रहे थे। मेरी बीट मेडिकल थी। कजीएमयू उस ज़माने में यूनिवर्सिटी नहीं बना था और केजीएमसी के नाम से जाना जाता था। यहां क्वीन मेरी हॉस्पिटल का एक वार्ड है एनएनयू। ये बिलकुल छोटे बच्चों का वार्ड था। पैदाइश के बाद अगर किसी बच्चे को कोई कॉम्प्लिकेशन होता तो कुछ देर के लिए यहां रखते और रिपोर्ट्स नार्मल मिलने पर बच्चे को मां के पास बेड पर शिफ्ट कर दिया जाता। कोई मसला होने पर बच्चा पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट रिफर कर दिया जाता था।


किसी ख़ास खबर की तलाश में उस दिन एनएनयू की तरफ आना हुआ। वार्ड से पहले सिस्टर्स का कमरा था। कमरे में सिस्टर बानो और सिस्टर मेहदी के अलावा भी कोई और था। सरकारी अस्पताल का सफ़ेद लोहे का झूला और उसमे एक नन्ही, प्यारी सी बच्ची। सिस्टर के रूम में झूला और बच्ची को देखकर लगा कि शायद यहां के किसी स्टाफ का है। सिस्टर बानो इस बच्ची को कटोरी चम्मच की मदद से दूध पिलाने की कोशिश कर रही थीं और सिस्टर मेहदी इस काम में उनकी मदद।

सिस्टर बानो के नाम से मशहूर इंचार्ज का पूरा नाम अर्जुमंद बानो था और सुबह आठ बजे से दोपहर दो बजे तक की अपनी ड्यूटी में उनके डिपार्टमेंट का निज़ाम वैसा ही दुरुस्त रहता था, जैसा ब्रिटिश हुकूमत के दौर का सुना है।

बच्ची के बारे में पूछने पर जो किस्सा सामने आया उसके मुताबिक़ ये बच्ची अपने मां -बाप की लगातार चौथी बेटी बनकर उनके परिवार में आई थी। भर्ती के वक़्त बच्ची के बाप ने पते में मलिहाबाद का जो ठिकाना बताया था वह फ़र्ज़ी निकला। पैदाइश के बाद बड़ी ही ख़ामोशी से ये मां बाप बच्ची को अस्पताल के बेड पर अकेला छोड़ कर ऐसा गए कि फिर किसी ने उन्हें नहीं देखा। ग़ुरबत में चौथी बेटी को छोड़ने का फैसला मां- बाप दोनों का था या किसी एक का, यह भी कोई नहीं जान सका।

उस दिन के बाद से यह बच्ची एनएनयू वार्ड में सिस्टर बानो की सरपरस्ती में पल रही थी। सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे सिस्टर बानो इसका ख्याल रखती और बाक़ी दिन की ज़िम्मेदारी बदलती शिफ्ट के साथ बदलती रहती। तमाम नर्सें, आया और डॉक्टर आते जाते इसे खिलाते। हर कोई इसे हाथों हाथ लिये था। कुछ नाम भी रखा था जो अब हमें याद नहीं।

मेरे लिए ये एक ख़ास खबर थी। फ्रंट पेज पर बाईलाइन। उस वक़्त डाक्टर पुष्पा महाजन बतौर हेड वहां की ज़िम्मेदारी संभाले थीं। उनसे भी बात हुई थी और खबर में उनका स्टेटमेंट भी था। खबर छपने के साथ ही बच्ची को गोद लेने वालों का हुजूम लग गया। क़ानूनी खानापूरी के बाद जल्दी ही बच्ची को नए मां बाप मिल गए। आज वह बच्ची 23 बरस की होगी। अपने मौजूदा मां-बाप को ही शायद असली समझती हो या मुमकिन है उसे हक़ीक़त पता हो। मगर उसे यह नहीं पता होगा कि जिस सिस्टर बानो ने एक महीने अपनी सरपरस्ती में उसकी परवरिश की, वह कल इस दुनिया से चली गईं।

एक खबर की तलाश में हम सिस्टर बानो की इस खूबी को जान सके। ना जाने उनकी ज़िंदगी में नेकी भरे कितने और ऐसे किस्से होंगे जो आज उनके साथ दफन हो गए। हम खुद को इस किस्से का ज़िक्र करने से न रोक सके।

सिस्टर इंचार्ज अर्जुमंद बानो ने इस अस्पताल को 35-40 बरस दिए। अपनी ड्यूटी के वक़्त उनकी मुस्तैदी और कड़क अंदाज़ की बदौलत निज़ाम का दुरुस्त रहना लाज़िमी था। ऐसा सरकारी अस्पताल जहां मरीज़ों की तादाद सहूलियतों से कई गुना ज़्यादा होती है, वहां मोर्चा संभालना आसान नहीं था। सिस्टर बानो की सलाहियतों की बदौलत अस्पताल ने उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी न छोड़ने का फैसला किया। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने दुबारा मोर्चा संभाला और इस बार उनकी ड्यूटी ट्रामा सेंटर जैसी जगह पर रही। कोविड के दिनों में भी सिस्टर बानो ने अपना फ़र्ज़ पूरा किया। मेरी फ़ोन लिस्ट में आज भी उनका नाम corona योद्धा के नाम से महफूज़ है।


बुधवार, 26 जुलाई 2023

सुनील दुबे- कुसुमादपि कोमल, वज्रादपि कठोर

वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार और अपने समय के महत्वपूर्ण संपादक सुनील दुबे के कुछ साथी पत्रकारों के निजी संस्मरणों पर आधारित पुस्तक सुनील दुबे- कुसुमादपि कोमल, वज्रादपि कठोर का लोकार्पण समारोह 23 जुलाई 2023 को हुआ। 

समारोह में उनकी शख्सियत की खूबियों पर बेशुमार बातें सामने आईं। हिन्दुस्तान में मेरा बहुत छोटा सा वक़्त बहुत छोटी सी पोस्ट पर गुज़रा है। मगर सुनील दुबे सर की एक ख़ास बात आज भी ज़ेहन में है। गुस्से के लिए मशहूर दुबे सर अकसर मुस्कुराहट से ऐसा काम निकाल लेते थे कि अलफ़ाज़ को ज़हमत न देनी पड़े। वह भी पान की लाली में रची मुस्कराहट के साथ। ये सधी मुस्कुराहट इतनी सौम्य होती थी कि लगया था जैसे रामराज कहीं आस पास ही है। 

'सुनील दुबे- कुसुमादपि कोमल, वज्रादपि कठोर' का कवर पेज ख़ास तारीफ का हक़दार है। इस किताब में 31 पत्रकारों ने उनके संपादन काल के अपने तमाम खट्टे मीठे  अनुभवों का ज़िक्र किया है। दिनेश पाठक जी के सम्पादन में अविनाश जी और ग्रे पैरट पब्लिशर्स की बदौलत ये किताब सामने आई है। 


अभी थोड़ी ही किताब पढ़ी है। पढ़ने से पहले ही किताब की सबसे दिलकश खूबी उसके कवर पेज पर नज़र आती है। सुनील सर की शख्सियत की खूबियों में से एक उनकी मुस्कान को सुपरलेटिव डिग्री वाली तस्वीर से कवर पेज बनाने के लिए राजीव तिवारी जी का शुक्रिया।

शुक्रवार, 9 जून 2023

पहनावे में उलझे महिला मुद्दों को शायद नए चश्मे की ज़रूरत है

फर्स्ट लेडी होने के बावजूद फोटोग्राफर की नज़र में हिलेरी क्लिंटन महज़ एक महिला से ज़्यादा नहीं। जहां कैमरामैन की कोशिश फोटोग्राफी के उन एंगिल को तलाश लेती है जिससे तंग आकर हिलेरी क्लिंटन के लिए पैंट पहनना मजबूरी बन जाता है। महिला पहनावे के ठेकेदारों से की जाने वाली इस जंग में उनकी तरक्की के कई ऐसे रास्ते बंद हो जाते हैं जिन पर सोचने और बोलने का नंबर ही नहीं आ पाता। क्या अब इस मोर्चे पर नए सिरे से सोचने और अमल करने का समय है?


ये बात ज़्यादा पुरानी नहीं है। मार्च 2019 में अमरीका अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक नया इतिहास रचने की योजना बना रहा था। नासा ने दो महिलाओं की स्पेसवॉक का इरादा किया। 25 मार्च को की जाने वाली ये यात्रा महज़ इसलिए अमल में नहीं सकी क्योंकि एजेंसी के पास ऐन मैकलीन और क्रिस्टीना कॉक के आकार के स्पेससूट अंतरिक्ष स्टेशन पर नहीं थे। ...और इस तरह पृथ्वी से चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर एक ऐतिहासिक घटना दर्ज होने से रह गई। 

स्पेसवॉक पर जाने के लिए महिलाओं की पोशाक की कमी उनके सफऱ का रोड़ा बन गई। मगर दुनिया में इन्ही कपड़ों की बात करें तो हम पाते हैं कि यूरोप और ब्रिटेन जैसी आज़ाद और विकसित जगहों पर आज भी महिलाओं की पोशाक से जुड़ा उत्पीड़न कामयाबी के हर सफ़र को कई क़दम पीछे धकेल देता है।

 भारत में पिछले दिनों राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े सामने आये तो बताने और छुपाने वाली मीडिया ने रच रच कर हेडलाइन बनाई और एक से एक एंगिल तराश कर ख़बरें पेश की। इस तरह से एक सालाना ख़ानापूरी की रस्म अदायगी हो गई। अब इन आंकड़ों को सहेजकर कई बहसों, चर्चाओं और गोष्ठियों का कच्चामाल बन जायेगा और एक और ख़ानापूरी अंजाम को पहुंचने लगेगी। इन सबके बीच स्पेसस्टेशन पर स्पेससूट की कमी जैसी बात का दरकिनार होना लाज़िमी है। 

पूर्व राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने अपने पहनावे पर दुनिया के नज़रिए को लेकर जो खुलासा किया है वह हैरान करने वाला है। अमेरिका के 42वें प्रेजिडेंट की पत्नी की हैसियत से हिलेरी 1995 में ब्राजील की राजकीय यात्रा पर थीं। वह बताती हैं कि इस सफर के दौरान उन्हें जो तजुर्बा हुआ उसके नतीजे में उस दिन के बाद से उन्होंने स्कर्ट के बजाय पैंटसूट पहनना शुरू कर दिया था।  

पूर्व राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन बताती हैं कि इस ब्राजील यात्रा के दौरान उन्होंने क्रीम कलर की स्कर्ट पहन रखी थी। इस बीच मौजूद फोटोग्राफरों ने नीचे से उनकी तस्वीरें लीं। सीबीएस संडे मॉर्निंग की होस्ट नोरा 'डॉनेल से जारी बातचीत में हिलेरी कहती है- 'मैं सोफे पर बैठी थी और मीडिया को अंदर आने की इजाज़त दे दी गई। उनकी एक टीम तस्वीरें ले रही थी। 

जानकारी के मुताबिक़ इस दौरे की कुछ ऐसी तस्वीरें जिसमे कथित तौर पर उनका अंडरवियर दिखाई दे रहा था, बाद में ब्राज़ील की एक अंडरवियर बनाने वाली कंपनी द्वारा अपने विज्ञापन के लिए इस्तेमाल की गई। 

हिलेरी क्लिंटन आगे बताती हैं- 'अचानक व्हाइट हाउस को इन होर्डिंग्स के बारे में जानकारी मिलनी शुरू हो गई, जो मुझे बैठा हुआ देख रहे थे। मुझे लगा था कि मेरे पैर जुड़े हुए हैं लेकिन जिस तरह से तस्वीरें बनाई गईं थीं उसमे कुछ नज़र रहा था। और तब से मैंने हर समय फ़ोटोग्राफ़रों की मौजूदगी का भी ख़्याल रखना शुरू कर दिया।' हिलेरी क्लिंटन अपनी जारी रखते हुए कहती हैं- 'मैं स्टेज पर होती थी, सीढ़ियां चढ़ रही होती थी और वह नीचे होते थे। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकती थी इसलिए मैंने पैंट पहनना शुरू कर दिया।  

फ़्रांस में तकरीबन दो बरस पहले 22 वर्षीय एलिज़ाबेथ पर स्ट्रासबर्ग शहर में दिन के उजाले में हमला किया गया था। महिला ने फ़्रांस ब्लू अलसैस रेडियो को बताया कि जब वह घर जा रही थी, तो तीन लोगों में से एक ने कहा- ‘उस स्कर्ट वाली वेश्या को देखो।‘ फ्रांसीसी पुलिस ने शिकायत के बाद जांच शुरू की तो पाया कि तीन पुरुषों ने स्कर्ट पहनने के कारण उसके चेहरे पर मुक्का मारा। तीन में से दो लोगों ने उसे जकड़ा और तीसरे ने उसके चेहरे पर घूंसा मारा। इस पिटाई से उसकी आंख काली हो गई थी। वह बताती हैं कि एक दर्जन से अधिक लोग हमले को देख रहे थे लेकिन किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। इस हमले की सजा के तौर पर मुजरिम को दो महीने की जेल की सजा दी गई थी। अपनी सफाई में इस शख्स का कहना था कि महिलाओं में से एक ने अनुचित कपड़े पहने हुए थे, इसलिए उसने उसे जमीन पर धकेल दिया।

फ़रवरी 2019 में इंडिपेंडेंट की ओर से लंदन में एक अध्यन किया गया। इसमें रेप और शॉर्ट ड्रेस के मुद्दे पर 1104 वयस्कों से बातचीत की गई। सवालों के जवाब देने वाले ये लोग ब्रिटिश नागरिक थे। इस अध्ययन के अनुसार बड़ी संख्या में पुरुषों का मानना है कि अनुचित या अपर्याप्त कपड़े महिलाओं के बलात्कार का कारण बनते हैं। इन लोगों के अनुसार जो महिलाएं खुले कपड़े पहनती हैं, उनमें यौन उत्पीड़न का खतरा अधिक होता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार 55 प्रतिशत पुरुषों का मानना है कि एक महिला के कपड़े जितने छोटे होंगे, उसके यौन उत्पीड़न की संभावना उतनी ही अधिक होगी। इस शोध से यह भी पता चला कि पुरुष इस विचार को महिलाओं की तुलना में अधिक बढ़ावा देते हैं। इस मत के समर्थन में बोलने वाली महिलाओं की संख्या 41 प्रतिशत थी। 

इस सम्बन्ध में डबलिंग रेप क्राइसिस सेंटर की ओर दिया गया वक्तव्य पुरुष मानसिकता का ख़ुलासा करता है। उनके मुताबिक़ शोध इस बात पर प्रकाश डालता है कि किस तरह ज़्यादती का शिकार होने वाली महिलाओं को इस समाज में निशाना बनाया जाता है और सारा इलज़ाम भी उन्ही पर लगाया जाता है।

संगठन प्रमुख न्यूलिन ब्लैकवेल के अनुसार यह सिर्फ़ एक वाहियात और अपरिपक्व विचार है और इस बात का कोई व्यहवारिक प्रमाण नहीं है कि महिलाओं के कपड़ों का सम्बन्ध उनके बलात्कार के रुझान से जुड़ा हो। 'हम जानते हैं कि बलात्कार का शिकार होने वाली औरतों के कपड़े हमेशा एक जैसे नहीं होते हैं। यह विचार कि ढेर सारे कपड़ों में लिपटी औरतों का यौन उत्पीड़न नहीं किया जाएगा, एक सदियों पुराना फ़लसफ़ा है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला रहा है। महिलाएं जब ज़्यादती का शिकार होती हैं तो उनमे से बहुत सी ऐसी थीं जिन्होंने जींस पहनी हुई थी, या वह अपने स्कूल यूनिफॉर्म में थीं। यहां तक कि वह अपने सोने के कपड़ों में थीं।'

आगे उन्होंने आगे कहा- 'हम उस महिला को दोष देते हैं जो रेप की शिकार हुई है। हम उनसे कहते हैं कि अगर आप ऐसा कुछ कर लेतीं तो बच सकती थीं। अगर आपने ऐसा कुछ किया होता तो शायद ऐसा नहीं होता। यह अनादि काल से होता रहा है, जैसा कि बाइबल में आदम ने परमेश्वर से कहा- स्त्री ने मुझे उकसाया'

 क्राइसेज़ सेंटर के मुताबिक़, बलात्कार शक्तिशाली द्वारा ज़बर्दस्ती और वर्चस्व का कार्य है। इसमें किसी भी पीड़ित की खूबसूरती या उसके कपड़े बहुत कम अहमियत रखते हैं। आंकड़ों के अनुसार जिन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया उनमें से 45 फ़ीसद मुजरिम उन महिलाओं के क़रीबी थे या किसी समय में उनके दोस्त रह चुके थे।
यूके के सरकारी आंकड़ों के अनुसार 38 फ़ीसद मामलों में अपराधी परिवार के सदस्य थे और केवल 13 फ़ीसद ऐसी महिलाएं थीं जो बलात्कारी की पहचान नहीं कर सकीं और मामला अजनबी रेपिस्ट के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया।

डरहम यूनिवर्सिटी की डॉ. हाना बाउज़ के मुताबिक यह बेहद निराशाजनक स्थिति है। इसके बारे में जागरूकता फैलाने के तमाम अभियानों के बावजूद सब कुछ ठीक वैसा ही है जैसा सदियों से चला रहा है। अपनी बात में वह कहती हैं- 'मैं बहुत परेशान हूं कि हमने इस मुद्दे पर ज़्यादा तरक़्क़ी नहीं की है। समाज में हमेशा एक ऐसा निश्चित वर्ग होता है जिसे आमतौर पर स्थिति की उचित समझ नहीं होती है। लेकिन मुझे उम्मीद थी कि अब तक स्थिति में काफ़ी सुधार हो गया होगा। यह स्टडी हमारी धारणाओं में एक बहुत ही बुनियादी ग़लती की तरफ इशारा करती है। यह जैविक प्रवृत्ति (Biological instinct) का मामला नहीं है। यह एक बहुत ही बुनियादी समस्या है जिसमें सारा इलज़ाम ज़्यादती का शिकार होने वाली महिलाओं पर मढ़ दिया जाता है। हालांकि, उनमें से अधिकांश अपने घरों के अंदर सुरक्षित माहौल में ज़्यादती का शिकार होती हैं। आपने क्या पहना हैइस बात से रेप करने वाले का कोई लेना-देना नहीं होता है।

शकीला फोर्ब्स बेल फैशन की दुनिया का बुलंदी छूने वाला नाम है। शकीला पहली अश्वेत महिला हैं जिसने लन्दन की यूनिवर्सिटी से फ़ैशन साइकोलॉजी की पढ़ाई की है और लंदन कॉलेज ऑफ फ़ैशन से एमए किया है। पढ़ाई के अंतिम वर्ष में उनका शोध का विषय था 'वस्त्र और जातिवाद' था, जिसमें उनका विषय था कि अमरीकी नीग्रो ट्रायवन मार्टिन की हुडी ने क्रूर हत्या में किस तरह भूमिका निभाई। वह फ़ैशन और मनोविज्ञान दोनों की छात्रा थी और अब अपनी वेबसाइट, फ़ैशन इज साइकोलॉजी के माध्यम से दोनों को एक साथ लाती है, जो फ़ैशन पर अतिथि लेखकों को पेश करती है और हमारे दैनिक जीवन में जटिल वैज्ञानिक सिद्धांतों को लागू करती है। वह उपभोक्ता व्यवहार और प्रेरणा की पहचान करने के लिए दुनिया की मशहूर कंपनियों के साथ भी काम करती है।

ये विकसित देशों का हाल है तो विकासशील देशों का अंदाजा लगाया जा सकता है। शायद इन मुद्दों को नए सिरे से देखे, समझे और उन पर अमल किये जाने की ज़रूरत है। इन बातों पर ग़ौर करने पर हम पाते हैं कि क्रिमिनल और क्राइम अगर बरक़रार है तो उससे मुक़ाबले के जवाबी हथकंडे भी हर दिन तैयार हो ही रहे हैं। जिसमे प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका के अलावा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी शामिल है। इतनी संस्थाओं सहित निजी एनजीओ और तमाम व्यवस्थाओं के बाद भी अगर हम अभी तक महिला सुरक्षा की नीव ही मज़बूत कर रहे हैं तो इसकी इमारत पर काम कब करेंगे। और इस बीच जाने कितनी अंतरिक्ष तक पहुंच पाने वाली यात्राओं का खामियाज़ा भुगतेंगे

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...