शनिवार, 24 मई 2025

हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद

 साहित्य अकादमी का नय्यर मसूद पर पब्लिश मोनोग्राफ ‘हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद’  पढ़ना अच्छा लगा। 'शहर--अदब' और 'शहर--सुख़न' जैसे हवालों पर ज़माने की जो गर्द गई है, उसे इस तहरीर ने जैसे साफ कर दिया। हर पलटते पन्ने के साथ नय्यर मसूद की शख्सियत नुमाया होती गई और इस बात का एहसास भी बढ़ता गया कि इस मोनोग्राफ की बदौलत अदब और सुखन से इस शहर के रिश्ते में एक मज़बूत गिरह लगाने वाले का शुक्रिया अदा करना चाहिए।

इस मोनोग्राफ को लिखने के लिए अगर महज़ एक फ़ोन की मदद लेकर शोएब साहब का शुक्रिया अदा किया जाए तो यह ज़्यादती होगी। और तब इरादा किया कि जिस शख्स ने यह काम किया है, उससे फोन पर इतनी बात-चीत तो कर ही लें कि कुछ लिखा जा सके।

शोएब साहब यानी शोएब निज़ाम रिटायर प्रिंसिपल रहे हैं। मेरे बुज़ुर्ग दोस्त हैं और अदब के उन जानकारों में से हैं जिनके पास मुल्क नहीं दुनियाभर के अदब और अदीबों से जुड़ी ढेरो-ढेर जानकारियां है। उनकी मालूमात का हवाला हम क्या देंगे जिनका चुनाव खुद साहित्य अकादमी ने किया हो। लेकिन शोएब निज़ाम से पहले नय्यर मसूद को समझना ज़्यादा ज़रूरी है।

साहित्य अकादमी ने अगर नय्यर मसूद साहब के नाम का इंतिखाब किया तो यक़ीनन उनकी खूबियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बीसवीं सदी की तीसरी दहाई में पैदा हुए नय्यर मसूद का घराना ईरान से ताल्लुक रखता है। इनका खानदानी पेशा हकीमी था मगर वालिद इन्हें एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में भेजना चाहते थे और उस वक्त की मुनासिबत से तय हुआ कि इन्हें फारसी पढ़ाई जाए। मगर नय्यर मसूद लखनऊ यूनिवर्सिटी में फ़ारसी के प्रोफेसर बने।

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के दौरान नय्यर मसूद की दोस्ती शम्सुर्रहमान फारूकी से हुई। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से 1964 में उन्होंने रजब अली बेग सुरूर और उनके कलमी आसार' पर अपनी पीएचडी मुकम्मल की। कुछ दिन शहर बरेली में बतौर उस्ताद पढ़ाने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी में फारसी के लेक्चरर हो गए। अफ़सानानिगारी के अलावा तनक़ीद (आलोचना), अनुवाद जिनमें काफ्का की कहानियां, बोर्खेस की नज्मों अलावा भी बहुत कुछ लिखने वाले नय्यर मसूद ने बच्चों के लिए भी लिखा है।  

नय्यर मसूद न सिर्फ एशिया बल्कि पूरी दुनिया के कुछ खास फ़ारसी दानिश्वरों में से हैं। वह ज़माने के जदीद (आधुनिक) उर्दू के अफसानानिगार होने के साथ आला दर्जे के मुतर्जिम (अनुवादक) भी हैं। नय्यर मसूद की कहानियों में वजूदियत (अस्तित्ववाद) के अलावा जादुई हक़ीक़त पसंदी और तहज़ीब का असर साफ झलकता है। नय्यर मसूद काफ्का, कैमियो, पिंचन, एडगर एलन पो, ब्रैंट और दोस्तोवस्की से मुतास्सिर थे।

अदब की खिदमत के लिए नय्यर मसूद को जिन अवॉर्ड से नवाजा गया है उनमें साहित्य अकादमी और सरस्वती सम्मान (ताऊस चमन की मैना, 2007), कथा अवॉर्ड (1992_93), उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवॉर्ड, राष्ट्रपति सम्मान ओर ग़ालिब अवॉर्ड के अलावा भी तमाम नाम शामिल हैं।

 साहित्य अकादमी के लिखे इन मोनोग्राफ का मक़सद होता है कि हिन्दुस्तान की एक ज़बान की अदबी हस्ती के कारनामों से बाक़ी ज़बानों के लोग भी वाक़िफ़ हों। भारत की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी देश में अदब को बढ़ावा देने वाली ऐसी केंद्रीय संस्था है 24 भारतीय ज़बानों में अदबी सरगर्मियां करती है।

हालांकि शोएब साहब बड़ी ही बेतकल्लुफी से इस बात का ज़िक्र करते हैं कि जब पिछले बरस साहित्य अकादमी ने ये तय किया कि नय्यर मसूद पर मोनोग्राफ लिखा जाएगा, तो उस वक़्त पद्म श्री से नवाज़े गए शीन क़ाफ़ निज़ाम को भी यही लगा कि इस काम के लिए सबसे मुनासिब नाम शोएब निज़ाम का ही हो सकता है। 

अक्टूबर या नवम्बर 2024 में साहित्य अकादमी के उर्दू विभाग से शीन क़ाफ़ निज़ाम उर्फ़ शिव किशन बिस्सा ने शोएब निज़ाम से कहा कि वह नय्यर मसूद साहब पर उर्दू में एक मोनोग्राफ लिखें जो साहित्य अकादमी के लिए होगा। शीन क़ाफ़ निज़ाम ने उन्हें इस लिए चुना था क्योंकि शोएब निज़ाम, नय्यर मसूद के ख़ास शागिर्द होने के साथ-साथ उन पर कई आर्टिकल लिख चुके थे।

इस फरमाइश के जवाब में शोएब निज़ाम ने अनीस अशफ़ाक़ के नाम की पैरवी यह सोचकर की कि वह इसे ज़्यादा बेहतर कर सकेंगे। शीन क़ाफ़ निज़ाम ने जब अनीस अशफ़ाक़ से राब्ता किया तो इत्तिफ़ाक़ से उन दिनों उनकी सेहत ठीक नहीं थी और वह किसी और काम में ऐसे उलझे हुए थे कि कि इस मोनोग्राफ के लिए शोएब निज़ाम को खुद से ज़्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देने वाला बताया। इस तरह शोएब निज़ाम का नाम इस काम के लिए तय हो गया।

शोएब निजाम की अलीगढ़ से मोहब्बत ने इस मोनोग्राफ के मुकम्मल होने में बड़ा ही बेहतरीन रोल अदा किया है। शोएब साहब को अलीगढ़ से कुछ ख़ास दिलचस्पी थी और किसी भी कॉन्फ्रेंस या सेमीनार के बहाने वहां पहुंचने की कोशिश भी किया करते थे। एक ऐसी ही कामयाब कोशिश के मौके पर ज़फर अहमद सिद्दीक़ी ने शोएब साहब से कहा कि आपसे एक काम है। जब जवाब मिला- 'हुक्म कीजिए' तो इस पर ज़फर साहब ने उन्हें एक शागिर्द महजबीं खान से ये कहकर मिलाया कि इसकी पीएचडी नय्यर मसूद साहब पर है और आप इसकी मदद कर दीजिए।

 उस रिसर्च के बहाने खुद शोएब साहब ने भी अपने उस्ताद की ज़िंदगी को एक बाइस्कोप की तरह से प्ले किया और इस तरह किया कि सिलसिलेवार उनकी ज़िंदगी के हर लम्हे से गुज़रते चले गए।

 मोनोग्राफ पढ़ा तो शोएब साहब के लिए के लिए उस्ताद के हवाले से अफीफ सिराज का ये शेर याद आया-

''आज हुए मजबूर हम ऐसे, हार के हमने माना है
तुमने हमको हमसे बेहतर जाना है पहचाना है।''

 महजबीं खान को पीएचडी कराने के दौरान जो जानकारी जमा हुई उसमे सबसे बढ़ा हिस्सा शोएब साहब की उस याददाश्त का था जो बतौर शागिर्द उन्होंने अस्सी की दहाई की इब्तिदा से उनके साथ या उनके ज़िक्र के साथ गुज़ारा था। इसके अलावा बाक़ी जानकारी नय्यर मसूद साहब के साहबज़ादे तिमसाल मसूद की बदौलत मिली। और कुछ हिस्सा नय्यर साहब पर रिसर्च कर रही इस इस्टूडेन्ट ने जमा किया था।

 इस रिसर्च को कराते हुए नय्यर मसूद की ज़िंदगी की सिलसिलेवार दस्तावेज़ी जानकारी शोएब साहब के ज़ेहन में जमा हो चुकी थी। यही वजह रही कि जब मोनोग्राफ पर काम शुरू किया गया तो इसमें ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

 क़रीब सौ पन्नो वाले इस मोनोग्राफ, 'हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद' के ज़रिये उनकी ज़िंदगी से मौत तक की तमाम छोटी बड़ी जानकारियों को इसमें शामिल किया गया है। उनकी ज़िंदगी के खाके के साथ अफसा नानिगारी, तहक़ीक़, तनक़ीद (आलोचना), बच्चों का अदब और तर्जुमे के अलावा मुख्तलिफ गैरअफसानवी कारनामे भी शामिल हैं।

 हालांकि साहित्य अकादमी के लिए शोएब साहब का पहला मोनोग्राफ मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी पर साल 2015 में आया था। इससे पहले उर्दू अकादमी के लिए अनीस अशफ़ाक़ के मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी पर लिखे मोनोग्राफ पर शोएब साहब को कुछ ऐतराज़ थे और किताब का जवाब किताब से देते हुए उन्होंने साहित्य अकादमी के मोनोग्राफ की सूरत में अपनी बात कही। इस मोनोग्राफ को अदबी दायरे में खासी मक़बूलियत मिली।

 'हिन्दुस्तानी अदब के मेमार- नय्यर मसूद' के हवाले से शोएब निज़ाम कहते हैं कि इसे पढ़ने वाला इस हद तक जान सके कि हिस्पानवी शायर बोर्खेस की नज़्में हो या फिर सूफी के ड्रामे का तर्जुमा, नय्यर मसूद ने इन सभी पर काम किया है।

 जब शोएब निज़ाम से जानना चाहा कि किस जानकारी को हासिल करने में उन्हें सबसे ज़्यादा वक़्त लगा तो मालूम हुआ वह 'हकीम-ए-नबातात' थी। टाइटल से शोएब साहब ने अंदाजा लगाया की ये हकीमी नुस्खे होंगे मगर सूरत ए हाल वह न निकली जो उन्होंने समझी थी। ये फ़ारसी में तर्जुमा किए गए एक तुर्की ड्रामे की उर्दू पेशकश थी। इस तर्जुमे में अल्फ़ाज़ की रवानी और मुहावरे के इस्तेमाल इतने खूबसूरत थे कि तर्जुमे का एहसास ही नहीं होता था।

 शोएब साहब खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि उन्हें नय्यर मसूद साहब की बैठकों में शामिल होने का मौक़ा मिला है। वह कहते हैं- ''मैं वहां बहुत बैठा हूं। बहुत पाबन्दी से बैठा हूं। इसलिए बैठा हूं कि वहां जी बहुत लगता था।''

 मिसाल देते हुए वह कहते- ''नय्यर साहब बहुत उम्दा गुफ्तगू करते थे। मसलन हॉलीवुड की फिल्मों की बात हो रही हो तो नय्यर साहब बताते कि मर्लिन मुनरो का चेहरा किस ज़ाविये (एंगल) से अच्छा लगता है। और यह ऐसे ज़िक्र थे जिसका हम लोग तसव्वुर भी नहीं कर सकते थे।''

 शोएब निज़ाम कहते हैं- ''मैंने तमाम पढ़ने वालों को देखा है जो यह बताने की कोशिश में रहते थे कि देखो मैंने कितना पढ़ा है। इसके बरअक्स नय्यर साहब इसको छुपाते रहते कि उन्होंने कितना पढ़ा है। जब कोई मौज़ू छिड़ता और नय्यर साहब उस पर बोलते तो अंदाजा होता कि इस शख्स को कितनी जानकारी है।''

 आगे वह कहते हैं- ''नय्यर साहब के साथ जितना वक़्त गुज़रा वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत और यादगार ज़माना है। इसकी वजह यह है कि बहैसियत इंसान नय्यर साहब बहुत बड़े आदमी थे।''

 शोएब निज़ाम सन 1980 में नय्यर साहब के शागिर्द बने और उसके बाद यहीं मुलाज़िमत मिल गई। वह बताते हैं कि उस ज़माने में लखनऊ बड़े अदीबों से छलकता रहता था। एक वक़्त में लखनऊ में इतनी मारूफ अदबी हस्तियां थीं कि मैं अभी भी बिना रुके कम से कम 25 नाम गिना सकता हूं।

 बदले हुए दौर का ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं कि अब मोबाईल ने उसकी जगह ले ली हैं मगर हमारे वक़्तों का तरीक़ा ये था कि जहां कोई नया रिसाला आया, हम सारे दोस्त रात में बैठकर उस रिसाले की अहम चीज़ों पर गुफ्तगू किया करते थे। तब हर शख्स की कोशिश ये हुआ करती थी कि पहली फुर्सत में रिसाला खरीद कर पढ़े।

 बाराबंकी जिला रोज़ागांव के रहने वाले शोएब निज़ाम ने नय्यर मसूद की सरपरस्ती में यास यगाना पर पीएचडी पर काम तो शुरू किया था मगर इस बीच कानपूर में मुलाज़िमत मिलने की वजह से रिसर्च मुकम्मल न हो सकी। उनका संग्रह ‘अक्स गुम-ए-गश्ता’ साल 2020 में आया और उनकी यादों की बुनियाद पर तैयार ‘सरे सय्यार गान-ए सुख़न’ 2021 में आया। उनका अगला नॉविल गर्द-ए-सफ़र छपने के लिए लगभग तैयार है।

शुक्रवार, 7 मार्च 2025

कूचा-ए-मीर अनीस: हैरान हूं दो आंखों से क्या-क्या देखूं

कूचा-ए-मीर अनीस। कूचा तो हुआ मकानों के बीच से गुज़रती गली मगर कूचा-ए-मीर अनीस उस राह-गुज़र का नाम है जो लखनऊ के अलावा भी पूरी दुनिया में अक़ीदत की निगाह से जाना जाता है। इसी कूचा-ए-मीर अनीस के अनीस हैं मीर बब्बर अली अनीस। इन्हे मर्सिया-निगारी का बादशाह कहा गया है।

मर्सिया यानी मजलिस में पढ़े जाने वाले वह शोक गीत जो कर्बला की दास्तान बयान करते हैं। मीर की मर्सिया निगारी ने उर्दू साहित्य में सबसे ऊंचा स्थान पाया है। उनकी शोहरत का आलम यह है कि आज भी उनके अकीदतमंद दुनिया के किसी भी हिस्से से जब लखनऊ आते हैं तो उनकी आरामगाह की ज़ियारत को लाज़िमी समझते हैं। यहां आने वालों में कुछ ऐसा ही सिलसिला उन स्कॉलर्स का भी है जो मीर अनीस या उनके कलाम पर शोध कर रहे हैं। 

मीर 1803 में फ़ैज़ाबाद के एक अदबी घराने में पैदा हुए मगर उम्र पुराने लखनऊ के उस हवेलीनुमा मकान में गुज़ारी, जिसकी पुश्त तो अकबर के दौर में बने अकबरी दरवाज़ा की तरफ थी मगर इसके नक़्क़ाशी वाले आलिशान दरवाज़े से निकलने वाली राह-गुज़र नवाबी तामीर के दीदार कराती है।

मीर का दौर, वह ज़माना था जब ग़ाज़ी उद्दीन हैदर, अमजद अली शाह और वाजिद अली शाह अवध के आख़िरी नवाबों के नाम से अपनी हाज़िरी दर्ज करा रहे थे। अनीस के मर्सिया और उनकी मर्सिया गोई इस दौर में अपनी शोहरत के सबसे ऊंचे पायदान पर थी। 

मीर अनीस 1874 में इस दुनिया से रुखसत हुए और इसी इलाक़े में घर से कुछ दूरी पर सुपुर्द-ए-ख़ाक किए गए। पहली दिसंबर 2023 को जब उनकी 150वीं बरसी मनाई गई तो मालूम हुआ कि उनके घर और हुसैनाबाद इमामबाड़े से लेकर यूरोप और अमरीका में बसे उनके चाहे वालों ने उन्हें याद किया और पूरी शिद्दत से याद किया। 

हालांकि मीर के कलाम का ज़िक्र किए बिना मुद्दे पर आना ज़्यादती है और उनके कलाम का ज़िक्र इतना मुख़्तसर नहीं कि चंद अल्फ़ाज़ में समेटा जा सके। सो पेश है उनकी एक रुबाई-

गुलशन में फिरूं कि सैर-ए-सहरा देखूं
या मादन ओ कोह ओ दश्त ओ दरिया देखूं
हर जा तिरी क़ुदरत के हैं लाखों जलवे
हैरान हूं दो आंखों से क्या-क्या देखूं

मीर की इस रुबाई का ज़िक्र जिस हवाले से किया है, दरअसल वह ही 'आज' के कूचा-ए-मीर अनीस की दास्तान से जुड़ी है। या कहें कि मीर आज होते तो दुनिया इस बेमिसाल रुबाई से महरूम होती। जिस गली को मीर की याद में कूचा-ए-मीर अनीस नाम दिया गया है, मीर उस गली से गुज़रने से कतराते। बहुत ही मजबूरी में अगर गुज़रना पड़ता तो एक हाथ से अपने पायंचे टखने से ऊपर करने की कोशिश करते और दूसरे हाथ से नाक पर रुमाल रखते। वह आंखें, जिनसे इस गली में रहकर मीर ने क़ुदरत के जलवों का दीदार किया था, उन्हें महज़ इतना खोलते कि पैर समतल ज़मीन पर रख सकें और कीचड़ या कचरे से भी बच जाएं।

मीर ने अपने कलाम के ज़रिए हमेशा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। इसी कूचे से गुजरने की उधेड़-बुन में वह अल्लाह से यह शिकवा भी कर रहे होते कि 'या तो शहर के म्युनिसिपल कार्पोरेशन में मेरी सुनवाई करा दे या मुझे दो और हाथ दे दे ताकि एक से अपना सामान पकड़ सकूं और एक में छड़ी थाम कर गली में मौजूद कुत्तों और छतों पर कूदते खूंखार बंदरों से अपनी हिफाज़त कर सकूं।' 

यह कूचा अगर मीर अनीस का हवाला न भी दें तो भी इन रास्तों को शिकवा करने का हक़ है। अपना दर्द साझा करने के लिए इन गलियों के पास शिकायत की एक और दलील भी है। नवाबों के इस शहर की गलियों ने बड़ा सुनहरा दौर देखा है। वह भी तब जब न एलडीए था और न नगर निगम। उन्नीसवीं सदी के तीसरे चौथे दशक में जब अवध की सल्तनत नवाब नासिरउद्दीन हैदर के हाथों में थी तो उनका बड़ा चौकस निज़ाम हुआ करता था। इतिहासकार लिखते हैं कि नवाब साहब हर सुबह अपने इंजीनियरों की एक टीम लेकर गश्त पर निकलते और कही किसी किस्म का अतिक्रमण देखते तो उस निर्माण को उसी वक़्त न सिर्फ खुदवा देते बल्कि उनकी टीम उसे बराबर करने तक वहां अपनी ड्यूटी देती थी। अब इस दलील के बाद तो इन गलियों को हक़ है कि वह नवाबी ठाठ दिखाए मगर ज़माने के सितम ने इनकी आवाज़ को घोंट दिया है। कभी-कभी तो लगता है कि अंधेरी गलियों की सीलन दरअसल सीलन नहीं इनके आंसू हैं जो यह अपनी बदहाली पर बहाने को मजबूर हैं।

मीर जिस ज़माने में दुनिया से रुख़सत हुए थे, उस वक़्त तक लखनऊ के नक़्शे पर ज़बान, ज़ायक़ा,तहज़ीब और नफ़ासत की ऐसी मुहर लग चुकी थी जिसने सारी दुनिया में इस शहर को इन खूबियों के हवाले से मशहूर कर दिया।

फिर ये हुआ कि मीर नहीं रहे, उनकी नज़र नहीं रही, वह क़ुदरत भी रूठ सी गई बस उनका कलाम रह गया। बिलकुल वैसे ही जैसे शहर रह गया, उसकी नफ़ासत नहीं रही। मीर के शहर का ढांचा भी बदलता गया और    लब-ओ-लहजा भी आहिस्ता-आहिस्ता गुम होने लगा।

मीर भी फैज़ाबाद से आए थे। उन्होंने अवध पर नवाबों की और फिर अंग्रेज़ों की सरपरस्ती देखी थी। न वह यहां से हिजरत करने वालों को रोकते और न ही यहां आकर आबाद होने वालों को। मगर गटर में तब्दील होते इस इलाक़े पर घुटते रहते और हर सुबह क़तार में खड़े होकर सूबे के सद्र से इल्तिजा करते कि, 'हुज़ूर! सबसे पहले कूचा-ए-मीर अनीस का नाम बदलने की ज़हमत करें। बड़ी मेहरबानी होगी।'

मुमकिन है कि मीर की हस्ती से लाइल्म लोगों को यह उनकी मुंहज़ोरी लगे। कुछ उन्हें एहसानफरामोश कहते और यह भी कहते कि बिजली, पानी से लेकर सवारी तक मयस्सर है मगर न जाने कि किस मोह से मजबूर हैं। 

मगर जो मीर के चाहने वाले हैं और जिन्होंने मीर, उनके कलाम और इस कूचे की अहमियत को जाना है, वह मीर के हमख़याल होकर यही कहेंगे कि या तो हुज़ूर इलाक़े का हुलिया सुधार दें या फिर इसका नाम बदल दें। 

तो अब चलते-चलते एक मुआयना इस इलाक़े का भी कर लिया जाए। कूचा-ए-मीर अनीस की लोकेशन को गूगल मैप की बदौलत अगर देखें तो पाते हैं कि महज़ दो किलोमीटर की परिधि में अमृत लाल नागर का मकान है, सुल्तानुलमदारिस की वह इमारत है जहां से कैफ़ी आज़मी ने अपनी ज़िंदगी की शायद पहली बग़ावत की थी। अदबिस्तान है। और वही हकीमों वाली गली जहां से मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद शुरू हुई और इसी गली में 'गुज़िश्ता लखनऊ' लिख कर इस शहर की दास्तान सुनाने वाले अब्दुल हलीम शरर की क़ब्र है। इन सबके बीच बसा, और मीर अनीस के नाम पर आबाद यह कूचा जो अब चारों तरफ से बजबजाती और सीली बदबूदार गलियों की आगोश में आ चुका है। गली की ऊबड़-खाबड़ हालत देखकर लगता है कि इसे तोड़ने की कोशिश हर कोई करता है मगर इस टूट-फूट को बनाने के लिए कभी कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। अपनी सरहदों से आगे बढ़ आए मकानों ने गलियों को कितना तंग किया है यह तो एलडीए के उन रिकॉर्ड से ही पता चलेगा जिनमे इन घरों के बीच गुज़रती गली की लम्बाई चौड़ाई की सही नाप दर्ज होगी।

यहां से हिजरत करने वालों ने जिन बिल्डर्स को अपने घर बेचे हैं उन्होंने हर किस्म के रूल-रेगुलेशन को दरकिनार करते हुए जो कई मंज़िला फ्लैट बनाए हैं उनमें दरवाज़े के बजाए आमने सामने बने छज्जों और खिड़कियों के ज़रिए दाख़िल होना आसान है। ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर जब चौड़ाई में घर बनाना मुमकिन न हुआ तो उसे ऊंचाई में उठाते गए। इन कसे-फंसे मकानों के बनाने में धूप हवा पानी से ज़्यादा इस बात का ख़याल रखा गया कि खरीदारों की गिनती ज़्यादा से ज़्यादा हो। क्योंकि इन घरों के अंदर जगह नहीं है तो कूलर और ऐसी का बोझ भी कूचे यानी राह-गुज़र के हिस्से में आया है। उस पर सितम यह कि यहां आबाद आबादी अपने घरों का कूड़ा बालकनी से या दरवाज़े से बाहर फेंकना पसंद करती है। आबादी भी कोई थोड़ी नहीं। इतनी कि अगर आरटीआई डालकर जानकारी ली जाए तो इलाक़े की ज़मीन पर आबादी का घनत्व वह रिकॉर्ड बना लेगा कि दूर-दूर तक और अगले कई ज़मानों तक कोई उसे छू भी न सके।

वैसे तो मीर अनीस के मकान से महज़ दो सौ मीटर की दूरी पर एक कूड़ाघर बनवाया ज़रूर गया है मगर अकसर वह कूड़ाघर अपने गिर्द जमा होने वाले कूड़े के अंबार में गुम होता नज़र आता है। बाक़ी रही-सही कसर मीर अनीस के मकान और कूड़ाघर के बीच बहते सरकटे नाले से पूरी हो जाती है जिसकी दुर्गन्ध से शायद यहां के रहने वाले तो राज़ी हो गए हैं मगर मीर अनीस के मकान और मक़बरे की ज़ियारत करने वाले और उनपर शोध करने वाले रिसर्चर्स ज़रूर यह ग़म लेकर यहां से जाते होंगे कि लखनऊ से वाबस्ता जिस हस्ती को दुनिया सिरआंखों पर उठाती है, वह अपने ही शहर में अनदेखी का शिकार है।

जो मीर अनीस कहा करते थे-

तमाम उम्र इसी एहतियात में गुज़री
कि आशियां किसी शाख़-ए-चमन पे बार न हो

आज उसी कूचा-ए-मीर अनीस के दर्द को दवा की तलाश है।   

सोमवार, 27 मई 2024

'सफ़र में इतिहास' संग जो महसूस किया

'सफर में इतिहास' हाथ में आई तो ख्यालात का एक न थमने वाला सफ़र साथ हो लिया। मेरे लिए इस किताब का अनुभव बड़ा ही दिलचस्प रहा। किताब के पलटते पन्नों के साथ इस दिलचस्पी में विस्तार होता गया जिसके नतीजे में ख़यालात की परवाज़ जैसे कई मैदानों और कई आसमानों के सफ़र कराती गई। इसमें कई काल थे, कई वंश थे, कई हुनर थे और हर ज़माने के अपने रीती-रिवाज और ज़बानें थीं।

हालांकि इतिहास के हवाले से सबसे सटीक पंक्तियां स्कॉटिश जीवविज्ञानी और समाजशास्त्री पैट्रिक गेडेस रच गए हैं। उनका कहना है- ''कभी-कभी रुककर सोचना और आश्चर्य करना दिलचस्प होता है कि जिस स्थान पर आप वर्तमान में हैं, वह अतीत में कैसा हुआ करता था, वहां किसने विचरण किया, वहां कौन काम करता था और इन दीवारों ने क्या क्या देखा है।''

मगर हमारे दौर का पाठक यानी होमो सेपियन्स इस ज़माने में अक़्ल के जिस उरूज पर है, वहां शांत मन एक न मयस्सर आने वाली शय है। मन की अशांति और इतिहास के इस सफ़र को साधने की भरपूर कोशिशों के बावजूद 'सफ़र में इतिहास' संग जो महसूस किया उसमें कुछ किरदार ख़ुद-बख़ुद दाख़िल होते गए। किताब पढ़ने के साथ एक समानांतर वार्तालाप और विचारों के सहयात्री अंत तक बने रहे। इनमे से कुछ का ज़िक्र करना चाहेंगे। 

किताब का शीर्षक, कवर पेज और प्रवेशिका पढ़ने तक मेरा यह ख़याल और मज़बूत हो गया था कि फॉरेस्ट गंप और टॉम हैंक्स से मुतास्सिर आमिर ख़ान को क्या ज़रूरत थी कि मुँह उठाकर बिना सोचे समझे निकल पड़ें और चार बरस से ज़्यादा चलते रहें, वह भी बिना मक़सद। 

इसके बरअक्स सफर में इतिहास की बात करें तो सवा दो सौ पन्नों की ये किताब महज़ आठ बरस में की गई कुछ यात्राओं की डायरीनुमा है जिसमें पहले पन्ने पर प्रोफ़ेसर नीलिमा पाण्डेय लिखती हैं- 'यात्राओं के दरमियान जनश्रुति, लोक परंपरा, पुराण, इतिहास और पुरातत्व का सानिध्य ज़रूरी होता है।' ठीक वैसे ही जैसे खुशवंत सिंह के बामक़सद सफ़र।

ऐसी बेशुमार पंक्तियाँ इस किताब के कई पन्नों पर दर्ज हैं जिन्हें एक बार पढ़ने के बाद दोबारा पढ़ने और अंडर लाइन किए जाने की ख़्वाहिश को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। 

मसलन-'महज़ जगहों से गुज़रना यात्राओं को कमतर करता है। यात्रा माने इतिहास से एकरूप हो जाना। इतिहास के गर्व और शर्म को दोनों हाथों से थाम लेना।' और इसी में यात्रा के लिए कहा गया है- ‘असल मुलाक़ात तो हम अपने आप से करते चलते हैं।' किताब की प्रवेशिका उस लिफ़ाफ़े की मानिंद है जो अंदर के मज़मून का हाल बयान कर जाती है। यक़ीनन इतिहास के गर्व और शर्म की बात करना बताता है कि किताब पूरी निष्पक्षता के साथ लिखी गई है। 

'सफ़र में इतिहास' में बारह अध्याय है और इनमें से ज़्यादातर बुद्ध के गिर्द परिक्रमा करते गुज़रते हैं। साल 2015 से 2023 के बीच किए गए इन सफ़र में जो कुछ लिखा गया है उसे तथ्यात्मक, दिलचस्प और शानदार बनाने वाली टूलकिट पाठक को न सिर्फ किताब से बांधकर रखती है बल्कि हर चैप्टर में पाठक को उस जगह के दीदार का न्योता देने की खूबी भी नज़र आती है। जी हाँ! इस टूल किट में शामिल है- इतिहास की विस्तृत और बारीक पकड़, स्याह को स्याह और सफ़ेद को सफ़ेद कहने की हिम्मत और भाषा पर बेहतरीन लगाम। हमेशा से एक धुंध और ग़ुबार में पाया जाने वाला इतिहास इस सफ़र और टूल किट के बहाने काफी शफ़्फ़ाफ़ नज़र आता है। 

सफ़र के दौरान इतिहास और वर्तमान के बीच तारतम्य बैठाते हुए कुछ कटाक्ष भी हमसफ़र हुए हैं जिनमें से कुछ का ज़िक्र किए बिना आगे बढ़ना ज़रा नाइंसाफी होगी। ‘यह वह मगध नहीं’ अध्याय में ‘गया से बोधगया’ शीर्षक के तहत पृष्ठ 37 पर दर्ज इबारत- "गया पितृ तीर्थ का प्रसिद्ध स्थल है। फल्गु नदी के किनारे बसे इस शहर की प्रसिद्धि विष्णु पद मंदिर से है। नदी तट पर स्थित मंदिर पण्डे, पुरोहितों का प्रिय ठीहा हैं। यहाँ स्वर्ग और नर्क की रस्साकशी में फंसा जनसमुदाय उनको रोज़गार मुहैया करवाता है। यजमान यहाँ आडम्बर और पाखंड की तनी हुई रस्सी पर भयग्रस्त क़दम साधे चलते हैं।"

या फिर इसी शीर्षक के तहत पृष्ठ संख्या 43 से - '...बनारस में मृत्यु का कारोबार प्रबल है जबकि गया में श्राद्ध का।"इसी पृष्ठ से- "देवलोक तो देवलोक पृथ्वीलोक के वासी भी आए दिन इंद्र को हैरान करते रहते हैं, इधर किसी तपस्वी ने आसान जमाया और उधर इंद्र का सिंहासन डोला।"

‘भोपाल से आगे... ‘अध्याय में ‘पुरखों का घर भीमबेटका’ शीर्षक में जिन औज़ारों की जानकारी दी गई है वह एक लाख से चालीस हज़ार वर्ष पुराने हैं और इस तरह मानव विकास के साथ औज़ार और चित्रकारी के विकास तक की झलक मिलती जाती है। 

इतिहास के साथ भूगोल की जानकारी विस्मृत करने वाली है जब ‘नवाबों का शहर भोपाल’ के सफ़र में ज़िक्र आता है- '…जहां से कुछ ही दूरी पर कर्क रेखा गुज़रती है।' इस मालूमात ने शाह अज़ीमबादी की याद दिला दी जिनकी मालूमात की कमी उन्हें मक़बूल कर गई थी, उनकी ही ज़ुबानी कुछ इस तरह -  

सुनी हिकायत-ए-हस्ती तो दरमियां से सुनी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम

मगर इस सफ़र में इब्तिदा और इंतिहा के साथ बहुत कुछ ऐसा था जिसने हैरान भी किया। मसलन पृष्ठ 77 पर 'कुशीनगर में एक दिन' शीर्षक के तहत बुद्ध और आनंद का वार्तालाप। "महापरिनिब्बान सुत्त में गौतम बुद्ध के अंतिम संस्कार से सम्बंधित सूचनाऐं दर्ज हैं। इसी सुत्त में हमें जानकारी मिलती है कि जब आनंद ने बुद्ध से यह जानना चाहा कि, 'उनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाए?' तो उन्होंने संक्षेप में उत्तर दिया, "जैसा चक्रवर्ती सम्राटों का होता है।" 

ज्ञान प्राप्ति के लिए राज-पाठ और परिवार का त्याग करने वाले बुद्ध का यह जवाब हैरान करने वाला लगा और एक बार ख़याल आया कि कहीं कुछ टाइपो एरर तो नहीं। आगे बढ़ने के लिए डनिंग-क्रूगर प्रभाव से बाहर निकलना बेहतर लगा ताकि बाक़ी के पन्ने पलटे जा सकें। 

क्योंकि इतिहास में इतिसिद्धम नहीं होता इस लिए इस पर ईमान लाना आसान नहीं, वह भी ऐसे युग में जब व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी का प्रोडक्शन अपने उरूज पर हो। जिन दिनों व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी नहीं थी तब भी इस विषय की गॉसिप की परवाज़ बड़ी लम्बी हुआ करती थी। हम में से ज़्यादातर का बचपन इस क़िस्से को सुनते बीता है कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मज़दूरों के हाथ कटवा दिए थे।

जिन्होंने इतिहास को विषय की तरह चुना उनका पता नहीं मगर बाक़ियों के साथ यह क़िस्सा ताउम्र साथ चला और ज़रूरत पड़ने पर उसने इस दलील का भी सहारा भी लिया। 

इसलिए ‘सफ़र में इतिहास’ के पाठक को इस किताब और लेखिका का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। खासकर हिंदी पाठक को जिसके पास दुरुस्त इतिहास तक पहुंचने के विकल्प बहुत कम रह जाते हैं। ऐसे में किताब और भी प्रासंगिक हो जाती है जब इतिहास का अंड-बंड संस्करण और व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी की सप्लाई का सैलाब, सूनामी का रूप धार चुका हो। 

पत्रकारिता कहती है- ‘जो चल कर आए वह खबर नहीं’ और यही बात इतिहास के लिए भी लागू होनी चाहिए कि जो रात-दिन मुहैया कराया जाए उसका पाठक होने से कोरा रह जाना बेहतर है। सटीक से सटीक इतिहास की तलाश हिंदी पाठक को हमेशा मायूस करती है और नीलिमा पाण्डेय की यह किताब इस मायूसी को दरकिनार करने का ज़रिया बनती है। 

इस किताब को पढ़ते समय टेलीविजन की दुनिया से जुड़ी कुछ यादें भी मस्तिष्क पटल पर दोहराती गईं। किताब के शीर्षक ने कई ऐसे चेहरे सामने ला दिए जो खुद को बुद्धिजीवी वर्ग में रखने के माहिर रहे हैं। अपनी दलीलों में जिन्हे ये कहते सुना है- 'भई हम तो सिर्फ डिस्कवरी या नेशनल ज्योग्राफिक चैनल ही देखते हैं। क्या कमाल की रिसर्च करते हैं ये अंग्रेज़, फोटोग्राफी का भी जवाब नहीं। एक बार इस चैनल की आदत पड़ जाए तो उसके बाद कोई इंडियन प्रोग्राम भाता नहीं।" 

यह किताब ऐसे लोगों के सिरहाने होनी चाहिए और एक से ज़्यादा बार पढ़ी जानी चाहिए। महज़ इस लिए नहीं कि इसमें सफ़र है, रिसर्च है, इतिहास और भूगोल है, वर्तमान है, भाषा है, मौसम है, रीति-रिवाज और साहित्य है, इसमें अगर धरोहरों को सहेजने का शुकराना तो उनसे ज़्यादती की आलोचना भी है, बल्कि इसे इस नज़रिए से भी पढ़ा जाना चाहिए कि इतिहास पर रिसर्च करने वाली एक घुमक्कड़ महिला की डायरी में उसके विषय से हटकर भी कितना कुछ दर्ज करने की खूबी हो सकती है।

इस किताब के साथ जिस एक कमी कों बड़ी ही शिद्दत से महसूस किया है वह है इसमें मानचित्र का न होना। कई बार अपने सूबे या फिर देश के कुछ हिस्सों का इतिहास पढ़ते समय उसके भूगोल को जानने की ललक में नक़्शे की कमी बहुत खली। ऐसा लगा बीच में न सही अंत में ही अगर कुछ ऐसा इंतिज़ाम हो जाता तो जानकारी को जैसे मज़बूती मिल जाती। 

सफ़र में इतिहास पढ़ते समय आधुनिक इतिहास से एक बेहद अज़ीज़ चेहरा लगातार साथ रहा था। उसके ज़िक्र के साथ अपने इस सफ़र का समापन करना चाहेंगे-

मोहन दास करमचंद गांधी, देश या दुनिया के किसी भी हिस्से में होते और उन तक ये किताब पहुंचती तो इसे पढ़ने के बाद वह तीन चिट्ठियां लिखते। लखनऊ भेजे जाने वाले पहले पोस्टकार्ड पर लिखा होता- 'नीलिमा! तुम ईमानदार लेखिका हो। तुम्हारी रिसर्च और यात्रा ने इस किताब को लिखकर तुम्हारे होने का हक़ अदा कर दिया है। दूसरी अच्छी बात है तुम्हारी भाषा। यह वही भाषा है जिसकी मैं पैरवी करता हूं, हम सबकी हिंदुस्तानी भाषा। आगे भी ऐसी यात्राएं करती रहो और लिखती रहो। शुभकामना।" 

दूसरी चिट्ठी में वह सेतु प्रकाशन को धन्यवाद के साथ ताकीद भी करते कि इस मिशन को जारी रखना और तीसरी चिट्ठी में नेहरू को मुख़ातिब करते हुए कहते- 'अब तुम्हे चिंता करने की ज़रूरत नहीं। डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया के बाद भी न सिर्फ इतिहास रचा जाएगा बल्कि रिसर्च, ईमानदारी और तटस्थता के साथ रचा जाएगा।" 

(साभार- hindi.news18.com) 

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

अलल-टप

सीमा का कविता संग्रह "कितनी कम जगहें हैं" को आये काफी दिन गुज़र गए और कुछ भी सलीके से लिखने का मौक़ा नहीं मिला। फीलिंग जेलस से लेकर फीलिंग प्राउड या फीलिंग नॉस्टेल्जिया जैसा कुछ भी लिखने का इरादा नहीं। ... और लिखना भी है तो एक ही हल बचता है कि अलल-टप लिखा जाए। 

चलन के मुताबिक़ मेरी भी ख्वाहिश थी कि खिड़की, अलगनी या गमले से एक क़दम आगे बढ़ कर इस किताब का ज़रा आला दर्जे का फोटो शूट होना चाहिए। मेरी ख़्वाहिश ऐसी बेकाबू हुई कि चांद तलक चली गई। श्री हरिकोटा फ़ोन लगाया तो पता चला कि चंद्रयान-3 जा चुका है और 4 के जाने में अभी काफी वक़्त है। गोया चांद पर फोटोशूट मुमकिन नहीं। 

मंगल की सवारी की जानकारी लेना मुनासिब नहीं लगा क्योंकि साहित्य का चांद से रिश्ता समझ आता है, मंगल शनि के लिए तो पाठक हैं ही!

नासा कॉल करने की हिम्मत नहीं पड़ी। वह ज़रा 'छोटा मुंह बड़ी बात' जैसा लगा मगर पता नहीं कैसे नासा वालों को इत्तिला मिल गई कि हम चांद पर कुछ भेजना चाहते हैं। इसे कहते हैं टेक्नोलॉजी। वल्लाह ग़ालिब याद आ गए-

"देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा
मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है"

और नासा का कॉल चीख़ चीख़ कर कह रहा था-

"देखना तकनीक की लज़्ज़त कि जो हमने सोचा
नासा ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है" 

मेरी इतराहट लाज़िम थी। 'साइंस' की पहली सीढ़ी 'परिकल्पना' ही है। ग़ालिब का ख्याल और साइंसदानों की मशक़्क़त आज क्या गुल खिला चुकी थी। सात समंदर पार बैठे हमारे दिमाग़ को न सिर्फ़ नासा ने इस तकनीक की मदद से रीड कर डाला बल्कि फौरन से पेशतर हमें कॉल भी कर ली।

आइडिया उन्हें भी काफी यूनीक लगा, कहने लगे- ''आप किताब का साइज़ और वज़न भेज दीजिए हम कहीं न कहीं एडजस्ट करते हैं। किताब फ़ौरन भेज दी गई और वहां से इत्तिला भी आ गई कि आपको जल्दी ही जानकारी देंगे। 

संकोच के साथ हमने कीमत भी पूछ ली तो जवाब मिला कि साहित्य की क़ीमत कैसे लगा सकते हैं। ये तो हमारी धरती की साझी विरासत है। अब यह किसी राष्ट्र का नहीं बल्कि इस धरती का मामला है। मेरा-तेरा का तो सवाल ही नहीं उठता। इस दलील के बाद किसी सवाल की कोई गुंजाईश ही नहीं बची थी और हम बड़ी ही बेसब्री से इस इन्तिज़ार में थे कि जैसे ही चांद से 'कितनी कम जगहें हैं' की तस्वीर आएगी, हम भी रच-रच कर एक पोस्ट लिख डालेंगे। 

मगर मेरी ख़्वाहिश पर ग्रहण लग गया और बिन बुलाए मंगल और  शनि भारी पड़ गए। हुआ कुछ यूं कि किताब का वज़न लिया जाने लगा तो पता चला कि यह तो यान से भी ज़्यादा है। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने ये सुना तो उनके कानों से धुंए निकल गए। आनन-फ़ानन इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई। बड़े-बड़े दिग्गज भी यह पता नहीं लगा सके की माजरा क्या है? ... और हम यह कर कर उन्हें छोटा महसूस नहीं कराना चाहते थे कि जनाब ये अलफ़ाज़ का नहीं विचारों का वज़न है जिसका धर्मकांटा अभी ईजाद नहीं हुआ है।

शनिवार, 13 जनवरी 2024

जल सहेलियां

शिखा श्रीवास्तव ने करीब ढाई दशक अखबार में काम किया। उस अखबार में जिसके एक से दो दर्जन पन्ने होते हैं। कई सारे एडिशन होते हैं और हर पन्ने की एक अलग दुनिया होती है। इस पूरा अरसा शिखा एक ही अखबार में रही। बेशक इस बीच कई पन्नों से उसका वास्ता पड़ा होगा। कभी फीचर तो कभी चुनाव की रिपोर्टिंग, कभी पॉलिटिकल रिपोर्टिंग और एनालिसिस तो कभी खालिस गिटपिट अंग्रेजी वाली बड़ी-बड़ी ग्लोबल कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, सिम्पोज़ियम की ऑफ बीट रिपोर्टिंग। लगभग हर फील्ड की दिग्गज हस्तियों से बात-मुलाकात और साक्षात्कार। सूबे में कहीं भी कवरेज के लिए भेज दिए जाने पर एक्सक्लूसिव स्टोरीज़। खैर, इन सबके बीच अखबार वाले लेखन की पहली पारी पूरी हुई।


हर दिन बेशुमार अल्फ़ाज़ और विचारों के साथ काम करते हुए कुछ ऐसा था, जो करना रह गया था। फिर वह वक़्त आया जब इस 'कुछ' को करने का मौक़ा निकाला गया। लेखन की इस दूसरी पारी में शिखा एस ने इस क़र्ज़ को अदा करने की कोशिश की और इस कोशिश के नतीजे में सामने आयी उसकी किताब 'जल सहेलियां'।

अभी शिखा एस की किताब को पढ़ा नहीं है इसलिए कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। मगर इस बुक लॉन्च में जाना भी एक गज़ब का तजुर्बा रहा। एक जनवादी की नज़र में ये बुक लॉन्च बड़ा ही भव्य था, मगर इसकी भव्यता की जगमग में जो हाइलाइट हो रहा था वह थीं 'जल सहेलियां'। 

इन ज़मीनी हस्तियों के साथ लोकशाही, राजशाही और मीडिया के दिग्गजों का डेडली कॉम्बिनेशन भी पहली बार देखा। पहली बार देखा, इन जल सहेलियों के संघर्षों को सामने लाने के तमाम प्रयास। इसमें शिखा से राज कुमार सिंह जी की बातचीत, अरशाना के नवीन जोशी सर और पार्थ सारथी सेन के हवाले से किताब के कंटेंट की चीरफाड़,  प्रीती चौधरी जी ने तो बीच में आकर श्रोता और जल सहेलियों के बीच की दीवार ही हटा दी। अरशाना की किस्सगोई कमाल की थी। किस्सों ने इन संघर्षों का इतिहास और भूगोल सब सामने ला दिया था। हमें भी आशुतोष मिश्रा के साथ किताब के कुछ अंश पढ़ने का मौक़ा मिला। पूरे कार्यक्रम की प्रमुख किरदार रहीं जल सहेलियां अपने लोकनृत्य के साथ शो स्टॉपर बनीं।

शिखा और सभी वालेंटियर्स को इस पूरे कार्यक्रम के लिए बधाई और शुभकामनाएं। ग्रे पैरट पब्लिशर्स को ख़ास शुभकामनाएं मगर उससे भी एक डिग्री ऊपर की शुभकामना टीम लीडर अविनाश जी को, जिन्होंने इस पूरे कार्यक्रम की सरपरस्ती की। एक बधाई इस बात की भी कि मेरी शिखा और अविनाश सर की दोस्ती चौथाई सदी पुरानी हो चुकी है।

इनकी पिछली पीढ़ी सड़कों को सूना रखने की गुनहगार है

कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी।  एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उ...